बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती ने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी के अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। अगस्त 2026 में पार्टी की बैठक के दौरान मायावती ने कहा कि बसपा यूपी, उत्तराखंड और पंजाब में अपने दम पर चुनाव लड़ेगी। उन्होंने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने पर भी जोर दिया है। अब बड़ा सवाल यह है कि पिछले चुनावों में कमजोर हुए प्रदर्शन के बीच बसपा अकेले मैदान में उतरकर अपना राजनीतिक आधार कितना मजबूत कर पाती है।
मायावती ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला क्यों किया?
मायावती का कहना है कि गठबंधन से पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल और सीटों-वोट प्रतिशत पर असर पड़ सकता है। इसी वजह से बसपा ने फिलहाल किसी चुनावी गठबंधन से दूरी बनाए रखने का फैसला किया है। पार्टी अब बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने और अपने पुराने मतदाता आधार को दोबारा सक्रिय करने की कोशिश कर रही है।
पिछले विधानसभा चुनाव से अब तक बसपा की स्थिति कैसी रही?
बसपा का चुनावी प्रदर्शन पिछले डेढ़ दशक में काफी बदला है। 2007 में पार्टी ने यूपी की 403 सीटों में से 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। 2017 में सीटों की संख्या घटकर 19 और 2022 में सिर्फ 1 सीट रह गई। 2022 में पार्टी का वोट शेयर 12.88 प्रतिशत था। 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा यूपी में कोई सीट नहीं जीत सकी और उसका वोट शेयर करीब 9.39 प्रतिशत रहा। अगस्त 2026 में पार्टी के इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद यूपी विधानसभा में बसपा का कोई विधायक नहीं है।
इस बार बसपा वापसी की उम्मीद किस रणनीति से कर रही है?
बसपा के सामने सबसे बड़ा काम अपने पारंपरिक दलित मतदाताओं के बीच संगठन को फिर सक्रिय करना है। मायावती की राजनीति में सामाजिक समीकरण हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं और पार्टी व्यापक सामाजिक आधार बनाने की कोशिश कर रही है। 2027 से पहले संगठन में बदलाव और बूथ स्तर पर तैयारी इसी रणनीति का हिस्सा हैं। हालांकि चुनाव में पार्टी को कितना समर्थन मिलेगा, यह मतदाताओं के फैसले और चुनावी परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
बसपा के सामने हैं बड़ी राजनीतिक चुनौतियां
बसपा के सामने अब दलित वोट को लेकर पहले जैसी एकतरफा स्थिति नहीं है। भाजपा, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के अलावा चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी भी दलित मतदाताओं के बीच अपना आधार बढ़ाने में जुटी है। आजाद समाज पार्टी ने 2027 चुनाव के लिए 45 संभावित उम्मीदवारों के नाम भी घोषित किए हैं, जिनमें 16 OBC उम्मीदवार शामिल हैं। इससे मुकाबला और बहुकोणीय हो सकता है।
क्या दूसरे दल बसपा के वोट बैंक में लगा रहे हैं सेंध
2027 से पहले कई दल दलित मतदाताओं और बहुजन राजनीति से जुड़े नेताओं तक अपनी पहुंच बढ़ा रहे हैं। हाल में अलग-अलग राजनीतिक दलों की ओर से आकाश आनंद को अपने साथ जोड़ने की कोशिशों की खबरें भी सामने आई हैं। वहीं सपा गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित मतदाताओं के बीच अपना आधार बढ़ाने पर जोर दे रही है। ऐसे में बसपा के लिए अपने पारंपरिक वोट आधार को बनाए रखना एक अहम संगठनात्मक चुनौती होगी।





