भारत का अनस्ट्रक्चर्ड डेटा संकट: एंटरप्राइज एआई की नई दिशा
भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस AI की चर्चा अब केवल चैटबॉट या ऑटोमेशन तक सीमित नहीं रही। देश की विशाल और विविध डिजिटल अर्थव्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती है—अनस्ट्रक्चर्ड डेटा यानी असंगठित और बिखरी हुई जानकारी। यही चुनौती अब भारतीय कंपनियों को एक अलग तरह के एंटरप्राइज एआई की ओर धकेल रही है। India AI Impact Summit 2026 के दौरान EconomicTimes.com से बातचीत में Mathangi Sri Ramachandran, जो YuVerse की सह-संस्थापक और सीईओ हैं, ने अपनी कंपनी को “लाइफस्टाइल एआई” फर्म बताया। उनका कहना है कि एआई को अलग-थलग टूल की तरह नहीं, बल्कि कंपनियों के रोज़मर्रा के संचालन का हिस्सा बनाना ही असली बदलाव है।
बैंकिंग से आगे, मल्टी-मोडल एआई की ओर
यूवर्स की शुरुआत बैंकों के साथ काम करते हुए हुई थी, लेकिन जल्द ही कंपनी ने गैर-बैंकिंग क्षेत्रों में भी विस्तार किया। आज कंपनी की क्षमताएं वॉयस, वीडियो, विज़न, टेक्स्ट प्रोसेसिंग और रिस्क स्कोरिंग मॉडल तक फैली हैं। रामचंद्रन के मुताबिक, भारत जैसे बाजार में एआई का वास्तविक उपयोग तभी संभव है जब उसे जमीनी जरूरतों से जोड़ा जाए। केवल मॉडल बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे उस कार्यप्रवाह (वर्कफ्लो) में फिट करना जरूरी है जिसमें कर्मचारी रोज़ काम करते हैं।
संवादात्मक एआई और भाषा की खाई
भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता एआई के लिए एक बड़ी चुनौती भी है और अवसर भी। रामचंद्रन का कहना है कि भारत ऐतिहासिक रूप से “टेक्स्ट-हैवी” बाजार नहीं रहा। उदाहरण के तौर पर, व्हाट्सऐप पर लोग अक्सर टाइप करने के बजाय वॉयस मैसेज रिकॉर्ड करते हैं। दूसरी ओर, औपचारिक व्यावसायिक संवाद प्रायः अंग्रेजी में होता है, जिससे बड़ी आबादी डिजिटल कॉमर्स से प्रभावी रूप से बाहर रह जाती है। यहीं पर यूवर्स को “कन्वर्सेशनल एआई” यानी संवादात्मक एआई की बड़ी भूमिका दिखाई देती है। खासकर माइक्रोफाइनेंस जैसे क्षेत्रों में, जहां उधार लेने वाले अक्सर क्रेडिट की शर्तों या पुनर्भुगतान की जिम्मेदारियों को पूरी तरह समझ नहीं पाते। रामचंद्रन का तर्क है कि बहुभाषी वॉयस सिस्टम उधारकर्ता की अपनी भाषा में सटीक और एकसमान जानकारी दे सकता है। इससे वह अंतर भर सकता है जिसे अब तक अनौपचारिक और असंगत वसूली प्रक्रियाएं भरती रही हैं।
पायलट प्रोजेक्ट से प्रोडक्शन तक की चुनौती
उद्योग के आंकड़े बताते हैं कि एंटरप्राइज एआई के कई प्रोजेक्ट पायलट चरण से आगे नहीं बढ़ पाते। रामचंद्रन के अनुसार, इसका कारण तकनीक नहीं, बल्कि निर्माण का तरीका है। यदि एआई मॉडल को अंतिम उपयोगकर्ताओं के वर्कफ्लो को समझे बिना विकसित किया जाता है, तो उसे अपनाने में दिक्कत आती है। यूवर्स का तरीका यह है कि वह क्लाइंट की वास्तविक प्रक्रियाओं के साथ सीधे जुड़कर काम करती है—कॉल सेंटर एजेंट्स के साथ बैठना, दस्तावेज़ों की हैंडलिंग समझना और निर्णय कैसे लिए जाते हैं, इसका विश्लेषण करना। उदाहरण के तौर पर, दस्तावेज़ प्रोसेसिंग में कंपनी OCR (ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन) और बड़े भाषा मॉडल का उपयोग करके संपत्ति पत्र, राशन कार्ड, केवाईसी फॉर्म जैसे भारतीय दस्तावेजों से डेटा निकालती है। लेकिन केवल डेटा निकालना ही लक्ष्य नहीं होता; सत्यापन और अपवाद-प्रबंधन (एक्सेप्शन हैंडलिंग) को भी उतनी ही अहमियत दी जाती है।
एआई निर्णय के दो मॉडल
नियामित (रेगुलेटेड) उद्योगों में एआई के दो अलग-अलग उपयोग सामने आ रहे हैं। पहला मॉडल वह है जिसमें एआई रियल-टाइम में स्वतः निर्णय लेता है—जैसे ग्राहक से बात करने वाला वॉयस बॉट, जो बातचीत के दौरान रुककर मानव अनुमति नहीं ले सकता। दूसरा मॉडल निर्णय-सहायक (डिसीजन सपोर्ट) का है, जहां बड़े ऋण स्वीकृति जैसे महत्वपूर्ण मामलों में अंतिम हस्ताक्षर मानव द्वारा किए जाते हैं। रामचंद्रन बताती हैं कि दूसरे मॉडल में अपनाने का विरोध अधिक होता है। जिन कर्मचारियों की भूमिका समीक्षा और अनुमोदन की है, वे एआई की सिफारिशों को अपने काम के लिए खतरे के रूप में देख सकते हैं। इसलिए तकनीकी डिज़ाइन के साथ-साथ संगठनात्मक संवेदनशीलता भी जरूरी है।
गवर्नेंस, नियम और “सहानुभूति”
नियामक अनुपालन के संदर्भ में रामचंद्रन ने MIT के 11-स्तंभ एआई गवर्नेंस फ्रेमवर्क, GDPR और EU AI Act का उल्लेख किया, जिनसे यूवर्स मार्गदर्शन लेता है। भारत में अभी तक एआई के लिए पूर्ण रूप से संहिताबद्ध कानून नहीं है, हालांकि दिशा-निर्देश मौजूद हैं। रामचंद्रन का मानना है कि केवल नियम पर्याप्त नहीं हैं। उनके शब्दों में, “मूल में सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आप सिस्टम को कितनी सहानुभूति के साथ बनाते हैं।” उनका तर्क है कि सहानुभूति भले ही मानवीय गुण हो, लेकिन उसे मशीन के व्यवहार में भी डिज़ाइन किया जा सकता है।
जैसे-जैसे भारत की एआई नीति विकसित होगी, यह देखना बाकी है कि “सहानुभूतिपूर्ण एआई” का विचार नियामकीय जांच में कितना टिकता है। फिलहाल यूवर्स का फोकस बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन-लेवल डिप्लॉयमेंट पर है, जहां वह अपने क्लाइंट्स के लिए लाखों संवाद और दस्तावेज़ प्रोसेसिंग कार्य संभाल रही है। भारत का अनस्ट्रक्चर्ड डेटा संकट केवल तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, भाषाई और संस्थागत जटिलताओं से जुड़ा मुद्दा है। ऐसे में एंटरप्राइज एआई का भविष्य केवल एल्गोरिद्म से नहीं, बल्कि उस संवेदनशील डिजाइन से तय होगा जो वास्तविक भारतीय परिदृश्य को समझता हो।