मध्यप्रदेश को निवेशकों का पसंदीदा डेस्टिनेशन बनाने की दिशा में राज्य सरकार लगातार अपनी औद्योगिक रणनीति को विस्तार दे रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का यह दावा कि मध्यप्रदेश अब देश-दुनिया के निवेशकों के भरोसेमंद केंद्र के रूप में उभर रहा है, सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं बल्कि पिछले कुछ समय में लिए गए नीतिगत फैसलों और निवेश प्रस्तावों की ग्राउंड प्रोग्रेस से जोड़कर देखा जा सकता है। नई दिल्ली में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के साथ राष्ट्रीय औद्योगिक कॉरिडोर विकास एवं कार्यान्वयन ट्रस्ट की शीर्ष मॉनिटरिंग अथॉरिटी की बैठक में मध्यप्रदेश का प्रतिनिधित्व इसी रणनीति का हिस्सा है।
औद्योगिक विकास की रफ्तार से बदली MP की तस्वीर
- निवेश के नक्शे पर MP की मजबूत छलांग
- 30 लाख करोड़ के प्रस्ताव, 30% जमीन पर
- 25 नई नीतियों से आसान हुआ कारोबार
- लैंडबैंक और बिजली बनी बड़ी ताकत
- भव्या योजना से औद्योगिक विस्तार की तैयारी
- रोजगार के साथ विकास का नया मॉडल
मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी ताकत उसका भौगोलिक विस्तार और उपलब्ध लैंडबैंक माना जा रहा है। किसी भी बड़े उद्योग के लिए जमीन, बिजली, पानी, कनेक्टिविटी और प्रशासनिक मंजूरियां निर्णायक कारक होते हैं। राज्य सरकार का दावा है कि प्रदेश में पर्याप्त औद्योगिक भूमि उपलब्ध है और बिजली के साथ नवकरणीय ऊर्जा की भी पर्याप्त क्षमता है। ऐसे समय में जब देश और दुनिया की कंपनियां उत्पादन लागत, ऊर्जा सुरक्षा और सप्लाई चेन को लेकर नए निवेश केंद्र तलाश रही हैं, मध्यप्रदेश अपनी भौगोलिक स्थिति को भी एक बड़े प्रतिस्पर्धात्मक लाभ के रूप में पेश कर सकता है।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है नीतिगत सुधार। सरकार के अनुसार 25 से अधिक नई औद्योगिक नीतियों के जरिए व्यापार और उद्योगों से जुड़ी प्रक्रियाओं को सरल, पारदर्शी और सुगम बनाने का प्रयास किया गया है। निवेशक केवल आकर्षक घोषणाओं से प्रभावित नहीं होता। उसके लिए जरूरी है कि जमीन मिलने से लेकर अनुमति, बिजली कनेक्शन, उत्पादन शुरू करने और बाजार तक पहुंचने की प्रक्रिया कितनी तेज और स्पष्ट है। इसलिए निवेश आकर्षित करने की वास्तविक प्रतिस्पर्धा अब केवल टैक्स या सब्सिडी तक सीमित नहीं है, बल्कि ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और ईज ऑफ सेटिंग अप पर भी निर्भर करती है।
मध्यप्रदेश की निवेश रणनीति में ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट-2025 को भी महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। सरकार के मुताबिक समिट में करीब 30 लाख करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए थे, जिनमें से लगभग 30 प्रतिशत प्रस्ताव अब धरातल पर उतर चुके हैं। यदि यह आंकड़ा परियोजनाओं की वास्तविक स्थापना, निर्माण और रोजगार सृजन में बदलता है तो यह प्रदेश की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। हालांकि निवेश प्रस्ताव और वास्तविक निवेश के बीच अंतर को हमेशा ध्यान में रखना जरूरी है। किसी भी राज्य की सफलता का असली पैमाना एमओयू की संख्या नहीं, बल्कि जमीन पर शुरू हुए प्रोजेक्ट, लगाए गए पूंजी निवेश और पैदा हुए रोजगार होते हैं।
यहीं मुख्यमंत्री का ‘रोजगार एवं उद्योग वर्ष’ वाला विजन भी महत्वपूर्ण हो जाता है। औद्योगिक निवेश का सबसे बड़ा सामाजिक प्रभाव रोजगार के रूप में सामने आता है। यदि नए उद्योग स्थानीय युवाओं को बड़े पैमाने पर रोजगार देते हैं तो इसका प्रभाव केवल एक फैक्ट्री तक सीमित नहीं रहता। उसके आसपास परिवहन, लॉजिस्टिक्स, होटल, आवास, छोटे कारोबार, सर्विस सेक्टर और स्थानीय सप्लाई चेन भी विकसित होती है। यानी एक बड़ा औद्योगिक प्रोजेक्ट पूरे क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को गति दे सकता है।
इसी क्रम में पीएम मित्र पार्क भी मध्यप्रदेश की औद्योगिक महत्वाकांक्षा का महत्वपूर्ण उदाहरण है। टेक्सटाइल सेक्टर से जुड़े ऐसे एकीकृत पार्कों का उद्देश्य उत्पादन से लेकर प्रोसेसिंग और निर्यात तक पूरी वैल्यू चेन को एक स्थान पर विकसित करना है। इससे उद्योगों को साझा अधोसंरचना मिलने के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार और सहायक उद्योगों के अवसर बढ़ सकते हैं।
अब नजर भव्या यानी भारत औद्योगिक विकास योजना पर भी है। केंद्र सरकार की 33,660 करोड़ रुपए की इस योजना के तहत वित्त वर्ष 2026-27 से 2031-32 के बीच देश में 100 ‘प्लग-एंड-प्ले’ औद्योगिक पार्क विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। मध्यप्रदेश इस योजना के जरिए अपने औद्योगिक प्रस्तावों को राष्ट्रीय औद्योगिक विकास की बड़ी तस्वीर से जोड़ने की कोशिश कर रहा है। प्लग-एंड-प्ले मॉडल का सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि कंपनियों को बुनियादी ढांचे और जरूरी सुविधाओं के लिए लंबी प्रारंभिक प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़े।
लेकिन चुनौती भी उतनी ही बड़ी है। निवेशक सम्मेलन से निवेश को जमीन पर उतारना, समय पर मंजूरियां देना, कुशल मानव संसाधन उपलब्ध कराना, सड़क-रेल-हवाई कनेक्टिविटी मजबूत करना और स्थानीय स्तर पर औद्योगिक इकोसिस्टम विकसित करना जरूरी होगा। इसके अलावा निवेश का संतुलित क्षेत्रीय वितरण भी महत्वपूर्ण है, ताकि विकास केवल चुनिंदा औद्योगिक शहरों तक सीमित न रहे।
कुल मिलाकर मध्यप्रदेश अब निवेश आकर्षित करने से आगे बढ़कर निवेश को उत्पादन, उत्पादन को रोजगार और रोजगार को आर्थिक विकास में बदलने की चुनौती के दौर में प्रवेश कर चुका है। यदि 30 प्रतिशत निवेश प्रस्तावों का जमीन पर उतरना आगे भी तेज गति से जारी रहता है, तो प्रदेश की औद्योगिक अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिल सकती है। क्योंकि निवेशक सम्मेलन की असली सफलता मंच पर हुए समझौतों से नहीं, बल्कि जमीन पर उठती फैक्ट्रियों की चिमनियों, बनते औद्योगिक शहरों और युवाओं के हाथों में आते रोजगार से तय होगी।