मुकुल रॉय..यादें शेष: जानें क्यों होना पड़ा था मुकुल रॉय को बीजेपी से अलग?..जानें Mukul Roy के बारे में

#Mukul Roy passes away

मुकुल रॉय..यादें शेष: जानें क्यों होना पड़ा था मुकुल रॉय को बीजेपी से अलग?

तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और कभी देश के रेल मंत्री रहे मुकुल रॉय ने 71 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कह दिया। कोलकाता स्थित अपोलो अस्पताल में कार्डियक अरेस्ट के चलते उनकी सांस थम गई। पश्चिम बंगाल की राजनीति में अगर संगठन और रणनीति की बात होती है तो Mukul Roy का नाम सबसे पहले लिया जायेगा। उन्हें लंबे समय तक ‘रणनीति का मास्टर’ और ‘संगठन का उस्ताद’ कहा जाता था।
कांग्रेस से शुरुआत कर All India Trinamool Congress टीएमसी को जमीनी स्तर पर खड़ा करने और बाद में मुकुल रॉय राजनीतिक सफर बीजेपी संगठन को बंगाल में मजबूत करने तक उतार-चढ़ाव से भरा ही रहा। तीन दशक की सक्रिय राजनीति में उन्होंने कई बार पाला बदला, लेकिन हर जगह अपनी रणनीतिक छाप छोड़ी।

यूथ कांग्रेस से टीएमसी तक

मुकुल रॉय और Mamata Banerjee की राजनीतिक यात्रा लगभग साथ-साथ शुरू हुई थी। दोनों ने यूथ कांग्रेस से राजनीति में कदम रखा था। 1990 के दशक में जब पश्चिम बंगाल की राजनीति वामपंथी दलों के इर्द-गिर्द घूम रही थी, तब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर जनवरी 1998 में टीएमसी का गठन किया था। इस नए राजनीतिक प्रयोग में मुकुल रॉय ही ऐसे थे जो उनके सबसे भरोसेमंद सहयोगी बने।
पार्टी गठन के तुरंत बाद उन्हें महासचिव बनाया गया। बूथ स्तर तक संगठन खड़ा करना, कार्यकर्ताओं का नेटवर्क बनाना और चुनावी रणनीति तैयार करना—ये सब उनकी जिम्मेदारी में शामिल था। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि शुरुआती वर्षों में टीएमसी को गांव-गांव तक पहुंचाने में मुकुल रॉय की भूमिका निर्णायक रही। धीरे-धीरे वे पार्टी के दूसरे सबसे ताकतवर नेता के रूप में उभरे।

राज्यसभा से रेल मंत्रालय तक

साल 2006 में मुकुल रॉय पहली बार राज्यसभा के लिए चुने गए। 2009 से 2012 के बीच वे राज्यसभा में टीएमसी के नेता भी रहे। यूपीए-2 सरकार में उन्हें पहले जहाजरानी राज्य मंत्री बनाया गया। इसके बाद मार्च 2012 में उन्हें रेल मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई। रेल मंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल भले ही छोटा रहा—20 मार्च 2012 से 21 सितंबर 2012 तक—लेकिन कुछ फैसलों ने उन्हें आम लोगों के बीच लोकप्रिय बना दिया। उस समय रेल किराया वृद्धि बड़ा मुद्दा बना हुआ था। पूर्व रेल मंत्री द्वारा बढ़ाए गए किराए का टीएमसी ने विरोध किया था। पदभार संभालते ही मुकुल रॉय ने एसी फर्स्ट और सेकेंड क्लास को छोड़कर थर्ड एसी, स्लीपर और जनरल श्रेणी में किराया वृद्धि वापस ले ली। इसे आम यात्रियों के हित में बड़ा कदम माना गया।
इसी दौरान उन्होंने ‘ज्ञान उदय एक्सप्रेस’ जैसी पहल की, जिसके तहत दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए एक विशेष शैक्षणिक ट्रेन चलाई गई। यह पहल उस दौर में काफी चर्चित रही और इसे शिक्षा व अनुभव आधारित यात्रा का नया प्रयोग माना गया।

टीएमसी में दरार और बीजेपी की ओर रुख

समय के साथ टीएमसी के भीतर समीकरण बदले। पार्टी में नई पीढ़ी का प्रभाव बढ़ा और मुकुल रॉय की भूमिका सीमित होने लगी। 2017 में उन्होंने टीएमसी छोड़ने का बड़ा फैसला लिया और बीजेपी में शामिल हो गए। यह कदम बंगाल की राजनीति में बड़ा झटका माना गया, क्योंकि वे ममता बनर्जी के सबसे करीबी सहयोगियों में गिने जाते थे। बीजेपी में शामिल होने के बाद उन्होंने संगठन विस्तार पर जोर दिया। 2021 के विधानसभा चुनाव में वे कृष्णानगर उत्तर से विधायक चुने गए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी को बंगाल में मजबूत विपक्ष के रूप में स्थापित करने में उनकी रणनीतिक समझ का योगदान रहा।

वापसी और गिरती राजनीतिक पकड़

हालांकि 2021 के चुनाव परिणाम के तुरंत बाद उन्होंने फिर से टीएमसी में वापसी कर ली। यह वापसी भी कम विवादित नहीं रही। दल-बदल कानून के तहत उनकी सदस्यता को लेकर कानूनी सवाल उठे। अंततः नवंबर 2025 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने उन्हें एंटी-डिफेक्शन कानून के तहत अयोग्य घोषित कर दिया। इसके बाद उनका सक्रिय राजनीतिक जीवन लगभग शांत हो गया। स्वास्थ्य समस्याओं और बदलते राजनीतिक परिदृश्य ने भी उनकी सक्रियता को सीमित कर दिया था। कभी बंगाल की राजनीति के ‘चाणक्य’ कहे जाने वाले मुकुल रॉय धीरे-धीरे सुर्खियों से दूर हो गए थे।

रणनीतिक विरासत

मुकुल रॉय की सबसे बड़ी ताकत संगठन क्षमता और चुनावी गणित की समझ थी। वे पर्दे के पीछे रहकर रणनीति बनाने में माहिर माने जाते थे। चाहे टीएमसी को जमीनी स्तर पर मजबूत करना हो या बीजेपी को बंगाल में विस्तार देना—उन्होंने हर भूमिका में अपनी उपयोगिता साबित की। उनका राजनीतिक जीवन यह भी दिखाता है कि भारतीय राजनीति में व्यक्तिगत समीकरण और संगठनात्मक ताकत कितनी अहम होती है। तीन प्रमुख दलों—कांग्रेस, टीएमसी और बीजेपी—में सक्रिय भूमिका निभाने वाले मुकुल रॉय का सफर इस बात का उदाहरण है कि राजनीति में स्थायी मित्र या शत्रु नहीं, बल्कि परिस्थितियां और रणनीतियां निर्णायक होती हैं। आज भले ही वे दुनिया में नहीें है, लेकिन पश्चिम बंगाल की राजनीति के इतिहास में उनका नाम एक कुशल रणनीतिकार और संगठन के मजबूत स्तंभ के रूप में दर्ज रहेगा।

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