इजरायल के साथ रिश्तों में नया दौर: 75 साल की हिचक से बाहर निकलकर भारत ने बदले कूटनीतिक समीकरण
भारत और इजरायल के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में तेजी से नए दौर में प्रवेश करते दिखाई दे रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा और वहां प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ उनकी बढ़ती नजदीकी को भारत की विदेश नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। लंबे समय तक संतुलन साधकर चलने वाली भारत की नीति अब धीरे-धीरे अधिक स्पष्ट और राष्ट्रीय हितों पर आधारित होती नजर आ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने इजरायल के साथ संबंधों को लेकर लगभग 75 वर्षों तक चली झिझक से बाहर निकलकर अब एक नए और व्यावहारिक दृष्टिकोण को अपनाया है।
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इजरायल संग भारत के नए रिश्ते
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75 साल बाद बदली कूटनीति
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भारत-इजरायल संबंधों में नया दौर
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हिचक छोड़ भारत ने बदली नीति
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इजरायल संग रणनीतिक साझेदारी मजबूत
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नई विदेश नीति का मजबूत संकेत
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पश्चिम एशिया में भारत की सक्रियता
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बदले वैश्विक समीकरण, बदली रणनीति
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भारत-इजरायल सहयोग नई ऊंचाई पर
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कूटनीति में भारत का बड़ा बदलाव
प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा केवल एक औपचारिक कूटनीतिक कार्यक्रम भर नहीं थी, बल्कि इसे दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने के संकेत के रूप में भी देखा गया। इस यात्रा के दौरान मोदी और नेतन्याहू के बीच दिखाई गई व्यक्तिगत गर्मजोशी और विश्वास ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया। दोनों नेताओं की मुलाकातों और संयुक्त कार्यक्रमों ने यह संकेत दिया कि भारत और इजरायल के रिश्ते अब केवल औपचारिक कूटनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रणनीतिक, तकनीकी और सुरक्षा सहयोग के नए आयामों तक पहुंच चुके हैं।
हालांकि प्रधानमंत्री मोदी की इस सक्रिय कूटनीति को लेकर देश के भीतर राजनीतिक बहस भी देखने को मिली। विपक्ष के कुछ नेताओं और रणनीतिक विश्लेषकों ने इसे लेकर सवाल उठाए और भारत की पारंपरिक विदेश नीति से अलग कदम बताया। आलोचकों का मानना था कि इजरायल के साथ इतनी खुली नजदीकी भारत के लिए पश्चिम एशिया की जटिल राजनीति में संतुलन बनाए रखना कठिन बना सकती है। लेकिन दूसरी ओर सरकार और उसके समर्थकों का तर्क है कि बदलते वैश्विक हालात में भारत को अपनी विदेश नीति को अधिक व्यावहारिक और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप बनाना ही होगा।
इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज रही। सामान्य राजनीतिक आलोचना के अलावा पूर्व व्यवस्था से जुड़े कुछ वरिष्ठ नेताओं ने भी सार्वजनिक रूप से लेख लिखकर अपनी चिंताएं जताईं। इसे कुछ विश्लेषकों ने इस बात का संकेत माना कि भारत की विदेश नीति में हो रहे बदलाव को लेकर राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में एक नई बहस शुरू हो चुकी है।
प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग पर भी विशेष ध्यान दिया गया। इजरायल को दुनिया के प्रमुख रक्षा तकनीक विकसित करने वाले देशों में गिना जाता है और भारत पिछले कई वर्षों से उससे रक्षा उपकरण और तकनीक प्राप्त करता रहा है। इस यात्रा ने इस सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में नई संभावनाओं को जन्म दिया। रक्षा, कृषि तकनीक, जल प्रबंधन और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी दोनों देशों ने जोर दिया।
इजरायल की संसद क्नेस्सेट में प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन के दौरान वहां के राजनीतिक दलों के बीच दुर्लभ द्विदलीय समर्थन देखने को मिला। यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण संकेत था कि इजरायल की राजनीति में भारत को एक विश्वसनीय और महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देखा जा रहा है। इसके अलावा 7 अक्टूबर के आतंकी हमलों के पीड़ितों के प्रति भारत की स्पष्ट संवेदना और एकजुटता को भी इजरायल में सकारात्मक रूप से लिया गया।
इसके बावजूद भारत ने अपनी पारंपरिक रणनीतिक स्वायत्तता की नीति को बरकरार रखा है। पश्चिम एशिया के कई देशों के साथ भारत के लंबे समय से आर्थिक और ऊर्जा संबंध रहे हैं। खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं और वहां से भारत को ऊर्जा की आपूर्ति भी होती है। इसलिए इजरायल के साथ बढ़ती नजदीकी का अर्थ यह नहीं है कि भारत किसी एक पक्ष के साथ खड़ा होकर क्षेत्रीय संघर्षों में शामिल हो जाएगा। भारत की नीति अभी भी संतुलन बनाए रखने और सभी देशों के साथ संबंध मजबूत करने की रही है।
भारत की यह संतुलित नीति पहले भी कई वैश्विक मुद्दों पर दिखाई दे चुकी है। उदाहरण के लिए रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद रूस के साथ अपने संबंधों को पूरी तरह से खत्म नहीं किया। इसके बावजूद भारत और यूरोपीय देशों के बीच संबंधों पर कोई गंभीर असर नहीं पड़ा। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत आज वैश्विक मंच पर अपने हितों के आधार पर फैसले लेने की स्थिति में है।
भारत और इजरायल के संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी इस बदलाव को समझने में महत्वपूर्ण है। वर्ष 1947 में जब संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन के विभाजन और इजरायल के गठन का प्रस्ताव आया था, तब भारत से समर्थन की उम्मीद की जा रही थी। उस समय भारत में यहूदी समुदाय के खिलाफ कोई संगठित विरोध नहीं था और दोनों समुदायों के बीच संबंध भी अपेक्षाकृत सौहार्दपूर्ण थे।
इतिहास में यह भी उल्लेख मिलता है कि प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन सहित कई प्रमुख हस्तियों ने भारत से इजरायल के गठन का समर्थन करने की अपील की थी। आइंस्टीन और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बीच पत्राचार भी हुआ था, जिसमें इजरायल को मान्यता देने की अपील नैतिक आधार पर की गई थी। हालांकि नेहरू ने अपने जवाब में स्पष्ट किया था कि भारत यहूदी समुदाय के कष्टों के प्रति सहानुभूति रखता है, लेकिन किसी भी देश की विदेश नीति अंततः उसके राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय होती है।
आज जब भारत और इजरायल के संबंध तेजी से नए आयाम हासिल कर रहे हैं, तो यह बदलाव केवल कूटनीतिक स्तर तक सीमित नहीं है। तकनीक, रक्षा, कृषि और नवाचार जैसे क्षेत्रों में सहयोग दोनों देशों को करीब ला रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह साझेदारी और मजबूत हो सकती है, बशर्ते भारत अपनी संतुलित और स्वतंत्र विदेश नीति को बनाए रखते हुए सभी पक्षों के साथ संवाद जारी रखे। कुल मिलाकर देखा जाए तो भारत और इजरायल के बीच बढ़ती निकटता भारत की बदलती वैश्विक भूमिका और उसके आत्मविश्वास का संकेत है। यह बदलाव दर्शाता है कि आज का भारत अपनी विदेश नीति को पुराने संकोचों से मुक्त कर अधिक व्यावहारिक और रणनीतिक दिशा में आगे बढ़ा रहा है।




