ईरान युद्ध: भारत को नई प्रवासन रणनीति की जरूरत
पश्चिम एशिया में बढ़ता संकट भारत के लिए यह सोचने का सही समय है कि वह नए प्रवासन माइग्रेशन destination गंतव्यों की तलाश करे और खाड़ी देशों पर अपनी निर्भरता कम करे। भारत दुनिया में अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों का सबसे बड़ा स्रोत है। करीब 1.8 करोड़ भारतीय विदेशों में रहते और काम करते हैं। इनमें बड़ी संख्या संयुक्त अरब अमीरात UAE, अमेरिका और सऊदी अरब जैसे देशों में है। यूएई, सऊदी अरब, कुवैत, कतर, ओमान और बहरीन जैसे खाड़ी देश लंबे समय से भारतीय मजदूरों के लिए प्रमुख गंतव्य रहे हैं। 1930 के दशक में अरब प्रायद्वीप में तेल की खोज के बाद इन देशों में तेजी से आर्थिक विकास हुआ, जिससे रोजगार के अवसर बढ़े और भारतीय श्रमिकों का प्रवासन भी तेज हुआ।
शुरुआत में खाड़ी देशों की ओर श्रम प्रवासन मुख्य रूप से केरल से शुरू हुआ, जहां से लोग समुद्री मार्ग से इन देशों तक पहुंचते थे। समय के साथ यह प्रवृत्ति उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों तक फैल गई, जो अब प्रवासी श्रमिकों के बड़े स्रोत बन चुके हैं।
खाड़ी देशों में प्रवासन का सिलसिला आज भी जारी है। जिसका मुख्य कारण वहां विदेशी श्रमिकों की भारी मांग और यूरोप व अमेरिका की तुलना में कम आव्रजन बाधाएं हैं। जहां कुशल (स्किल्ड) भारतीय श्रमिक अमेरिका, कनाडा और यूरोप जैसे देशों में पेशेवर अवसरों के लिए जाते हैं, वहीं अर्ध-कुशल और अकुशल श्रमिक अधिकतर खाड़ी देशों का रुख करते हैं। इन देशों में उन्हें खुदरा (रिटेल), आतिथ्य (हॉस्पिटैलिटी) और निर्माण (कंस्ट्रक्शन) जैसे क्षेत्रों में काम मिलता है।
इस प्रवासन पैटर्न में लैंगिक विभाजन भी स्पष्ट है। पुरुष प्रवासी मुख्य रूप से निर्माण और सेवा क्षेत्रों में काम करते हैं, जबकि बड़ी संख्या में भारतीय महिलाएं घरेलू कामकाज (डोमेस्टिक वर्क) में कार्यरत हैं। आंकड़ों के अनुसार, कुल अनिवासी भारतीय (NRI) आबादी का 55.84% हिस्सा खाड़ी देशों में रहता है, जो इस क्षेत्र की अहमियत को दर्शाता है। इनमें यूएई में सबसे अधिक 22.42% भारतीय रहते हैं। इसके बाद सऊदी अरब (15.52%), कुवैत (6.27%), कतर (5.27%), ओमान (3.32%) और बहरीन (2.04%) का स्थान है। यह भारी निर्भरता दर्शाती है कि भारत का विदेशी श्रम प्रवासन खाड़ी क्षेत्र की आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता से गहराई से जुड़ा हुआ है।
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव
हालिया संकट में पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच सीधे सैन्य टकराव ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। फरवरी 2026 के अंत में अमेरिका और इजराइल ने ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए, जो हाल के दशकों की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक माने जा रहे हैं। इसके जवाब में ईरान ने मिसाइल और ड्रोन हमलों के जरिए इजराइल और खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया।
इस बढ़ते तनाव ने भारत की प्रवासन व्यवस्था की एक बड़ी कमजोरी उजागर कर दी है। खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय कामगारों की मौजूदगी के कारण क्षेत्र में अस्थिरता सीधे उनकी सुरक्षा और आजीविका को प्रभावित करती है। एक ही क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता भारत की प्रवासन नीति की संरचनात्मक कमजोरी रही है।
यह स्थिति एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करती है—भारत ने चीन की तरह अपनी प्रवासन रणनीति को विविध क्यों नहीं बनाया? पिछले दो दशकों में चीन ने अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और लैटिन अमेरिका में श्रम समझौतों और इंफ्रास्ट्रक्चर कूटनीति के जरिए अपने श्रमिकों की वैश्विक उपस्थिति बढ़ाई है। इसके विपरीत, भारत का प्रवासन अभी भी खाड़ी देशों पर अत्यधिक निर्भर है।
एक और चिंता यह है कि भारत बड़ी संख्या में कुशल और अर्ध-कुशल श्रमिक विदेश भेजता है, लेकिन बदले में मिलने वाला आर्थिक लाभ अपेक्षाकृत कम माना जाता है। इंजीनियर, स्वास्थ्यकर्मी, तकनीशियन और सेवा क्षेत्र के कर्मचारी विदेशी अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत बनाते हैं, लेकिन भारत इस मानव संसाधन को रणनीतिक या आर्थिक लाभ में पूरी तरह बदल नहीं पाया है।
नई रणनीति की जरूरत
वर्तमान हालात यह संकेत देते हैं कि भारत को अपनी प्रवासन नीति पर गंभीरता से पुनर्विचार करना चाहिए। दशकों से खाड़ी देशों पर केंद्रित प्रवासन अब जोखिम भरा साबित हो रहा है। ऐसे में भारत को एक विविध (डायवर्सिफाइड) प्रवासन ढांचे की ओर बढ़ना होगा। इसके लिए यूरोप, पूर्वी एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे नए क्षेत्रों के साथ द्विपक्षीय श्रम समझौते करने की जरूरत है। इन समझौतों का उद्देश्य सिर्फ श्रमिकों को भेजना नहीं, बल्कि उनके लिए सुरक्षित और न्यायसंगत कार्य वातावरण सुनिश्चित करना होना चाहिए। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि भारतीय श्रमिकों को उचित वेतन, पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया, उनके कौशल की मान्यता, सामाजिक सुरक्षा लाभों की पोर्टेबिलिटी और शोषण से सुरक्षा मिले।
आर्थिक और रणनीतिक फायदे
नई प्रवासन रणनीति से भारत को आर्थिक और कूटनीतिक दोनों स्तरों पर लाभ मिल सकता है। विदेशों में काम कर रहे भारतीयों द्वारा भेजा गया धन (रेमिटेंस) देश के लिए विदेशी मुद्रा का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। अगर प्रवासन गंतव्य विविध होंगे, तो रेमिटेंस का प्रवाह अधिक स्थिर और सुरक्षित हो सकता है। अल्पकाल में यह विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने, चालू खाता घाटा कम करने और रुपये की स्थिरता बनाए रखने में मदद कर सकता है। दीर्घकाल में, एक मजबूत प्रवासन नीति भारत के वैश्विक श्रम बल को एक रणनीतिक संपत्ति के रूप में स्थापित कर सकती है।
तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत को अपनी प्रवासन नीति को नए सिरे से परिभाषित करना होगा। खाड़ी देशों पर अत्यधिक निर्भरता को कम कर नए अवसरों की तलाश करना समय की मांग है। यदि भारत समय रहते अपनी रणनीति में बदलाव करता है, तो उसका वैश्विक श्रम बल न केवल करोड़ों लोगों की आजीविका सुरक्षित करेगा, बल्कि देश की आर्थिक मजबूती और वैश्विक प्रभाव को भी बढ़ाएगा।