मप्र में एनीमिया बना बड़ी स्वास्थ्य चुनौती, हर दस में से पांच बच्चे खून की कमी से पीड़ित
भोपाल।मध्यप्रदेश में खून की कमी यानी एनीमिया एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती के रूप में सामने आ रही है। एनीमिया मुक्त भारत कार्यक्रम 2025-26 की ताजा स्क्रीनिंग रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में 5 वर्ष से कम उम्र के हर 10 में से 5 बच्चे एनीमिया से पीड़ित पाए गए हैं। यही नहीं, हर 10 में से 3 महिलाओं में भी खून की कमी की समस्या सामने आई है। ये आंकड़े राज्य में कुपोषण और असंतुलित खान-पान की गंभीर स्थिति की ओर साफ इशारा करते हैं।
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार, एनीमिया बच्चों और महिलाओं के शारीरिक और मानसिक विकास पर सीधा असर डालता है। बच्चों में एनीमिया से शारीरिक वृद्धि रुक सकती है, रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है और सीखने की क्षमता भी प्रभावित होती है। वहीं महिलाओं में यह समस्या गर्भावस्था के दौरान जटिलताओं, प्रसव के समय जोखिम और कार्यक्षमता में कमी का कारण बन सकती है।
हर दूसरी बच्चे में एनीमिया चिंता का विषय
ताजा रिपोर्ट में सामने आया है कि प्रदेश में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में एनीमिया की दर लगभग 50 प्रतिशत तक पहुंच गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कुपोषण, आयरन युक्त आहार की कमी, बार-बार होने वाले संक्रमण और जागरूकता की कमी जैसे कारण जिम्मेदार हैं। ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में स्थिति और भी गंभीर बताई जा रही है, जहां संतुलित आहार और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सीमित है।
महिलाओं में भी बड़ी समस्या
रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश की करीब 30 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से ग्रसित हैं। किशोरियों, गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं में यह समस्या ज्यादा देखने को मिल रही है। डॉक्टरों का कहना है कि अनियमित खान-पान, आयरन और फोलिक एसिड की कमी, बार-बार गर्भधारण और स्वास्थ्य जांच में लापरवाही इसके प्रमुख कारण हैं।
पहचान के साथ तुरंत इलाज
हालांकि, इन चिंताजनक आंकड़ों के बीच एक राहत की बात यह है कि राज्य में एनीमिया से पीड़ित बच्चों और महिलाओं की समय पर पहचान कर उन्हें तुरंत इलाज उपलब्ध कराया जा रहा है। स्क्रीनिंग के दौरान एनीमिया पाए जाने पर आयरन-फोलिक एसिड की गोलियां, सिरप और जरूरी पोषण सप्लीमेंट दिए जा रहे हैं। गंभीर मामलों में स्वास्थ्य केंद्रों पर विशेष उपचार की व्यवस्था भी की गई है।
एनीमिया मुक्त भारत अभियान में मप्र अव्वल
इस बड़ी स्वास्थ्य चुनौती के बावजूद मध्यप्रदेश के लिए एक सकारात्मक पहलू यह है कि एनीमिया मुक्त भारत अभियान के क्रियान्वयन में राज्य लगातार छह महीनों से देशभर में पहले स्थान पर बना हुआ है। केंद्र सरकार की निगरानी रिपोर्ट के अनुसार, स्क्रीनिंग, उपचार और फॉलोअप के मामलों में प्रदेश का प्रदर्शन बेहतर रहा है।
इस सफलता का श्रेय मुख्य रूप से हेल्थ वर्कर्स, आशा कार्यकर्ताओं और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को दिया जा रहा है। ये जमीनी स्तर पर घर-घर जाकर बच्चों और महिलाओं की जांच कर रहे हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचा रहे हैं।
स्वास्थ्य मंत्री ने सराहा टीमवर्क
प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री और उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला ने एनीमिया मुक्त भारत अभियान में मिली सफलता को स्वास्थ्य विभाग के सामूहिक प्रयासों का परिणाम बताया है। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि डॉक्टरों, नर्सों, पैरामेडिकल स्टाफ, आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के टीमवर्क और प्रतिबद्धता का नतीजा है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार का लक्ष्य केवल आंकड़ों में सुधार नहीं, बल्कि प्रदेश को वास्तव में एनीमिया मुक्त बनाना है।
आगे की चुनौती
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि एनीमिया की समस्या से निपटने के लिए सिर्फ दवाइयों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए पोषण युक्त आहार, स्वच्छता, स्वास्थ्य शिक्षा और जागरूकता को भी प्राथमिकता देनी होगी। हरी पत्तेदार सब्जियां, दालें, फल, आयरन युक्त अनाज और संतुलित भोजन को रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल करना जरूरी है।
जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार
सरकार और स्वास्थ्य विभाग की कोशिशों के साथ-साथ आम जनता की भागीदारी भी इस अभियान की सफलता के लिए अहम है। समय-समय पर स्वास्थ्य जांच, बच्चों और महिलाओं को पोषण संबंधी जानकारी देना और एनीमिया के लक्षणों को हल्के में न लेना ही इस बीमारी से लड़ने का सबसे मजबूत उपाय है।
कुल मिलाकर, मध्यप्रदेश में एनीमिया एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती जरूर बना हुआ है, लेकिन संगठित प्रयासों और जागरूकता के जरिए इसे नियंत्रित करने की दिशा में राज्य तेजी से आगे बढ़ रहा है।





