ईरान और इजरायल के बीच लगातार तनाव के बीच अब ईरान की आंतरिक राजनीति को लेकर कई आशंकाएं उभरने लगी हैं। इजरायल द्वारा ईरान के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को निशाना बनाए जाने के बाद, ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के भविष्य को लेकर कयास लग रहे हैं। कुछ विरोधी समूहों और विश्लेषकों का मानना है कि अगर इस्लामी शासन का पतन होता है, तो देश भारी अस्थिरता और संभावित बिखराव की ओर जा सकता है।
ईरान में आधी आबादी पर्सियन…. बाकी बलोच-कुर्द-अरब
ईरान एक धार्मिक गणराज्य है जहां सर्वोच्च नेता को अपार अधिकार प्राप्त हैं। खामेनेई 1989 से सत्ता में हैं और उनका शासन ईरान की राजनीति, सेना और न्याय व्यवस्था पर पूरी तरह नियंत्रण रखता है। लेकिन अब उनके उत्तराधिकारी को लेकर अनिश्चितता है और इस अस्थिरता के कारण सत्ता संघर्ष की आशंका गहरा रही है।
राजनीतिक शून्यता और सत्ता संघर्ष
खामेनेई की जगह कौन लेगा, यह बड़ा सवाल होगा। ईरान का वर्तमान शासन विलायते फकीह (धार्मिक सर्वोच्चता) के सिद्धांत पर आधारित है। इसमें सर्वोच्च नेता (Supreme Leader) का अधिकार राष्ट्रपति और संसद से ऊपर होता है।
खामेनेई के जाने के बाद गार्जियन काउंसिल और आईआरजीसी (Islamic Revolutionary Guard Corps) के भीतर ही सत्ता संघर्ष छिड़ सकता है।
क्या रजा पहलवी वापसी कर सकते हैं?
रजा पहलवी, ईरान के पूर्व शाह मोहम्मद रजा पहलवी के पुत्र, पश्चिमी देशों में निर्वासन में हैं। वे एक संवैधानिक राजतंत्र या लोकतंत्र के पक्षधर हैं।
हालांकि ईरान में उनके प्रति समर्थन सीमित है, लेकिन यदि इस्लामी शासन पूरी तरह ढहता है, तो उनकी वापसी की संभावना विचारणीय हो सकती है, खासकर युवाओं और पश्चिम समर्थक वर्गों के बीच।
क्या ईरान टूट सकता है?
हां, यह आशंका नज़रअंदाज़ नहीं की जा सकती। ईरान एक बहु-जातीय और बहु-सांस्कृतिक राष्ट्र है। यदि केंद्रीय सत्ता कमजोर होती है, तो जातीय और सांस्कृतिक तनाव भड़क सकते हैं।
प्रमुख क्षेत्र जहां असंतोष भड़क सकता है:
क्षेत्र प्रमुख जातीय समूह धार्मिक स्थिति संभावित खतरा
उत्तर-पश्चिम कुर्द सुन्नी स्वतंत्र कुर्दिस्तान की मांग
दक्षिण-पूर्व बलूच सुन्नी बलूचिस्तान विद्रोह
दक्षिण-पश्चिम अरब सुन्नी अलगाववादी आंदोलन
उत्तर अजरबैजानी (अजेरी) शिया सीमित असंतोष, पर तुर्की प्रभाव संभव
ईरान की सामाजिक बनावट: एक जटिल संरचना
धार्मिक दृष्टि से 90-95% शिया मुस्लिम
10% सुन्नी मुस्लिम (बलूच, कुर्द, अरब, तुर्कमेन आदि)
जातीय दृष्टि से…61% पर्सियन (फारसी)
20% अजेरी (अजरबैजानी) – मुख्यतः शिया, राज्य के वफादार
10% कुर्द – स्वतंत्रता समर्थक भावना
6% लोर, गिलक, माज़ंदरानी
2-3% बलूच, अरब, तुर्कमेन
संभावित परिदृश्य
इस्लामी गणराज्य कायम रहने की स्थिति में
शासन में किसी और धर्मगुरु की नियुक्ति
सत्ताधारी तंत्र ढहता है
नागरिक युद्ध या जातीय बिखराव की आशंका
पश्चिम समर्थक सरकार आती है लोकतंत्र की वापसी की कोशिश, लेकिन स्थिरता अनिश्चित
रजा पहलवी या निर्वासित विपक्ष सत्ता में आता है। सीमित सफलता, समाज का समर्थन ज़रूरी
विभाजन होता है। कुर्द, बलूच, अरब क्षेत्रों में अलगाववाद। ईरान की राजनीति सिर्फ एक नेता के इर्द-गिर्द नहीं, बल्कि एक गहरे वैचारिक, सांस्कृतिक और जातीय जाल में उलझी हुई है। यदि खामेनेई शासन का अंत होता है, तो ईरान भारी अस्थिरता, सत्ता संघर्ष, और संभावित विघटन की ओर बढ़ सकता है। हालांकि ईरान का समाज ऐतिहासिक रूप से केंद्रीकृत रहा है, लेकिन वर्तमान वैश्विक और आंतरिक परिस्थितियां उसे बिखराव की कगार पर ले जा सकती हैं।





