नई दिल्ली/कानपुर (उत्तर प्रदेश)। उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले से सामने आए एक सनसनीखेज और बेहद संवेदनशील मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने स्वतः संज्ञान लेते हुए सख्त रुख अपनाया है। मामला 14 वर्षीय नाबालिग लड़की के अपहरण और सामूहिक दुष्कर्म से जुड़ा है, जिसमें आरोप है कि घटना में शामिल आरोपियों में उत्तर प्रदेश पुलिस का एक सब-इंस्पेक्टर भी शामिल है। आयोग ने इस मामले को गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन की श्रेणी में रखते हुए राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) को नोटिस जारी किया है और दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।
- कानपुर गैंगरेप मामला
- NHRC ने लिया स्वतः संज्ञान
- पुलिस पर ही गंभीर आरोप
मीडिया रिपोर्ट पर NHRC की सख्त टिप्पणी
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 10 जनवरी 2026 को प्रकाशित मीडिया रिपोर्ट का स्वतः संज्ञान लिया। आयोग ने प्रारंभिक टिप्पणी में कहा है कि यदि समाचार में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला न केवल कानून व्यवस्था की विफलता दर्शाता है, बल्कि पुलिस जैसे जिम्मेदार संस्थान में बैठे व्यक्ति द्वारा मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन की ओर भी इशारा करता है। आयोग का मानना है कि यह प्रकरण बेहद गंभीर है और इसकी निष्पक्ष, पारदर्शी तथा समयबद्ध जांच आवश्यक है।
5 जनवरी की रात हुआ था अपहरण
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यह घटना 5 जनवरी 2026 की रात की है। पीड़ित नाबालिग लड़की को उसके घर के पास से जबरन अगवा कर लिया गया। बताया गया कि आरोपी उसे एक कार में बैठाकर रेलवे लाइन के पास एक सुनसान स्थान पर ले गए। वहां दो लोगों ने उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। घटना के बाद आरोपी लड़की को वहीं छोड़कर फरार हो गए।
परिजनों पर टूटा दुखों का पहाड़
घटना के बाद पीड़िता किसी तरह अपने घर पहुंची और पूरी आपबीती अपने परिजनों को बताई। बच्ची की हालत बेहद खराब थी और वह गहरे मानसिक आघात में थी। परिवार तुरंत उसे लेकर पुलिस के पास पहुंचा, ताकि आरोपियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सके और बच्ची को न्याय मिल सके।
पुलिस चौकी से लौटाया गया पीड़ित परिवार
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि पीड़िता के परिजन सबसे पहले भिमसेन पुलिस चौकी पहुंचे थे, जहां उन्होंने घटना की जानकारी देते हुए एफआईआर दर्ज कराने की मांग की। हालांकि आरोप है कि वहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने उनकी शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया और उन्हें वापस लौटा दिया। इस रवैये ने मामले को और भी गंभीर बना दिया है।
थाने में दर्ज हुई FIR, लेकिन आरोपी अज्ञात
इसके बाद पीड़िता का परिवार सचेंडी थाना पहुंचा, जहां पुलिस ने अंततः मामला दर्ज किया। हालांकि एफआईआर में आरोपियों को ‘अज्ञात कार सवार’ बताया गया है। मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बाद में जांच के दौरान सामने आया कि आरोपियों में से एक उत्तर प्रदेश पुलिस का सब-इंस्पेक्टर है, जिसने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया।
पुलिसकर्मी पर आरोप, सिस्टम पर सवाल
यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला पुलिस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। एक ओर जहां पुलिस नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदार होती है, वहीं उसी विभाग का अधिकारी इस तरह के अपराध में शामिल पाया जाना बेहद चिंताजनक है। इस पहलू को देखते हुए NHRC ने पूरे मामले को मानवाधिकार उल्लंघन की गंभीर श्रेणी में रखा है।
DGP से दो हफ्ते में रिपोर्ट तलब
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को नोटिस जारी कर पूछा है कि अब तक इस मामले में क्या कार्रवाई की गई है। आयोग ने यह भी जानना चाहा है कि आरोपी पुलिसकर्मी के खिलाफ विभागीय और आपराधिक कार्रवाई शुरू की गई या नहीं। इसके अलावा पीड़िता को दी जा रही चिकित्सा सहायता, काउंसलिंग, सुरक्षा और मुआवजे की स्थिति पर भी विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है।
नाबालिग की सुरक्षा और पुनर्वास पर जोर
NHRC ने स्पष्ट किया है कि नाबालिग पीड़िता की पहचान और सुरक्षा सर्वोपरि है। आयोग ने यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं कि बच्ची और उसके परिवार को किसी तरह का दबाव, धमकी या प्रताड़ना न झेलनी पड़े। साथ ही, पीड़िता को कानूनी सहायता, मानसिक परामर्श और सरकार की योजनाओं के तहत सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
मानवाधिकारों पर गहरा आघात
आयोग ने कहा है कि यदि मीडिया रिपोर्ट में वर्णित तथ्य सही पाए जाते हैं, तो यह मामला समाज, प्रशासन और कानून व्यवस्था—तीनों के लिए गंभीर चेतावनी है। नाबालिग के साथ दुष्कर्म और उसमें पुलिसकर्मी की कथित संलिप्तता मानवाधिकारों पर गहरा आघात है। फिलहाल सभी की नजरें उत्तर प्रदेश पुलिस की रिपोर्ट और NHRC की आगे की कार्रवाई पर टिकी हैं। यह मामला न केवल पीड़िता को न्याय दिलाने की परीक्षा है, बल्कि यह भी तय करेगा कि व्यवस्था अपने भीतर की सड़ांध को कितनी ईमानदारी से साफ कर पाती है।