बारिश और खेती के रकबे पर निर्भर हैं हाथियों को रोकने के उपाय, अध्ययन में मिले अहम निष्कर्ष

Measures to stop elephants depend on rainfall and agricultural area

बारिश और खेती के रकबे पर निर्भर हैं हाथियों को रोकने के उपाय, अध्ययन में मिले अहम निष्कर्ष

छत्तीसगढ़। भारत में इंसानों और हाथियों के बीच बढ़ते टकराव ने पिछले कुछ वर्षों में चिंता बढ़ा दी है। देशभर में ऐसे मामले सामने आते रहे हैं जिनमें इंसान और हाथी दोनों की जान गई है। इसके पीछे प्रमुख कारण हैं जंगलों और कृषि भूमि के सीमित होने के साथ-साथ जल और भोजन की कमी। हाल ही में सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज (CWS) द्वारा छत्तीसगढ़, कर्नाटका और केरला के ग्रामीण इलाकों में किए गए सर्वेक्षण ने इस समस्या के पैटर्न और प्रभावी रोकथाम के तरीकों पर नए तथ्य उजागर किए हैं।

सर्वे के अनुसार, हाथियों को रोकने के लिए बाड़ लगाने, खाई खोदने और इलेक्ट्रिक फेंस जैसे उपाय अपनाने का निर्णय स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है। मुख्य रूप से तीन कारक इसे प्रभावित करते हैं: वर्षा का स्तर, खेती का रकबा और पानी की निकटता। अध्ययन में पाया गया कि कम बारिश वाले क्षेत्रों और छोटी खेती वाले घरों में रहने वाले लोग हाथियों से होने वाले नुकसान को कम करने के उपाय अपनाने की संभावना ज्यादा रखते हैं। इन इलाकों में इन उपायों को अपनाने की संभावना लगभग 68% अधिक पाई गई।

इसके विपरीत, जिन घरों के पास पानी की उपलब्धता अधिक थी, जिनके पास बड़ा खेत था और वर्षा अधिक होती थी  वहां नुकसान कम करने के उपाय अपनाने की संभावना मात्र 7% अधिक रही। सर्वे में कहा गया कि पानी के पास रहने से कभी-कभी रोकथाम के उपाय अपनाना कठिन हो जाता है। वहीं, तुलनात्मक रूप से सूखे इलाके और छोटे खेत वाले स्थानों में उपाय अपनाना ज्यादा ज़रूरी और प्रायोगिक रूप से लाभकारी साबित होता है। WWF इंडिया के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हाथियों के कारण प्रतिवर्ष लगभग 500 लोग मारे जाते हैं, जबकि लगभग 100 हाथियों की मौत बिजली के झटके, ज़हर, ट्रेन दुर्घटना और अवैध शिकार के कारण होती है। अध्ययन में शामिल क्षेत्रों में कर्नाटका के बंदीपुर और नागरहोले टाइगर रिजर्व और केरला के पालक्काड और मन्नारक्कड़ टेरिटोरियल फॉरेस्ट डिवीज़न शामिल थे। इन स्थानों पर इंसानों और हाथियों की घनत्व अधिक होने के कारण टकराव के मामले भी बढ़े हुए हैं।

सर्वे ने यह भी उजागर किया कि हाथियों को रोकने के उपाय हमेशा सुरक्षित नहीं होते। आंकड़ों के अनुसार, सर्वे में शामिल लोगों ने 47 हाथियों की मौतों का जिक्र किया। इनमें से लगभग 25% मौतें कर्नाटका में सोलर फेंस और 38% मौतें केरला में इलेक्ट्रिक फेंस के कारण हुईं। वहीं, कर्नाटका में हाथियों के घायल होने का सबसे बड़ा कारण खाइयां थीं। इस प्रकार देखा जा सकता है कि रोकथाम के उपाय कभी-कभी हाथियों के लिए भी खतरा बन जाते हैं।

इस अध्ययन की प्रमुख लेखिका सिमरन प्रसाद ने कहा, “हाथियों और इंसानों के बीच टकराव को रोकने के लिए ऐसे उपाय अपनाने जरूरी हैं जो किसी की जान न लें, समुदायों को शामिल करें और हाथियों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। इनमें शुरुआती चेतावनी देने वाले सिस्टम, रीजेनरेटिव खेती और टिकाऊ खेती के तरीके शामिल हो सकते हैं। ये उपाय आर्थिक रूप से फायदेमंद होने के साथ-साथ हाथियों के प्राकृतिक आवास की सुरक्षा भी करेंगे।”

विशेष रूप से यह अध्ययन यह भी बताता है कि सिर्फ रोकथाम के उपाय अपनाने से समस्या का समाधान नहीं होता। स्थानीय समुदायों की भागीदारी और शिक्षा महत्वपूर्ण है। अगर समुदायों को पता हो कि किस तरह के उपाय हाथियों के लिए सुरक्षित हैं और किस प्रकार वे अपने खेतों की सुरक्षा कर सकते हैं, तो टकराव की घटनाओं में कमी आ सकती है।

साथ ही, बारिश और खेतों के रकबे का अध्ययन यह बताता है कि नीतियां और उपाय हर क्षेत्र में समान नहीं हो सकते। जहां पानी की उपलब्धता अधिक है, वहां कम लागत वाले या प्राकृतिक उपायों पर जोर दिया जाना चाहिए। वहीं, छोटे खेत और कम बारिश वाले इलाके अधिक सक्रिय उपाय अपनाने के लिए अनुकूल होते हैं।

अध्ययन यह सुझाव देता है कि सरकार और वन्यजीव संरक्षण संगठन तकनीकी सहायता, सुरक्षा उपकरण, और स्थानीय जागरूकता कार्यक्रम के माध्यम से इस समस्या को कम कर सकते हैं। शुरुआती चेतावनी सिस्टम जैसे कि आवाज़ या रोशनी से हाथियों को खेतों से दूर रखा जा सकता है। साथ ही, रीजेनरेटिव और टिकाऊ खेती अपनाने से किसानों की आमदनी बढ़ेगी और हाथियों के प्राकृतिक आवास की रक्षा भी होगी।

इस प्रकार, बारिश, खेती के रकबे और पानी की निकटता के आधार पर हाथियों को रोकने के उपाय अपनाने की रणनीति अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अनुकूलित हो सकती है। यह अध्ययन दर्शाता है कि इंसानों और हाथियों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए सुरक्षा, आर्थिक लाभ और संरक्षण तीनों पहलुओं का संतुलित मिश्रण जरूरी है।

छत्तीसगढ़, कर्नाटका और केरला में हुए इस अध्ययन ने स्पष्ट किया है कि टकराव रोकने के उपाय क्षेत्रीय परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं। छोटे खेत और कम बारिश वाले इलाके ज्यादा सक्रिय उपाय अपनाने के लिए अनुकूल हैं, जबकि बड़े खेत और पानी के पास रहने वाले इलाकों में रोकथाम के उपाय अपनाना कठिन हो जाता है। भविष्य में ऐसे उपाय अपनाने से न केवल मानव और हाथियों की जान बचाई जा सकती है बल्कि वन्यजीव संरक्षण को भी मजबूती मिलेगी। इस रिपोर्ट का उद्देश्य यह बताना है कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपाय अपनाना और समुदायों को शामिल करना इंसान और हाथी के बीच टकराव कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है।

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