महाराष्ट्र निकाय चुनाव: एकनाथ की शिवसेना में हुई बड़ी बगावत,
मुंबई में 200 से अधिक कार्यकर्ताओं का सामूहिक इस्तीफा
महाराष्ट्र में होने वाले निकाय चुनावों से पहले डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे की शिवसेना को मुंबई में बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव की तैयारियों के बीच पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आ गया है। मुंबई के गोरेगांव और दिंडोशी इलाके में शिंदे गुट के 200 से अधिक पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने एक साथ इस्तीफा दे दिया है। इस घटनाक्रम से न सिर्फ पार्टी की स्थानीय संगठनात्मक स्थिति पर सवाल उठे हैं, बल्कि महायुति की चुनावी रणनीति को भी बड़ा झटका लगा है।
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निकाय चुनाव में शिंदे गुट संकट
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शिवसेना शिंदे में बड़ी बगावत
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मुंबई में 200 शिवसैनिकों इस्तीफा
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गोरेगांव से शिंदे गुट को झटका
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टिकट बंटवारे से कार्यकर्ता नाराज़
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प्रभाग 54 विवाद बना वजह
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शिंदे गुट के बागी निर्दलीय
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निकाय चुनाव से पहले संगठन हिला
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यूबीटी का सत्ता दुरुपयोग आरोप
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महायुति के लिए बढ़ी मुश्किलें
टिकट बंटवारे को लेकर फूटा आक्रोश
इस्तीफा देने वाले कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सीटों और पदों के बंटवारे में उनके साथ खुला अन्याय किया गया। गोरेगांव के पुराने और निष्ठावान शिवसैनिकों का कहना है कि उन्होंने वर्षों तक पार्टी के लिए काम किया, लेकिन टिकट वितरण के समय उनकी मेहनत और समर्पण को नजरअंदाज कर दिया गया। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि पार्टी नेतृत्व ने स्थानीय नेताओं की अनदेखी करते हुए बाहरी और नए चेहरों को प्राथमिकता दी।
विशेष रूप से प्रभाग क्रमांक 54 को लेकर नाराजगी चरम पर है। यह प्रभाग पहले शिंदे गुट के हिस्से में था, लेकिन गठबंधन के तहत इसे बीजेपी को सौंप दिया गया, जिससे स्थानीय शिवसैनिकों में भारी आक्रोश फैल गया। कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिस सीट पर उन्होंने वर्षों तक संगठन को मजबूत किया, वही सीट बिना उनसे चर्चा किए सहयोगी दल को दे दी गई।
35 से 40 पदाधिकारी निर्दलीय चुनाव की तैयारी में
सूत्रों के मुताबिक, शिंदे गुट के 35 से 40 पदाधिकारी अब निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। इन बागी नेताओं ने स्पष्ट कर दिया है कि वे नामांकन वापस लेने के मूड में नहीं हैं। नामांकन वापसी की अंतिम तारीख से ठीक पहले इतनी बड़ी संख्या में इस्तीफों ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है।
इस्तीफा देने वाले नेताओं का कहना है कि यह फैसला अचानक नहीं लिया गया, बल्कि लंबे समय से उपेक्षा और अनदेखी का नतीजा है। उनका आरोप है कि वरिष्ठ नेताओं ने न तो उनकी बात सुनी और न ही उनकी भावनाओं को समझने की कोशिश की।
“पार्टी ने हमारी निष्ठा को ठेस पहुंचाई” – नाराज कार्यकर्ता
नाराज कार्यकर्ताओं ने कहा कि वे वर्षों से शिवसेना की विचारधारा के साथ जुड़े रहे हैं और हर चुनाव में पार्टी के लिए जमीन पर काम किया। लेकिन इस बार टिकट और पद वितरण में योग्यता और निष्ठा के बजाय राजनीतिक समीकरणों को तरजीह दी गई।
एक पूर्व विभाग प्रमुख ने कहा,
“हमने पार्टी के लिए दिन-रात मेहनत की, लेकिन जब टिकट देने की बारी आई तो हमें पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। यह सिर्फ सीट का सवाल नहीं है, बल्कि सम्मान और आत्मसम्मान का मुद्दा है।”
शिंदे गुट की मुश्किलें बढ़ीं
मुंबई महानगरपालिका चुनाव को लेकर पहले ही मुकाबला बेहद कड़ा माना जा रहा है। ऐसे में अपने ही संगठन के भीतर इस तरह की बगावत ने शिंदे गुट की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। गोरेगांव और दिंडोशी जैसे इलाकों में शिवसेना का पारंपरिक जनाधार रहा है, और यहां संगठन में टूट का असर चुनावी परिणामों पर पड़ सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बागी उम्मीदवार मैदान में बने रहते हैं, तो इससे शिंदे गुट के वोटों में सीधा विभाजन हो सकता है, जिसका फायदा विपक्षी दलों को मिलेगा।
शिवसेना (UBT) का हमला, सत्ता के दुरुपयोग का आरोप
इस पूरे घटनाक्रम के बाद शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट) ने शिंदे गुट पर तीखा हमला बोला है। यूबीटी गुट का आरोप है कि सत्ता में होने के बावजूद शिंदे गुट अपने संगठन को संभालने में नाकाम रहा है। साथ ही उन्होंने यह भी दावा किया कि सत्ता का दुरुपयोग कर विपक्षी उम्मीदवारों पर नाम वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है।
शिवसेना (UBT) के नेताओं ने कहा कि शिंदे गुट में अंदरूनी असंतोष यह साबित करता है कि पार्टी का आधार कमजोर हो चुका है और कार्यकर्ता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
महायुति के लिए खतरे की घंटी?
शिंदे गुट की शिवसेना, बीजेपी और अन्य सहयोगी दलों की महायुति इस चुनाव में बड़ी ताकत के रूप में उतरने की तैयारी कर रही थी। लेकिन मुंबई जैसे अहम राजनीतिक मैदान में अपने ही कार्यकर्ताओं का इस तरह विद्रोह करना गठबंधन के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा है।
अगर आने वाले दिनों में पार्टी नेतृत्व बागी नेताओं को मनाने में असफल रहता है, तो यह असंतोष अन्य इलाकों में भी फैल सकता है। इससे न सिर्फ शिंदे गुट, बल्कि पूरी महायुति की चुनावी रणनीति प्रभावित हो सकती है।
फिलहाल सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या एकनाथ शिंदे या पार्टी के वरिष्ठ नेता नाराज कार्यकर्ताओं से बातचीत कर कोई समाधान निकाल पाते हैं या नहीं। चुनावी समय नजदीक होने के कारण समय बहुत कम है। अगर जल्द समाधान नहीं हुआ, तो यह बगावत मुंबई महानगरपालिका चुनाव में शिंदे गुट के लिए बड़ा राजनीतिक नुकसान साबित हो सकती है। मुंबई निकाय चुनाव से पहले शिंदे की शिवसेना में हुआ यह सामूहिक इस्तीफा केवल संगठनात्मक संकट नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर गहरे असंतोष का संकेत है। सीट बंटवारे और स्थानीय नेतृत्व की अनदेखी जैसे मुद्दे आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति को और गर्मा सकते हैं। अब यह देखना अहम होगा कि पार्टी नेतृत्व इस संकट से कैसे निपटता है और क्या बागी कार्यकर्ताओं को वापस संगठन में लाने में सफल हो पाता है।