लाड़ली बहना महंगी पड़ रही’… मजाक या बड़ा सियासी संदेश?…जानें कैसी हे मध्यप्रदेश की आर्थिक स्थिति…कितने कर्जे में डूबी है सरकार

Ladli Behna scheme proving costly a joke or a major political message Find out the state of Madhya Pradesh economy

मध्य प्रदेश की सियासत में लाड़ली बहना योजना सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि महिला वोट बैंक से जुड़ा सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है। ऐसे में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का एक निजी कार्यक्रम में सोशल मीडिया एंफ्लूएंसर के सवाल पर हंसते हुए यह कहना कि “लाड़ली बहना ही बहुत महंगी पड़ रही हैं… ये बड़ी अंदर की बात है… मुझे क्या मालूम था कि मुख्यमंत्री बनते ही इतनी भारी मार पड़ती है” अब सियासी बहस का विषय बन गया है।

मुख्यमंत्री ने यह बात मजाकिया अंदाज में कही, माहौल भी हल्का-फुल्का था और उनके बयान के बाद वहां ठहाके और तालियां भी सुनाई दीं। लेकिन राजनीति में कई बार मजाक में कही गई बात भी गंभीर संदेश पैदा कर देती है। यही वजह है कि वीडियो सामने आते ही विपक्ष ने इसे मुद्दा बना लिया।

लाड़ली बहना पर विपक्ष को मिला हथियार

सरकार की तरफ से तस्वीर का दूसरा पहलू भी सामने रखा गया है। योजना की शुरुआत में महिलाओं को 1,000 रुपये प्रतिमाह दिए जाते थे। जिसे बढ़ाकर अब 1,500 रुपये प्रतिमाह किया गया है। योजना की किस्तें लगातार जारी रही हैं। यानी सरकार के लिए यह सिर्फ चुनावी घोषणा नहीं, बल्कि प्रदेश की करोड़ों महिलाओं से जुड़ी नियमित वित्तीय प्रतिबद्धता बन चुकी है।

हर महीने हजारों करोड़ की जिम्मेदारी

यहीं से मुख्यमंत्री के मजाकिया बयान का आर्थिक पहलू सामने आता है। जब किसी सरकार की बड़ी आबादी को हर महीने सीधे खाते में राशि भेजी जाती है, तो यह उसके बजट पर स्थायी वित्तीय दबाव भी बनाता है।
योजना का राजनीतिक लाभ जितना बड़ा है, वित्तीय दायित्व भी उतना ही बड़ा है। यही कारण है कि “महंगी पड़ रही हैं” जैसी टिप्पणी को केवल हंसी-मजाक कहकर नजरअंदाज करना आसान नहीं है। लेकिन इसका यह मतलब निकालना भी सही नहीं होगा कि सरकार लाड़ली बहना योजना को बंद करने या घटाने जा रही है। उपलब्ध राजनीतिक संकेत इसके उलट हैं। सरकार लगातार महिला हितैषी योजनाओं को अपनी प्राथमिकताओं में रखती रही है।

अब कर्ज का एंगल भी जुड़ गया

इसी बीच मध्य प्रदेश सरकार की नई उधारी ने बहस को और धार दे दी है। सरकार ने हाल ही में 1,500 करोड़ रुपये का नया कर्ज लिया है। इसमें 800 करोड़ रुपये का ऋण 18 साल के लिए और 700 करोड़ रुपये का ऋण 30 साल के लिए लिया गया है। वित्त वर्ष 2026-27 में अप्रैल से अब तक तक मध्यप्रदेश सरकार पर उधारी की राशि करीब 54 हजार करोड़ रुपये बढ़ गई है। सितंबर 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार राज्य सरकार पर कर्ज करीब 5.42 लाख ककरोड़ रुपये तक पहुंच चुका था। अतिरिक्त बॉन्ड और दूसरी देनदारियों को जोड़ने पर यह आंकड़ा इससे ऊपर जाने की चर्चा भी है। अब विपक्ष स्वाभाविक तौर पर दो मुद्दों को जोड़ने की कोशिश करेगा—एक तरफ लाड़ली बहना पर बड़ा खर्च और दूसरी तरफ लगातार बढ़ता कर्ज।

असल सियासी सवाल क्या है?

दरअसल, असली सवाल यह नहीं है कि मुख्यमंत्री ने मजाक किया या गंभीर टिप्पणी। असली सवाल यह है कि क्या लाड़ली बहना जैसी योजनाओं का खर्च मध्य प्रदेश की वित्तीय सेहत पर कितना दबाव डाल रहा है और सरकार इसे लंबे समय तक कैसे वहन करेगी? साथ ही यह भी देखना होगा कि इस योजना से महिलाओं की आर्थिक स्थिति, परिवार की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ा है। इसलिए मुख्यमंत्री का बयान आने वाले दिनों में सिर्फ सोशल मीडिया की वायरल क्लिप बनकर नहीं रहने वाला। 2028 विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच यह बहस फिर उठ सकती है कि लाड़ली बहना बीजेपी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक सहारा है या सरकार के लिए सबसे बड़ी वित्तीय चुनौती।

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