चंद्र ग्रहण 2026: राम मंदिर से काशी विश्वनाथ त0क बंद रहे कपाट, शुद्धिकरण के बाद खुले दर्शन द्वार
लखनऊ/अयोध्या/वाराणसी। चंद्र ग्रहण 2026 के प्रभाव के चलते उत्तर प्रदेश के प्रमुख मंदिरों में दिनभर विशेष व्यवस्थाएं लागू रहीं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूतक काल प्रारंभ होते ही कई प्रमुख मंदिरों के कपाट श्रद्धालुओं के लिए बंद कर दिए गए। ग्रहण समाप्ति के बाद शाम करीब 7 बजे शुद्धिकरण, स्नान और विशेष आरती के उपरांत ही दर्शन दोबारा शुरू किए गए।
सबसे अधिक प्रभाव अयोध्या स्थित राम मंदिर, वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर और वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में देखने को मिला। इन मंदिरों में ग्रहण के दौरान नियमित पूजा-अर्चना स्थगित रही और केवल आवश्यक धार्मिक अनुष्ठान ही सीमित रूप से संपन्न किए गए।
सूतक काल में बंद रहे मंदिरों के कपाट
धार्मिक परंपराओं के अनुसार ग्रहण लगने से लगभग नौ घंटे पहले सूतक काल आरंभ हो जाता है। इसी मान्यता के तहत सुबह से ही मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं को सूचना जारी कर दी थी कि ग्रहण के दौरान मंदिरों में प्रवेश वर्जित रहेगा। अयोध्या में रामलला के दरबार के कपाट सूतक लगते ही बंद कर दिए गए थे। वाराणसी में बाबा विश्वनाथ के गर्भगृह के दर्शन भी स्थगित रहे। वृंदावन में बांके बिहारी मंदिर में भी दर्शन व्यवस्था रोकी गई।
मंदिरों के बाहर सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के विशेष इंतजाम किए गए थे ताकि श्रद्धालु असुविधा से बच सकें। कई स्थानों पर एलईडी स्क्रीन के माध्यम से श्रद्धालुओं को ग्रहण की जानकारी और धार्मिक महत्व समझाया गया।
ग्रहण समाप्ति के बाद शुद्धिकरण
ग्रहण समाप्त होने के बाद शाम लगभग 7 बजे से मंदिरों में शुद्धिकरण की प्रक्रिया शुरू हुई। गर्भगृह, परिक्रमा मार्ग और मंदिर परिसर में गंगाजल व पवित्र जल से छिड़काव किया गया। इसके बाद विशेष मंत्रोच्चार और वैदिक विधि से पूजा संपन्न हुई।
अयोध्या में रामलला की विशेष आरती आयोजित की गई, जिसमें सीमित संख्या में पुजारियों और प्रशासनिक अधिकारियों की उपस्थिति रही। वाराणसी में बाबा विश्वनाथ की भव्य संध्या आरती के बाद श्रद्धालुओं के लिए द्वार खोले गए। वृंदावन में भी बांके बिहारी जी की झांकी के साथ भक्तों को दर्शन का अवसर मिला।
श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़
ग्रहण समाप्ति और शुद्धिकरण के बाद जैसे ही कपाट खुले, बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिरों की ओर उमड़ पड़े। कई लोग दिनभर उपवास रखकर शाम के दर्शन का इंतजार कर रहे थे। वाराणसी में गंगा घाटों पर भी श्रद्धालुओं ने स्नान कर दान-पुण्य किया।
अयोध्या में दर्शन के लिए कतारें लंबी रहीं, जबकि वृंदावन में भी भक्तों का उत्साह देखने लायक था। प्रशासन ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बैरिकेडिंग और अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया।
ज्योतिषीय और धार्मिक महत्व
ग्रहण समाप्ति के बाद शुद्धिकरण
धार्मिक विद्वानों के अनुसार चंद्र ग्रहण का विशेष आध्यात्मिक महत्व होता है। इस दौरान मंदिरों में मूर्तियों को ढक दिया जाता है और नियमित भोग-प्रसाद अर्पित नहीं किया जाता। ग्रहण समाप्ति के बाद शुद्धिकरण के साथ पुनः पूजा प्रारंभ होती है।
पंडितों का कहना है कि ग्रहण काल में मंत्र जाप, ध्यान और दान का विशेष फल मिलता है। हालांकि मंदिरों के कपाट बंद रहने के बावजूद कई श्रद्धालुओं ने घरों में पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठान किए।
राज्य सरकार और जिला प्रशासन ने पहले से ही मंदिरों को निर्देश जारी कर दिए थे कि ग्रहण के दौरान सुरक्षा और अनुशासन बनाए रखा जाए। सभी प्रमुख मंदिरों में सीसीटीवी निगरानी और आपातकालीन सेवाएं सक्रिय रहीं।वाराणसी और अयोध्या जैसे धार्मिक शहरों में मेडिकल टीम और आपदा प्रबंधन दल भी अलर्ट पर थे, ताकि किसी भी अप्रत्याशित स्थिति से निपटा जा सके।
शाम की आरती और शुद्धिकरण के बाद सभी मंदिरों में नियमित पूजा-अर्चना की व्यवस्था बहाल कर दी गई। प्रशासन ने बताया कि दर्शन सुचारू रूप से जारी हैं और अगले दिन से मंदिरों का समय सामान्य रहेगा।
चंद्र ग्रहण के इस अवसर पर जहां एक ओर खगोलीय घटना को लेकर उत्सुकता रही, वहीं धार्मिक परंपराओं का भी पूरी आस्था और अनुशासन के साथ पालन किया गया। राम मंदिर से काशी विश्वनाथ और बांके बिहारी तक, उत्तर प्रदेश के प्रमुख तीर्थस्थलों ने एक बार फिर परंपरा और श्रद्धा का संतुलित उदाहरण प्रस्तुत किया।





