रीवा के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल संजय गांधी में सोमवार रात करीब 10 बजे अचानक प्रशासनिक अमला पहुंचा तो अस्पताल प्रबंधन में हड़कंप मच गया। कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी और एसपी गुरू करण सिंह ने बिना पूर्व सूचना अस्पताल का औचक निरीक्षण किया। इमरजेंसी से लेकर अलग-अलग वार्डों तक व्यवस्थाएं देखीं, मरीजों और उनके परिजनों से सुविधाओं की जानकारी ली और जहां खामी मिली, वहां अधिकारियों ने मौके पर ही जवाबदेही तय करने के निर्देश दिए। इस निरीक्षण की सबसे अहम तस्वीर सफाई व्यवस्था को लेकर सामने आई। इमरजेंसी के बाहर गंदगी और अव्यवस्था देखकर कलेक्टर नाराज हो गए। सवाल सिर्फ गंदगी का नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का है जिसका सीधा संबंध मरीजों के इलाज और संक्रमण नियंत्रण से जुड़ा है। सरकारी अस्पताल में मरीज इलाज के लिए पहुंचता है, लेकिन अगर उसी परिसर में सफाई और स्वच्छता की व्यवस्था कमजोर मिले तो अस्पताल की पूरी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े होते हैं। यही वजह है कि कलेक्टर ने सिर्फ नाराजगी जाहिर करके मामला खत्म नहीं किया, बल्कि जिम्मेदार इंचार्ज का सात दिन का वेतन काटने के निर्देश दिए। यह कार्रवाई इस लिहाज से महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रशासन ने लापरवाही को व्यक्तिगत जवाबदेही से जोड़ने का संदेश दिया है।
सिर्फ सफाई नहीं, अस्पताल में अनुशासन भी फोकस में
निरीक्षण के दौरान मरीजों के साथ आने वाले अटेंडरों की संख्या को लेकर भी कलेक्टर ने निर्देश दिए। प्रभारी डीन डॉ. मनोज इंदुरकर को कहा गया कि मरीज के साथ केवल एक अटेंडर को रहने की अनुमति दी जाए। पहली नजर में यह निर्देश सामान्य लग सकता है, लेकिन बड़े सरकारी अस्पतालों में भीड़ अपने आप में एक बड़ी समस्या बन जाती है। ज्यादा लोगों की आवाजाही से वार्डों में अव्यवस्था बढ़ती है, मरीजों को परेशानी होती है और सुरक्षा व्यवस्था पर दबाव आता है। इसलिए अटेंडर की संख्या सीमित करने का मकसद केवल अनुशासन नहीं, बल्कि अस्पताल के अंदर नियंत्रित माहौल बनाना भी है। कलेक्टर ने बिना अनुमति लोगों के वार्ड में प्रवेश पर रोक लगाने के निर्देश देकर सुरक्षा व्यवस्था को भी प्राथमिकता दी। इसका मतलब साफ है कि प्रशासन अब अस्पताल को सिर्फ इलाज की जगह के तौर पर नहीं, बल्कि एक ऐसी संवेदनशील व्यवस्था के रूप में देख रहा है जहां स्वच्छता, सुरक्षा और अनुशासन तीनों एक साथ जरूरी हैं।
खुले में पड़े पुराने गद्दे ने खोली दूसरी पोल
निरीक्षण के दौरान ऑर्थोपेडिक्स वार्ड में पुराने गद्दे खुले में पड़े मिले। यह छोटी सी लापरवाही दिखाई दे सकती है, लेकिन अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थान पर सामान के रखरखाव और परिसर की व्यवस्था भी प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। पुराने गद्दों का खुले में पड़े मिलना यह सवाल खड़ा करता है कि अस्पताल में अनुपयोगी और पुराने सामान के निस्तारण या सुरक्षित भंडारण की व्यवस्था कितनी प्रभावी है। इसी मामले में जिम्मेदार इंचार्ज पर कार्रवाई के निर्देश दिए गए।यानी प्रशासन का संदेश सिर्फ इतना नहीं है कि ‘सफाई कराइए’, बल्कि यह है कि जिस हिस्से की जिम्मेदारी जिस अधिकारी या कर्मचारी की है, वहां कमी मिलने पर जवाब भी उसी से मांगा जाएगा।
कमिश्नर की बैठक के कुछ घंटे बाद औचक निरीक्षण
इस पूरे घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू है टाइमिंग। अस्पताल की व्यवस्थाओं को लेकर लगातार शिकायतों के बीच सोमवार को ही कमिश्नर शैलेंद्र सिंह ने अधिकारियों के साथ बैठक की थी। व्यवस्थाओं में सुधार और लापरवाही की स्थिति में जिम्मेदारी तय करने के निर्देश दिए गए थे। इसके कुछ ही घंटों बाद कलेक्टर और एसपी का रात में अचानक अस्पताल पहुंचना बताता है कि प्रशासनिक स्तर पर इस मुद्दे को गंभीरता से लिया जा रहा है। दिन में होने वाली बैठकों में अधिकारी रिपोर्ट के आधार पर व्यवस्थाओं का आकलन करते हैं, लेकिन रात का औचक निरीक्षण उस वास्तविक स्थिति को देखने की कोशिश है जो कागजों और बैठकों में दिखाई नहीं देती।
असली परीक्षा अब कार्रवाई के बाद
हालांकि इस निरीक्षण के बाद सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या अस्पताल की व्यवस्थाओं में स्थायी सुधार दिखाई देगा? सिर्फ सात दिन का वेतन काटना या फटकार लगाना तत्काल कार्रवाई जरूर है, लेकिन किसी बड़े अस्पताल की व्यवस्था सुधारने के लिए नियमित मॉनिटरिंग, सफाई की जवाबदेही, सुरक्षा व्यवस्था, भीड़ नियंत्रण और शिकायतों के त्वरित निपटारे की लगातार जरूरत होती है। संजय गांधी अस्पताल जैसे बड़े सरकारी अस्पताल में रोजाना बड़ी संख्या में मरीज आते हैं। ऐसे में छोटी प्रशासनिक लापरवाही भी बड़ी परेशानी में बदल सकती है। इसलिए औचक निरीक्षण का असली असर तभी माना जाएगा जब इसकी निगरानी आगे भी जारी रहे और आज मिली खामियां दोबारा सामने न आएं।
रीवा में देर रात हुआ यह औचक निरीक्षण एक स्पष्ट संदेश देता है—सरकारी अस्पतालों में अब सिर्फ इलाज की व्यवस्था नहीं, बल्कि हर स्तर पर जवाबदेही पर नजर है। गंदगी पर वेतन कटौती, पुराने गद्दों पर कार्रवाई और अटेंडरों की संख्या सीमित करने के निर्देश बताते हैं कि प्रशासन अस्पताल की व्यवस्था को कई स्तरों पर कसने की कोशिश कर रहा है। लेकिन अंतिम कसौटी कार्रवाई नहीं, उसका परिणाम होगा। मरीज को साफ परिसर, सुरक्षित वार्ड, नियंत्रित भीड़ और बेहतर इलाज मिले—यही किसी भी सरकारी अस्पताल की व्यवस्था की असली परीक्षा है।