ईरान-इजरायल तनाव के बीच भारत की कूटनीति: कैसे नई दिल्ली बना वैश्विक संतुलन का केंद्र
साल 2026 की शुरुआत में पश्चिम एशिया का माहौल अचानक बेहद तनावपूर्ण हो गया। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते टकराव ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया। तेल की कीमतें तेजी से बढ़ने लगीं, वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई और कई देशों के शेयर बाजारों में गिरावट देखी गई। अमेरिका ने अपने युद्धपोतों को क्षेत्र में भेज दिया, चीन ने कूटनीतिक चालें चलनी शुरू कर दीं और रूस भी इस संकट को अपने प्रभाव बढ़ाने के अवसर के रूप में देख रहा था।
इन सबके बीच भारत ने ऐसा रास्ता चुना जिसने वैश्विक राजनीति में उसकी भूमिका को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया। भारत ने किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय संतुलित कूटनीति अपनाई और यही रणनीति बाद में उसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आई।
संतुलन की नीति पर भारत का जोर
भारत की विदेश नीति लंबे समय से रणनीतिक संतुलन पर आधारित रही है। इस संकट के दौरान भी भारत ने यही सिद्धांत अपनाया। भारत के विदेश मंत्री S. Jaishankar ने एक ऐसी कूटनीतिक पहल शुरू की जिसे कई विश्लेषकों ने “इंडियन बैलेंस” की नीति कहा।
भारत ने एक तरफ इजरायल के साथ अपनी रक्षा और तकनीकी साझेदारी को बरकरार रखा, तो दूसरी तरफ ईरान के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों और आर्थिक सहयोग को भी मजबूत बनाए रखा। खासतौर पर ईरान के चाबहार बंदरगाह परियोजना में भारत की भूमिका इस समय और अधिक महत्वपूर्ण हो गई। यह बंदरगाह भारत को मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक व्यापारिक पहुंच देता है।
तेल और ऊर्जा सुरक्षा का सवाल
इस संकट के दौरान सबसे बड़ा मुद्दा ऊर्जा सुरक्षा का था। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव होने लगा। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए यह एक बड़ी चुनौती थी। भारत ने इस स्थिति से निपटने के लिए अपने ऊर्जा स्रोतों को विविध बनाने की नीति अपनाई। रूस से सस्ते दाम पर कच्चा तेल खरीदना और उसे रिफाइन करके अन्य देशों को निर्यात करना भारत के लिए आर्थिक रूप से लाभदायक साबित हुआ। इस प्रक्रिया में भारत ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और कई देशों के लिए तेल की आपूर्ति बनाए रखने में मदद की।
समुद्री सुरक्षा में भारत की सक्रियता
पश्चिम एशिया के समुद्री मार्ग वैश्विक व्यापार के लिए बेहद अहम हैं। ईरान और इजरायल के बीच तनाव बढ़ने के बाद कई जहाजों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई थी। ऐसे समय में Indian Navy ने क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाई और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निगरानी अभियान चलाया। इस कदम का उद्देश्य किसी एक देश का समर्थन करना नहीं बल्कि वैश्विक व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा बनाए रखना था। भारत के इस कदम की कई देशों ने सराहना की क्योंकि इससे समुद्री व्यापार बाधित होने से बच गया।
सभी पक्षों से संवाद की कोशिश
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी संवाद की नीति रही। भारत ने एक तरफ ईरान से संपर्क बनाए रखा तो दूसरी ओर इजरायल के साथ भी बातचीत जारी रखी। इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu के साथ भारत के करीबी संबंध हैं, जबकि ईरान के साथ भी भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्ते रहे हैं। इसी कारण भारत दोनों पक्षों से बातचीत करने की स्थिति में था। कूटनीतिक स्तर पर भारत ने यह स्पष्ट किया कि वह किसी भी ऐसे कदम का समर्थन नहीं करेगा जिससे क्षेत्रीय शांति को खतरा हो। भारत का मुख्य उद्देश्य तनाव कम करना और व्यापारिक व ऊर्जा हितों की रक्षा करना था।
रूस और अमेरिका के बीच संतुलन
इस पूरे संकट में भारत को एक और चुनौती का सामना करना पड़ा—अमेरिका और रूस के बीच संतुलन बनाए रखना।
रूस के राष्ट्रपति Vladimir Putin के साथ भारत के लंबे समय से रणनीतिक संबंध रहे हैं, जबकि अमेरिका भी भारत का महत्वपूर्ण साझेदार है। भारत ने दोनों देशों के साथ अपने रिश्तों को संतुलित रखते हुए यह स्पष्ट किया कि उसकी विदेश नीति पूरी तरह से राष्ट्रीय हितों पर आधारित है।
वैश्विक मंच पर बढ़ती भूमिका
इस संकट के दौरान भारत की भूमिका ने यह दिखाया कि वह केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था ही नहीं बल्कि एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति भी बन रहा है। भारत ने यह संदेश दिया कि वह संघर्ष को बढ़ाने के बजाय संवाद और सहयोग के जरिए समाधान खोजने में विश्वास रखता है। यही कारण है कि कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने भारत को “वैश्विक मध्यस्थ” की संभावित भूमिका में देखना शुरू कर दिया है। हालांकि पश्चिम एशिया का संकट पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। ईरान और इजरायल के बीच तनाव अब भी समय-समय पर सामने आता रहता है। साथ ही चीन और अमेरिका के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा भी क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों की रक्षा करते हुए वैश्विक संतुलन बनाए रखे।
पश्चिम एशिया के इस जटिल संकट ने यह स्पष्ट कर दिया कि आज की दुनिया में केवल सैन्य ताकत ही पर्याप्त नहीं है। कूटनीति, आर्थिक रणनीति और बहुपक्षीय संवाद भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। भारत ने इस संकट के दौरान जिस संतुलित नीति का प्रदर्शन किया, उसने यह संकेत दिया कि आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति में उसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
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