भारत के जंगल और खेतों पर ‘पारिस्थितिक सूखे’ की चपेट: आईआईटी खड़गपुर के शोध में चौंकाने वाले खुलासे
“जलवायु संकट का नया रूप: भारत के पारिस्थितिक तंत्र को ‘सूखे’ का खतरा”
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने एक चेतावनी जारी की है: भारत के जंगलों और कृषि भूमि में दीर्घकालिक नमी की कमी (पारिस्थितिक सूखा) तेजी से बढ़ रही है। यह समस्या हिमालय से लेकर दक्षिणी अर्ध-शुष्क क्षेत्रों तक फैली है और खाद्य सुरक्षा, वन्यजीवों के आवास, और सामाजिक-आर्थिक स्थिरता को गंभीर खतरे में डाल रही है।
1. पारिस्थितिक सूखा क्या है?
पारिस्थितिक सूखा एक ऐसी स्थिति है जब पर्यावरणीय तंत्र (जैसे वनस्पति, मिट्टी, और जल स्रोत) में दीर्घकालिक नमी की कमी होती है। यह मौसमी सूखे से अलग है, जो अल्पकालिक मौसम परिवर्तन के कारण होता है। आईआईटी के अध्ययन के अनुसार, भारत के 6 संवेदनशील क्षेत्रों—हिमालय, पूर्वोत्तर, पूर्वी सिंधु-गंगा मैदान (आईजीपी), मध्य भारत, और दक्षिणी अर्ध-शुष्क क्षेत्र—में यह समस्या सबसे गंभीर है।
2. शोध के प्रमुख निष्कर्ष:
- मौसमी सूखे का योगदान (23%): गर्मियों के मॉनसून में वर्षा की कमी और तापमान में वृद्धि ने पारिस्थितिक सूखे को बढ़ावा दिया है।
- महासागरों का गर्म होना (18%): हिंद महासागर और अरब सागर के तापमान में वृद्धि से वायुमंडलीय नमी का संतुलन बिगड़ा है, जिससे सूखे की स्थिति और भी गंभीर हुई है।
- मानवीय प्रभाव: वनों की कटाई, अत्यधिक सिंचाई, और जल संसाधनों का अंधाधुंध दोहन ने समस्या को बढ़ाया है।
डॉ. जयनारायणन कुट्टीप्पुरथ (आईआईटी खड़गपुर) के अनुसार, “पारिस्थितिक सूखा अब एक ‘साइलेंट क्राइसिस’ बन गया है। उदाहरण के लिए, केरल के पश्चिमी घाट और मध्य प्रदेश के वनों में पत्तियों का सूखना, और पंजाब के खेतों में मिट्टी की नमी में 40% गिरावट देखी गई है।”
3. प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति:
- हिमालय: ग्लेशियरों के पिघलने से नदियों में पानी की कमी और वनस्पति के सूखने की आशंका।
- पूर्वोत्तर भारत: असम और मेघालय के घने जंगलों में पेड़ों की वृद्धि दर 15% तक घटी है।
- दक्षिणी अर्ध-शुष्क क्षेत्र: कर्नाटक और तमिलनाडु में मिट्टी की नमी 30% तक कम हुई है, जिससे रागी और चावल की पैदावार प्रभावित हुई है।
4. परिणाम और चुनौतियाँ:
- वन्यजीवों पर असर: बाघों और हाथियों जैसे जीवों के आवासों में पानी की कमी से उनकी आवाजाही बाधित हो रही है।
- कृषि संकट: महाराष्ट्र और राजस्थान में गेहूं और कपास की पैदावार में 20-25% की गिरावट दर्ज की गई है।
- कार्बन सिंक कमजोर: जंगलों की “कार्बन अवशोषण क्षमता” में 18% की गिरावट से जलवायु परिवर्तन और तेज हो सकता है।
5. विशेषज्ञों की राय:
- डॉ. विकास कुमार पटेल (आईआईटी खड़गपुर): “पारिस्थितिक सूखा एक ‘साइलेंट एमरजेंसी’ है। हमें जलवायु नीतियों में इसे प्राथमिकता देनी होगी।”
- कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रिया शर्मा: “किसानों को जल-संरक्षण तकनीकों (जैसे ड्रिप इरिगेशन) और सूखा-रोधी फसलों की ओर बढ़ना होगा।”
6. समाधान के रास्ते:
- टिकाऊ भूमि प्रबंधन: जैविक खेती और मल्चिंग जैसी तकनीकों को बढ़ावा।
- जलवायु अनुकूलन: वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण परियोजनाओं को प्राथमिकता।
- नीति निर्माण: पारिस्थितिक सूखे को राष्ट्रीय जलवायु नीति में शामिल करना और स्थानीय समुदायों को जागरूक करना।
आईआईटी खड़गपुर का यह अध्ययन भारत के लिए एक चेतावनी और एक कार्ययोजना दोनों है। शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर तत्काल कार्रवाई न की गई, तो 2030 तक 25% भारतीय कृषि भूमि पारिस्थितिक सूखे के चपेट में आ सकती है। इसलिए, सरकार, वैज्ञानिक समुदाय, और आम नागरिकों को मिलकर इस चुनौती का सामना करना होगा। अंतिम संदेश: “पारिस्थितिक सूखा एक ‘साइलेंट क्राइसिस’ नहीं, बल्कि एक सामूहिक जिम्मेदारी है। आज की कार्रवाई कल की पीढ़ी को बचा सकती है।
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