एमपी में ​थर्ड फ्रंट, एमपी की धरती पर सियासी रण, बसपा और आप के बाद सपा साधेगी वोट बैंक

Mayawati Akhilesh Yadav Kejriwal

मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले तीसरा मोर्चा प्रदेश के विंध्य अंचल में सक्रिय हो गया है। इस इलाके में आम आदमी पार्टी अपने लिए जमीन तैयार करने की कोशिशों में जुटी है तो वहीं बसपा और सपा भी इस क्षेत्र में अपनी खोई जमीन को फिर से पाने की कवायद में जुट गई है। मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले तीसरा मोर्चा प्रदेश के विंध्य अंचल में सक्रिय हो गया है। इस इलाके में आम आदमी पार्टी अपने लिए जमीन तैयार करने की कोशिशों में जुटी है तो वहीं समाजवादी पार्टी भी इस क्षेत्र में अपनी खोई जमीन को फिर से पाने की कवायद में जुट गई है। इसी के तहत सपा सु​प्रीमो अखिलेश यादव दो दिन के विंध्य दौरे पर आने वाले हैं। वे आज और कल मप्र के चुनावी दौरे पर रहेंगे। इस दौरान रीवा के सिरमोर में जनसभा के साथ कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करेंगे।

सपा बसपा और आप आजमा रही किस्मत

मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव की तैयारियों में सपा ने जमीनी कार्यकर्ताओं की सक्रियता को बढ़ाने के लिए कार्यकर्ता सम्मेलन करने का फैसला लिया है। सपा और आप के साथ बसपा भी पीछे नहीं है। बसपा हमेशा से ही विंध्य में मजबूत रही है। इस क्षेत्र से ही बसपा ने 1991 में पहली बार लोकसभा चुनाव में जीत हासिल की थी। पांच साल बाद 1996 में दो लोस सीटें जीती। पार्टी के सांसद सुखलाल कुशवाह ने कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे अर्जुन सिंह और बीजेपी के वीरेंद्र कुमार सकलेचा को हराया था। मध्य प्रदेश में आने वाले विधानसभा के चुनावों में आम आदमी पार्टी की ‘एंट्री’ से एक बार फिर क्षेत्रीय दलों और उनके प्रभाव पर बहस छिड़ गई है। मौजूदा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में मध्य प्रदेश की राजनीति में छोटे या क्षेत्रीय दलों का उतना प्रभाव बाक़ी नहीं बचा है जितना किसी समय हुआ करता था। ऐसे में आम आदमी पार्टी के चुनावी समर में कूदने से क्षेत्रीय दलों के प्रभाव और उनकी प्रासंगिकता को लेकर चर्चा हो रही है। अब तक जितने क्षेत्रीय दल मध्य प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहे, उनका प्रभाव अलग-अलग इलाक़ों में सीमित रहा। जैसे समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का प्रभाव उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे इलाक़ों में रहा, जबकि गोंडवाना गणतंत्र पार्टी मूल रूप से आदिवासी बहुल इलाक़ों में सक्रिय रही। साल 2018 के विधानसभा के चुनावों में बसपा को 5.11 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि समाजवादी पार्टी को 6.26 प्रतिशत। वहीं केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को 0.78 प्रतिशत मत ही मिल पाए थे।

विंध्य में बसपा हमेशा रही है मजबूत

बसपा हमेशा से ही विंध्य में मजबूत रही है। इस क्षेत्र से ही बसपा ने 1991 में पहली बार लोकसभा चुनाव में जीत हासिल की थी। तब पार्टी प्रत्याशी भीम सिंह ने रीवा में कांग्रेस और बीजेपी दोरों ही पार्टियों को पीछे छोड़ते हुए जीत हासिल की थी। पांच साल बाद 1996 में दो लोस सीटें जीती। पार्टी के सांसद सुखलाल कुशवाह ने कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे अर्जुन सिंह और बीजेपी के वीरेंद्र कुमार सकलेचा को हराया था। पार्टी प्रदेश अध्यक्ष रमाकांत पिप्पल ने कहा कि इस बार फिर विंध्य में पूरे दम से लड़ेंगे। बीएसपी ने उत्तर प्रदेश से सटे 7 विधानसभा क्षेत्रों के लिए प्रत्याशियों के नामों का ऐलान भी कर दिया है। इसमें चंबल से एक, बुंदेलखंडे क्षेत्र से 2 और विंध्य क्षेत्र से विधानसभा की 4 सीटें शामिल हैं। उम्मीदवारों की लिस्ट में दलित , ब्राह्मण , पटेल और ठाकुर वर्ग से हैं। समाजवादी पार्टी की भूमिका की बात करें, तो उत्तरप्रदेश से इलाके में इसका कुछ हद तक प्रभाव है। 2018 के विधानसभा चुनाव में सपा मध्यप्रदेश में 1 सीट जीतने में सफल रही थी। पूरे प्रदेश में उसने 52 प्रत्याशी उतारे थे। उसे 1.3 प्रतिशत वोट शेयर प्राप्त हुआ था।इससे पहले, 2003 के विधानसभा चुनाव में एसपी का सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा था। तब 161 सीटों पर एसपी ने चुनाव लड़ा था और उसके 7 प्रत्याशियों की जीत हुई थी। उस समय पार्टी को प्रदेश में 5 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे। इस बार ​भी सपा अपनी खोई सियासी जमीन एमपी में तलाशती नजर आ रही है। बता दें आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल द्वारा हाल में सतना और रीवा में कार्यक्रम कर चुके हैं। आप की प्रदेश अध्यक्ष रानी अग्रवाल विंध्य के सिंगरौली से ही मेयर हैं। इन पार्टियों का कहना है कि इस क्षेत्र में कांग्रेस मजबूत नहीं है और बीजेपी के लिए गुस्सा है। इतना ही नहीं ये दल यूपी से सटे बुंदेलखंड और चंबल में भी प्रभाव दिखाने के मूड में हैं।

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