भारत और अमेरिका के रिश्तों में एक बार फिर ठंडक आ गई है — और इसकी वजह हैं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप। ट्रंप ने बुधवार 6 अगस्त 2025 को एक नया आदेश पारित किया। जिसके तहत भारत पर आयात शुल्क (टैरिफ) बढ़ाकर 50% कर दिया गया है। वजह? भारत रूस से तेल खरीद रहा है। अगर भारत ने अपनी नीति नहीं बदली, तो 27 अगस्त से अतिरिक्त 25% टैरिफ लागू हो जाएगा, यानी अमेरिका भारत को आर्थिक तौर पर दंडित करेगा।
- ट्रंप की धमकी से ताजा हुईं निक्सन युग की यादें
- भारत पर टैरिफ का डंडा और पाक पर मेहरबानी
- क्या रिश्ते फिर पुराने दौर में लौट रहे हैं?
यह कदम भारत-अमेरिका संबंधों को एक नाजुक मोड़ पर ले आया है — और कुछ विश्लेषकों का मानना है कि हम 1971 जैसे तनावपूर्ण दौर की ओर लौट रहे हैं, जब अमेरिका ने खुलेआम पाकिस्तान का समर्थन किया था और भारत के खिलाफ सख्त रवैया अपनाया था। भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों में अचानक आई तल्खी ने इतिहास के पन्नों को फिर से पलट दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर अतिरिक्त 25% टैरिफ लगाने की धमकी के बाद दोनों देशों के रिश्ते 1970 के दशक की खटास की ओर लौटते दिखाई दे रहे हैं। ट्रंप ने भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने पर नाराज़गी जताते हुए 6 अगस्त को एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत भारत पर टैरिफ को कुल मिलाकर 50% कर दिया गया है। यह आदेश 27 अगस्त से लागू होगा यदि भारत रूसी तेल खरीदना नहीं रोकता।
यह कदम एकतरफा और बेहद आक्रामक माना जा रहा है, जिसे लेकर भारत ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने संसद में कहा, “भारत के लिए देश पहले है। हम दबाव में झुकने वाले नहीं हैं।”
1971 की यादें फिर ताजा
भारत-अमेरिका रिश्तों में ऐसा तनाव इससे पहले 1971 में देखा गया था, जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत ने पाकिस्तान को हराकर बांग्लादेश की आज़ादी में अहम भूमिका निभाई थी। तब अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) हेनरी किसिंजर ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया था। अमेरिकी युद्धपोत USS Enterprise को बंगाल की खाड़ी भेजने जैसी कार्रवाइयों ने भारत पर प्रत्यक्ष सैन्य दबाव बनाने की कोशिश की थी।
वहीं अब 2025 में ट्रंप द्वारा टैरिफ और आर्थिक सज़ा की धमकी देना भी कुछ वैसा ही नजर आ रहा है। ट्रंप का यह कहना कि “भारत हमारे साथ सही व्यवहार नहीं करता” निक्सन की उस भाषा की याद दिलाता है, जब वे भारतीय नेताओं के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करते थे।
क्या फिर रूस की ओर झुक रहा भारत?
1970 के दशक में जब अमेरिका ने भारत से दूरी बनाई थी, तब भारत ने सोवियत संघ का हाथ थामा था। यह दोस्ती इतनी गहरी थी कि आज तक रूस को भारत का सबसे भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार माना जाता है। आज फिर से वही परिदृश्य उभरता दिख रहा है। ट्रंप की धमकी के बावजूद भारत ने रूसी तेल खरीदना जारी रखा है। भारत की ओर से साफ कर दिया गया है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरत के साथ रणनीतिक हितों से समझौता नहीं करने वाला है।
ट्रंप की ओर से पाकिस्तान को लगातार समर्थन देना और भारत को आर्थिक दंड देना यह संकेत देता है कि वह भी निक्सन की ही तरह पाकिस्तान को अमेरिका के लिए एक अहम मोहरा मान रहे हैं। खासतौर पर अफगानिस्तान और चीन के संदर्भ में पाकिस्तान को अहम मानते हुए ट्रंप प्रशासन उस पर मेहरबान नजर आता है।
अमेरिकी रणनीति: दबाव या दोस्ती?
ट्रंप की यह रणनीति अमेरिका की परंपरागत नीति से हटकर है। बाइडेन प्रशासन के दौरान भारत-अमेरिका रिश्ते चरम पर थे। रक्षा, व्यापार, तकनीक और क्वाड जैसे मंचों पर दोनों देशों ने नजदीकी दिखाई थी। लेकिन ट्रंप के सत्ता में आने के बाद अमेरिका ने “अमेरिका फर्स्ट” की नीति को फिर से लागू करते हुए अपने पुराने सहयोगियों पर भी सख्ती दिखाना शुरू कर दिया है।
भारत के साथ टैरिफ बढ़ाने का फैसला इसी कड़ी में देखा जा रहा है। आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप रूस को अलग-थलग करने की नीति के तहत भारत पर दबाव बना रहे हैं, लेकिन यह कदम उल्टा असर कर सकता है। भारत जैसी उभरती शक्ति को धमकाना, उसके आत्मनिर्भर और रणनीतिक हितों को चुनौती देना, रिश्तों में स्थायी दरार डाल सकता है।
भारत की रणनीति क्या होगी?
भारत ने साफ कर दिया है कि वह अमेरिका के दबाव में अपनी ऊर्जा नीति नहीं बदलेगा। सरकारी सूत्रों का कहना है कि भारत WTO में भी इस टैरिफ के खिलाफ आवाज उठा सकता है। साथ ही व्यापारिक जवाबी कार्रवाई भी की जा सकती है। भारत के पास यह विकल्प भी है कि वह अमेरिका के अलावा यूरोप और एशिया के अन्य बाजारों की ओर रुख करे। रूस, ईरान और खाड़ी देशों के साथ बढ़ता सहयोग भी भारत को ऊर्जा सुरक्षा देने में सहायक हो सकता है।
डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ फैसले ने भारत-अमेरिका रिश्तों में 50 साल पुरानी दरार को फिर से सामने ला दिया है। निक्सन युग की तरह ही आज भी भारत को एक चुनौती दी जा रही है – पर फर्क इतना है कि अब भारत एक उभरती नहीं, बल्कि एक वैश्विक शक्ति है, जो अपने हितों की रक्षा करना जानता है।
इस बार न तो युद्धपोत भारत को झुका सकेगा और न ही टैरिफ। रिश्तों की असली परीक्षा अब होगी – क्या दोनों देश अपनी कूटनीति से इस दरार को भर पाएंगे या फिर 1971 की कहानी फिर दोहराई जाएगी?





