इजराइल-ईरान सैन्य तनाव: पश्चिम एशिया में बढ़ता खतरा…भारत पर कितना असर पड़ेगा? चार संभावनाओं से समझिए पूरी स्थिति
पश्चिम एशिया में इजराइल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। इस क्षेत्र में छिड़ी जंग का असर अब धीरे-धीरे वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर दिखने लगा है। खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़े तनाव और जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से तेल और गैस की सप्लाई पर दबाव पैदा हो गया है।
भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति बेहद अहम है, क्योंकि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से ही पूरा करता है। अगर यह युद्ध और तेज होता है तो भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात को चार संभावित परिदृश्यों के जरिए समझा जा सकता है।
संभावना 1: पूर्ण युद्ध की स्थिति
सबसे गंभीर स्थिति तब पैदा हो सकती है जब ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच सीधा और व्यापक युद्ध छिड़ जाए। यदि यह संघर्ष पूर्ण युद्ध का रूप लेता है तो इसका असर केवल इन तीन देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे खाड़ी क्षेत्र के ऊर्जा ढांचे और वैश्विक तेल आपूर्ति पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। खाड़ी क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादन क्षेत्रों में से एक है। ऐसे में यदि वहां के तेल उत्पादन केंद्रों, बंदरगाहों या तेल टैंकरों पर हमला होता है तो वैश्विक तेल बाजार में भारी उथल-पुथल मच सकती है। भारत के लिए यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण होगी। भारत अपनी कुल जरूरत का करीब 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें अचानक बढ़ती हैं तो इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। पेट्रोल और डीजल महंगे होंगे, परिवहन लागत बढ़ेगी और महंगाई दर में उछाल आ सकता है। इसके साथ ही व्यापार घाटा भी बढ़ सकता है और आर्थिक वृद्धि की रफ्तार पर भी दबाव पड़ सकता है।
संभावना 2: सीमित संघर्ष या प्रॉक्सी वॉर
दूसरी संभावना यह है कि युद्ध पूर्ण रूप से न फैले और केवल सीमित सैन्य टकराव या प्रॉक्सी वॉर के रूप में जारी रहे। इसमें सीधे बड़े पैमाने पर युद्ध के बजाय छोटे-छोटे हमले, मिसाइल हमले या समुद्री तनाव देखने को मिल सकते हैं। ऐसी स्थिति में वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बनी रहेगी, लेकिन तेल की आपूर्ति पूरी तरह बाधित होने की संभावना कम होगी। कई बार अंतरराष्ट्रीय दबाव और कूटनीतिक प्रयास ऐसे संघर्षों को बड़े युद्ध में बदलने से रोक लेते हैं। भारत के लिए यह स्थिति अपेक्षाकृत संभालने योग्य मानी जा रही है। हालांकि वित्तीय बाजारों में कुछ समय के लिए उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है और ऊर्जा की कीमतों में हल्की बढ़ोतरी भी हो सकती है। भारत के ईरान, इजराइल और खाड़ी देशों के साथ संतुलित कूटनीतिक संबंध हैं। यही कारण है कि संकट के समय भारत बातचीत और कूटनीति के जरिए अपने हितों को सुरक्षित रखने की कोशिश कर सकता है। हालांकि बाजार में अनिश्चितता के कारण शेयर बाजार और मुद्रा बाजार पर कुछ समय के लिए दबाव जरूर बन सकता है।
संभावना 3: होर्मुज जलडमरूमध्य में लंबी नाकाबंदी
तीसरी और बेहद महत्वपूर्ण संभावना होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा परिवहन रास्तों में से एक माना जाता है। वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। यदि युद्ध के कारण इस जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक बाधित रहती है तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। तेल टैंकरों और गैस जहाजों की आवाजाही रुकने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में भारी कमी आ सकती है।
भारत पर इसका असर सबसे पहले ऊर्जा क्षेत्र में दिखाई देगा। भारत अपने कच्चे तेल का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से आयात करता है। यदि यह रास्ता बंद रहता है तो तेल और गैस की सप्लाई पर सीधा असर पड़ेगा। इसके संकेत अब दिखाई भी देने लगे हैं। कुछ क्षेत्रों में गैस की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ने लगी है। सरकार को गैस वितरण की प्राथमिकता तय करनी पड़ी है और कंपनियों को घरेलू उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। इसके अलावा शिपिंग और बीमा की लागत भी बढ़ने लगी है, जिससे तेल आयात और महंगा हो सकता है। कई औद्योगिक क्षेत्रों में ऊर्जा लागत बढ़ने का दबाव महसूस किया जा रहा है। अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो उद्योग, परिवहन और घरेलू उपयोग के क्षेत्रों में भी असर दिखाई दे सकता है।
संभावना 4: युद्धविराम और कूटनीतिक समाधान
सबसे सकारात्मक संभावना यह है कि अमेरिका, ईरान और अन्य देशों के बीच बातचीत के जरिए युद्धविराम हो जाए। कूटनीतिक प्रयासों के जरिए यदि समझौता होता है और परमाणु कार्यक्रम जैसे मुद्दों पर सहमति बनती है तो क्षेत्र में तनाव कम हो सकता है। अगर ऐसा होता है तो ऊर्जा बाजार में तुरंत राहत देखने को मिल सकती है। होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही सामान्य हो जाएगी और तेल तथा गैस की आपूर्ति फिर से सुचारू हो सकती है। भारत के लिए यह स्थिति सबसे राहत भरी होगी। तेल की कीमतों में गिरावट आएगी और महंगाई पर दबाव कम होगा। इसके साथ ही उद्योग और व्यापार क्षेत्र में भी स्थिरता लौट सकती है। ऊर्जा बाजारों में अक्सर ऐसे संकेत मिलते ही कीमतों में तुरंत गिरावट देखने को मिलती है। इसका मतलब यह है कि वैश्विक बाजार अभी भी कूटनीतिक समाधान की उम्मीद लगाए हुए हैं।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह संकट
पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव भारत के लिए केवल कूटनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सीधे आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। भारत की बड़ी आबादी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा आपूर्ति बेहद अहम है। इसलिए भारत सरकार स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों तथा आपूर्ति मार्गों पर भी काम कर रही है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल दुनिया की निगाहें पश्चिम एशिया की स्थिति पर टिकी हुई हैं। यह संकट किस दिशा में जाएगा, यह आने वाले दिनों में सैन्य और कूटनीतिक घटनाक्रम पर निर्भर करेगा। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युद्ध का दायरा सीमित रखा गया तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर सीमित रहेगा, लेकिन यदि यह व्यापक युद्ध में बदलता है तो इसके परिणाम पूरी दुनिया के लिए गंभीर हो सकते हैं। भारत के लिए भी यह समय सतर्क रहने और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने का है, क्योंकि पश्चिम एशिया की जंग का असर देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जिंदगी पर सीधे पड़ सकता है।