क्रिकेट में वापसी सिर्फ स्कोरकार्ड से नहीं, सोच से होती है—और ईशान किशन ने यही साबित किया है। कभी बेपरवाह, हंसी-मजाक में डूबे रहने वाले ईशान आज मैदान पर शांत, गणनात्मक और घातक दिखते हैं। नामीबिया के खिलाफ 24 गेंदों में 61 रन की उनकी पारी महज़ ताबड़तोड़ शॉट्स का नतीजा नहीं थी, बल्कि हालात पढ़कर बनाई गई रणनीति का प्रदर्शन थी। यह वही ईशान हैं, जिन्होंने ठोकरें खाईं, सीखा और खुद को नए सिरे से गढ़ा।
संघर्ष की शुरुआत: शिखर से ज़मीन तक
कुछ साल पहले बांग्लादेश के खिलाफ सबसे तेज़ वनडे दोहरा शतक जड़ने के बाद ईशान का करियर तेज़ी से ऊपर जा रहा था। लेकिन एक फैसले ने तस्वीर बदल दी। घरेलू क्रिकेट खेलने के बजाय निजी अकादमी में अभ्यास को तरजीह देना उन्हें भारी पड़ा। बीसीसीआई की नाराज़गी का नतीजा यह हुआ कि सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट सूची से उनका नाम बाहर हो गया। विकेटकीपर-बल्लेबाज़ के तौर पर जो खिलाड़ी ऋषभ पंत के बाद अगली कतार में माना जाता था, वह अचानक अनिश्चित भविष्य से घिर गया।
आत्ममंथन और बदलाव: मज़ाक से मक़सद तक
इस झटके ने ईशान को भीतर तक झकझोर दिया। उनके पास दो रास्ते थे—या तो मायूसी में डूब जाएँ या फिर खुद को बेहतर बनाकर लौटें। उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। ईशान मानते हैं कि अब वे पहले जैसे नहीं रहे। हंसी-मजाक अब सीमित है, फोकस बल्लेबाज़ी और विकेटकीपिंग पर है। खासकर कोचिंग सेट-अप में गौतम गंभीर के साथ काम करते हुए उनमें अनुशासन और स्पष्टता आई। यही बदलाव उनके खेल में दिखने लगा।
ईशान ने घरेलू सत्र में रनों का अंबार लगाया घरेलू क्रिकेट से वापसी की
ईशान ने घरेलू सत्र में रनों का अंबार लगाया। झारखंड की विजय हज़ारे ट्रॉफी जीत में उनकी अहम भूमिका रही। इसके बावजूद राष्ट्रीय टीम में जगह आसान नहीं थी। विकेटकीपर के विकल्पों में संजू सैमसन ने खुद को मजबूत किया था, ओपनिंग में शुभमन गिल और अभिषेक शर्मा की जोड़ी चल रही थी, जबकि फिनिशर के रूप में जितेश शर्मा प्रभावी दिखे। फिर भी क्रिकेट ने दरवाज़ा खोला—न्यूज़ीलैंड सीरीज़ में मौका मिला, और ईशान ने चार मैचों में 215 रन ठोककर चयनकर्ताओं को मजबूर कर दिया।
विश्व कप मंच पर परिपक्व धमाका
विश्व कप से पहले तस्वीर साफ़ नहीं थी, लेकिन मौके पर ईशान खरे उतरे। पाकिस्तान के खिलाफ टी20 विश्व कप 2026 में उन्होंने 27 गेंदों में अर्धशतक जड़ा और 185 के स्ट्राइक रेट से मैच का रुख बदल दिया। प्रीमियम पेस से लेकर स्पिन तक—किसी को बख़्शा नहीं। कोलंबो के आर. प्रेमदासा स्टेडियम जैसी बड़ी बाउंड्री वाले मैदान पर यह पारी उनकी सोच की परिपक्वता का सबूत थी। नामीबिया के खिलाफ 61 रन भी इसी कहानी की अगली कड़ी बने—पहले हालात परखी, फिर हमला बोला।