Jawaharlal Nehru University (JNU) एक बार फिर हिंसा की घटनाओं को लेकर सुर्खियों में है। देश की राजधानी में स्थित यह केंद्रीय विश्वविद्यालय लंबे समय से अपने बौद्धिक माहौल, राजनीतिक सक्रियता और वैचारिक बहसों के लिए पहचाना जाता रहा है। लेकिन इसी पहचान के साथ विवाद और टकराव भी जुड़ते रहे हैं। ताजा घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर जेएनयू में बार-बार हिंसा की स्थिति क्यों बन जाती है और क्या इससे विश्वविद्यालय की शैक्षणिक छवि प्रभावित हो रही है।
ताजा विवाद की पृष्ठभूमि
हालिया हिंसा की शुरुआत विश्वविद्यालय की कुलपति शांतिश्री धुलीपुड़ी पंडित के एक बयान से हुई। एक पॉडकास्ट में यूजीसी नियमों को लेकर दिए गए उनके वक्तव्य को वामपंथी छात्र संगठनों ने कथित तौर पर जातिवादी और पक्षपातपूर्ण बताया। इसके बाद छात्रसंघ पदाधिकारियों के निलंबन ने मामले को और गरमा दिया। जेएनयू छात्रसंघ ने इस फैसले के विरोध में मार्च निकालने का आह्वान किया।
मार्च के दौरान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad और वामपंथी छात्र संगठनों के कार्यकर्ता आमने-सामने आ गए। आरोप-प्रत्यारोप के बीच देर रात स्थिति हिंसक हो गई। कैंपस में लाठी-डंडे चले, पत्थरबाजी हुई और कई छात्र घायल हो गए। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर पहले हमला करने का आरोप लगा रहे हैं। घटना के वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिनमें कुछ लोग नकाब पहने दिखाई दे रहे हैं।
2020 की घटना की याद
यह पहली बार नहीं है जब जेएनयू में नकाबपोशों की एंट्री और हिंसा की खबर सामने आई हो। 5 जनवरी 2020 को भी कैंपस में इसी तरह का भयावह घटनाक्रम देखने को मिला था। उस समय फीस वृद्धि को लेकर चल रहे आंदोलन के बीच कुछ अज्ञात नकाबपोश साबरमती और पेरियार हॉस्टल में घुस आए थे। छात्रों और शिक्षकों के साथ मारपीट हुई थी और कई लोग घायल हुए थे। उस घटना ने राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी थी और विश्वविद्यालय प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे थे।
जेएनयू: बहस और विरोध की परंपरा
जेएनयू की स्थापना 1969 में हुई थी और तब से यह परिसर वैचारिक विमर्श का केंद्र रहा है। यहां छात्र राजनीति हमेशा सक्रिय रही है। 1983 में छात्र आंदोलन इतना उग्र हुआ कि विश्वविद्यालय को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा और छात्रों को हॉस्टलों से खाली कराया गया। यह जेएनयू के इतिहास का एक बड़ा मोड़ माना जाता है।
साल 2000 में देश विरोधी नज्मों और नारों को लेकर विवाद हुआ। आरोप लगे कि कुछ कार्यक्रमों में सेना के खिलाफ टिप्पणियां की गईं, जिससे माहौल तनावपूर्ण हो गया। 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के दौरे के दौरान भी छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया और उन्हें काले झंडे दिखाए गए। यह विरोध उस समय की विदेश नीति को लेकर था।
2016 का बड़ा विवाद
2016 में जेएनयू एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गया, जब परिसर में देशविरोधी नारों के आरोप लगे। अफजल गुरु के समर्थन में नारेबाजी के आरोपों के बाद पुलिस ने कार्रवाई की और कई छात्रों को गिरफ्तार किया गया। इस घटना ने विश्वविद्यालय की छवि को गहरा झटका दिया और देशभर में ‘राष्ट्रवाद बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ पर बहस छिड़ गई।
2019-20: फीस वृद्धि और नागरिकता कानून
2019 में विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा हॉस्टल फीस वृद्धि और कुछ नए नियम लागू करने के फैसले के खिलाफ छात्रसंघ ने व्यापक आंदोलन किया। कई दिनों तक धरना-प्रदर्शन चले और प्रशासनिक भवन का घेराव किया गया। इसके तुरंत बाद 2020 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और एनआरसी के विरोध में भी कैंपस का माहौल गरमाया रहा। उस दौरान भी विभिन्न छात्र संगठनों के बीच टकराव की घटनाएं सामने आईं।
बार-बार क्यों भड़कती है हिंसा?
विशेषज्ञों का मानना है कि जेएनयू में वैचारिक विविधता बहुत गहरी है। यहां वामपंथी, दक्षिणपंथी और अन्य विचारधाराओं के छात्र सक्रिय हैं। राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दों पर बहस अक्सर टकराव का रूप ले लेती है। सोशल मीडिया और बाहरी राजनीतिक माहौल भी कैंपस की राजनीति को प्रभावित करता है।
हालांकि, यह भी सच है कि हर बार हिंसा की घटनाएं पूरे छात्र समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। जेएनयू में हजारों छात्र शांतिपूर्वक अपनी पढ़ाई और शोध कार्य में लगे रहते हैं। लेकिन कुछ घटनाएं पूरे संस्थान की छवि पर असर डाल देती हैं।
ताजा घटना के बाद प्रशासन ने जांच के आदेश दिए हैं और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की बात कही है। सवाल यह है कि क्या केवल सुरक्षा बढ़ाने से समस्या का समाधान हो पाएगा, या फिर संवाद और पारदर्शिता की जरूरत है? जेएनयू की पहचान एक बहस करने वाले, सवाल पूछने वाले और लोकतांत्रिक मूल्यों को जीवित रखने वाले परिसर के रूप में रही है। लेकिन अगर बहस हिंसा में बदलने लगे, तो यह न केवल विश्वविद्यालय बल्कि देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए भी चिंता का विषय है। बार-बार सुलगती हिंसा की चिंगारी यह संकेत देती है कि कैंपस में वैचारिक मतभेदों को संभालने के लिए अधिक परिपक्व और संस्थागत संवाद तंत्र की जरूरत है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या जेएनयू अपनी बौद्धिक विरासत को कायम रखते हुए शांति और सह-अस्तित्व की दिशा में ठोस कदम उठा पाता है या नहीं।