ईरान-इजरायल युद्ध और भारतीय विदेशनीति….middle east में भारत ने कैसे साधा संतुलन…

Iran Israel war and Indian foreign policy How did India maintain balance in the Middle East

वेस्ट एशिया मध्य पूर्व middle east लंबे समय से वैश्विक भू-राजनीतिक संघर्षों का केंद्र रहा है। तेल, धार्मिक अस्मिता, और सामरिक वर्चस्व की जटिलताओं से घिरा यह क्षेत्र, आज फिर एक बार इजरायल-ईरान तनाव के चलते वैश्विक चिंता का कारण बना है। ऐसे में भारत की नीति – जो स्पष्ट तटस्थता और संवाद की वकालत पर आधारित है – एक परिपक्व और दीर्घदर्शी कूटनीति का उदाहरण बनकर उभरी है।

भारत की संतुलित रणनीति

अमेरिका ने इजरायल के समर्थन में मुखर होकर हस्तक्षेप किया, तो कई देश दो खेमों में बंट गए। वहीं भारत ने न पक्ष चुना, न हस्तक्षेप किया – बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केवल इतना कहा “तनाव कम हो, संवाद हो, और कूटनीति से समाधान निकले। हालांकि इस तटस्थता की आलोचना हुई। भारत में विपक्ष दलों ने इसे “नैतिक कमजोरी” करार दिया। लेकिन वास्तविकता यह है कि आज की वैश्विक राजनीति में ‘पक्ष लेना’ हमेशा रणनीतिक समझदारी नहीं होती। भारत का यह रुख एक नैतिक दृढ़ता और रणनीतिक परिपक्वता का प्रतीक है।

गुटनिरपेक्षता का आधुनिक संस्करण

भारत की यह नीति नई नहीं है। यह स्वतंत्र भारत की गुटनिरपेक्ष (Non-Aligned) नीति का आधुनिक विस्तार है। शीत युद्ध के दौरान जब पूरी दुनिया अमेरिका या सोवियत संघ के इर्द-गिर्द घूम रही थी, भारत ने आत्मनिर्भरता, संप्रभुता और बहुध्रुवीय विश्व की वकालत की। आज जब वैश्विक शक्ति संतुलन चीन, अमेरिका, रूस और यूरोप के बीच बंट रहा है, भारत की “न पक्ष में, न विपक्ष में” नीति और भी ज्यादा सार्थक बन जाती है।

middle east की बदलती दोस्तियां

वर्तमान संकट में वेस्ट एशिया middle east के पारंपरिक समीकरण भी बदलते नजर आए। लेबनान ने हिज़बुल्ला को सीमित किया। जॉर्डन ने ईरानी मिसाइलें इंटरसेप्ट कीं।सऊदी अरब ने अमेरिकी सैन्य अभियानों में सहयोग दिया। पाकिस्तान ने ट्रंप को नोबेल पुरस्कार तक दिलवाने की सिफारिश की। ये घटनाएं दर्शाती हैं कि वेस्ट एशिया में स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं। भारत इसी सिद्धांत के साथ आगे बढ़ रहा है।

नैतिक संतुलन और रणनीतिक आत्मनिर्भरता का मेल

भारत की नीति दो स्तंभों पर टिकी है। नैतिक समझदारी: मानवाधिकारों और शांतिपूर्ण समाधान की वकालत। रणनीतिक आत्मनिर्भरता की बात करें तो किसी भी संघर्ष में केवल अपने दीर्घकालिक हितों के अनुसार निर्णय लेना। यही कारण है कि भारत ईरान से ऊर्जा संबंध बनाए रखता है। इजरायल से रक्षा तकनीक लेता है। खाड़ी देशों से आर्थिक साझेदारी बढ़ाता है। भारत की वेस्ट एशिया नीति अब केवल ‘गुटनिरपेक्षता’ नहीं, बल्कि एक सशक्त, संतुलित और विश्वसनीय शक्ति के रूप में उभरने की गाथा है। जब बाकी देश भावनात्मक और धार्मिक समीकरणों में उलझे हैं। भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों और वैश्विक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन साधा है। यह नीति न सिर्फ तात्कालिक संकटों को दूरदर्शी दृष्टि से देखती है, बल्कि भारत को वेस्ट एशिया में एक स्थायी, सम्मानित और भरोसेमंद साझेदार के रूप में स्थापित करती है।

गुटनिरपेक्षता ही भारत की विदेश नी​ति का आधार

लंबे समय से भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता Non-Alignment के सैद्धांतिक पर आधारित है। हालांकि मौजूदा हालात और वैश्विक परिस्थितियों में भारत ने इसे रणनीतिक स्वायत्तता Strategic Autonomy में भी बदल दिया है। यह नीति भारत को किसी एक गुट में बंधे बिना, अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता देती है। हालिया उदाहरणों में, पीएम नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति से फोन पर बातचीत कर डिएस्कलेशन, डायलॉग और डिप्लोमेसी को प्राथमिकता देने की बात कही। चाहे रूस-यूक्रेन युद्ध हो या इज़रायल-हमास संघर्ष, भारत का रुख स्पष्ट रूप से तनाव कम करने और शांतिपूर्ण समाधान की ओर रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि संघर्ष की लंबी अवधि में केवल संतुलनकारी रवैया पर्याप्त नहीं होता। तब एक स्पष्ट नीति या पक्ष अपनाने की ज़रूरत होती है। जिससे भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ सकता है। भारत की यह संतुलित कूटनीति लघु संघर्षों में सफल रही है, लेकिन विपक्ष की ओर से दीर्घकालिक संघर्षों में इसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

चाबहार पोर्ट: भारत की रणनीतिक कड़ी

चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट भारत के लिए मध्य एशिया, अफगानिस्तान और ईरान तक सीधी पहुंच का एक महत्वपूर्ण द्वार है। यह बंदरगाह भारत की रणनीतिक और व्यापारिक महत्वाकांक्षाओं में केंद्रीय भूमिका निभाता है। चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) और पाकिस्तान की ग्वादर बंदरगाह परियोजना के मुकाबले यह भारत की भौगोलिक व कूटनीतिक संतुलन नीति का हिस्सा है। भारत ने चाबहार में बुनियादी ढांचे और संचालन के लिए उल्लेखनीय निवेश किया है, जो भारत द्वारा किसी विदेशी बंदरगाह के प्रबंधन की पहली पहल भी है। यह परियोजना भारत को पश्चिम एशिया और मध्य एशिया के ऊर्जा संसाधनों और रेयर अर्थ मिनरल्स तक पहुंचने का अवसर देती है। हालांकि, ईरान में युद्ध या क्षेत्रीय अस्थिरता जैसे हालिया घटनाक्रम भारत की इस कनेक्टिविटी योजना को सीधा नुकसान पहुंचा सकते हैं। भारत इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) पर भी नजर बनाए हुए है, जो रूसी और यूरोपीय बाजारों तक सीधी सप्लाई चेन का विकल्प देता है। चाबहार भारत के लिए केवल एक बंदरगाह नहीं, बल्कि भविष्य की रणनीतिक स्वायत्तता और एशियाई भू-राजनीति में सशक्त भूमिका का आधार है।…(प्रकाश कुमार पांडेय)

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