मध्य पूर्व में इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने दुनिया भर के वित्तीय बाजारों की चिंता बढ़ा दी है। विश्लेषकों का मानना है कि इस भू-राजनीतिक संकट का असर आने वाले दिनों में शेयर बाजारों की चाल पर साफ दिखाई दे सकता है। शुरुआती संकेतों में निवेशकों की सतर्कता और मुनाफावसूली का दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
भू-राजनीतिक तनाव क्यों बनता है बाजारों के लिए खतरे की घंटी
मार्केट एक्सपर्ट्स के मुताबिक, जब भी वैश्विक स्तर पर युद्ध या सैन्य टकराव की स्थिति बनती है, तो इसका सीधा असर निवेशकों की धारणा पर पड़ता है। जोखिम लेने की प्रवृत्ति घटती है और सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर झुकाव बढ़ जाता है। विश्लेषक क्रांति बाथिनी का कहना है कि इस तरह की परिस्थितियों में बाजारों की पहली प्रतिक्रिया अक्सर नकारात्मक होती है। निवेशक यह समझने की कोशिश करते हैं कि क्या यह टकराव लंबा खिंचने वाला है या फिर सीमित समय की सैन्य कार्रवाई तक ही रहेगा। यही आकलन तय करेगा कि बाजारों पर दबाव कितनी देर और कितनी गहराई तक बना रहेगा।
अमेरिका–ईरान तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उबाल
इस पूरे घटनाक्रम के बीच अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती तनातनी ने कच्चे तेल के बाजार को भी बेचैन कर दिया है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य के जरिए तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने कीमतों को सहारा दिया है। फिलहाल कच्चा तेल करीब 67 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है, जो हाल के दिनों में लगभग 2 प्रतिशत की बढ़त दिखा चुका है।
भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण है। एनरिच मनी के सीईओ पोनमुदी आर के अनुसार, ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी भारत की अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक जोखिम पहले से ही ऊंचा बना हुआ है।
अगर कच्चा तेल 80 डॉलर के पार गया तो भारत पर क्या असर होगा
विशेषज्ञों की राय में कच्चा तेल भारतीय बाजार के लिए “जोकर इन द पैक” जैसा है। यदि कीमतें तेज़ी से बढ़कर 80 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चली जाती हैं, तो इसका असर शेयर बाजार से लेकर महंगाई तक हर स्तर पर देखने को मिल सकता है। तेल महंगा होने से परिवहन, उत्पादन और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत बढ़ेगी, जिसका सीधा असर महंगाई पर पड़ेगा।
क्रांति बाथिनी का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल अल्प से मध्यम अवधि में भारतीय बाजारों पर दबाव बना सकता है। इसका प्रभाव कई सेक्टर्स में एक साथ देखने को मिल सकता है।
कौन से सेक्टर फायदे में और कौन से दबाव में रह सकते हैं
इस तरह के तनावपूर्ण माहौल में कुछ सेक्टर्स को सहारा मिलता है, जबकि कुछ पर सीधा नकारात्मक असर पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऊर्जा और डिफेंस से जुड़े शेयरों में मजबूती देखने को मिल सकती है। वहीं सोना और अमेरिकी ट्रेजरी जैसे सुरक्षित निवेश विकल्पों में पैसा जा सकता है।
इसके उलट, एविएशन, लॉजिस्टिक्स, ऑटोमोबाइल, पेंट्स और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों पर लागत बढ़ने का दबाव बन सकता है। आईटी सेक्टर भी वैश्विक जोखिम से जुड़ी बिकवाली के कारण अस्थिर रह सकता है। हालांकि, घरेलू संस्थागत निवेशकों की मजबूत भागीदारी भारतीय बाजारों को पूरी तरह टूटने से बचा सकती है।
आगे का रास्ता: अस्थिरता या बड़ा संकट?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाला हफ्ता काफी उतार-चढ़ाव भरा हो सकता है। मध्य पूर्व में तनाव के साथ-साथ अमेरिका और भारत में आने वाले अहम आर्थिक आंकड़े भी बाजार की दिशा तय करेंगे। हालांकि, कुछ फंड मैनेजर्स का कहना है कि बाजार पहले से ही इस तरह की खबरों को काफी हद तक अपने दामों में शामिल कर चुका है और ज्यादा बड़ी गिरावट की संभावना फिलहाल कम है।
उनके अनुसार, यह दौर किसी बड़े वित्तीय संकट की शुरुआत नहीं बल्कि अस्थायी अस्थिरता का चरण हो सकता है।





