चांदनी, लालटेन और कविता: पेइचिंग में भारत-चीन सांस्कृतिक संवाद का रंग

मध्य-शरद उत्सव यानी मिड-ऑटम फेस्टिवल चीन के पारंपरिक त्योहारों में खास स्थान
रखता है। यह परिवार के साथ मिलकर चांद देखने, लालटेन सजाने और एक-दूसरे के
साथ खुशियां बांटने का अवसर है। इसी सांस्कृतिक भावना को साझा करते हुए चीन
स्थित भारतीय दूतावास ने 24 सितंबर को एक विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन
किया।

कार्यक्रम में भारत-चीन सांस्कृतिक साझेदारी सत्र के ज़रिए चीन की लोक परंपराओं और
मिड-ऑटम फेस्टिवल से जुड़ी संस्कृति का परिचय कराया गया। कार्यक्रम का मुख्य
आकर्षण था लैंटर्न पेंटिंग, जिसमें भारतीय दूतावास के अधिकारियों और हॉराइज़न
इनसाइट्स सेंटर की टीम ने साथ मिलकर पारंपरिक लालटेन पर चित्र उकेरे।
भारत के चीन में राजदूत विक्रम दोराईस्वामी, मिनिस्टर श्वेता सिंह और दूतावास के
अन्य कर्मचारियों ने भी इस गतिविधि में हिस्सा लिया। रंगों और चित्रों से सजी लालटेन
ने त्योहार के उल्लास के साथ-साथ दोनों संस्कृतियों के बीच संवाद का एक सहज
माध्यम भी तैयार किया।

कार्यक्रम में संस्कृति की एक और खूबसूरत झलक उस समय देखने को मिली, जब डू
जुआन ने कथक नृत्य की भाषा के माध्यम से चीन के प्रसिद्ध कवि सु शी की कविता
“प्रील्यूड टू वॉटर मेलोडी” को प्रस्तुत किया। कविता में कवि पूर्णिमा के चांद को निहारते
हुए पूछता है- चांद कब इतना उजला और पूर्ण होगा? वह आकाश की ओर अपना प्याला
उठाकर सवाल करता है और फिर कल्पना करता है कि यदि वह स्वर्ग के महलों में चला
जाए तो क्या वहां की ऊंचाइयां और ठंड उसे इंसानी दुनिया से दूर कर देंगी।
कविता की पंक्ति- “अपनी परछाईं के साथ नाचना, इंसानों की दुनिया में होने से कैसे
तुलना कर सकता है?” मानो इस सांस्कृतिक आयोजन की भावना को भी अभिव्यक्त
करती है। चांद, कविता, नृत्य और लालटेन- अलग-अलग सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां
होते हुए भी लोगों को जोड़ने का काम करते हैं।

मिड-ऑटम फेस्टिवल का महत्व केवल चांद देखने या लालटेन सजाने तक सीमित नहीं
है। यह पुनर्मिलन, सद्भाव और साझा खुशियों का त्योहार है। भारतीय दूतावास में
आयोजित इस कार्यक्रम ने इसी भावना को भारत और चीन के बीच सांस्कृतिक संवाद से
जोड़ा।
दूतावास के कर्मचारियों और कार्यक्रम में शामिल अतिथियों ने मिलकर त्योहार के
खुशनुमा माहौल का आनंद लिया और चीनी लोक संस्कृति में निहित परिवार, एकता
और शुभकामनाओं के संदेश को करीब से महसूस किया।

एक ओर चांदनी में चमकती लालटेन थीं, दूसरी ओर भारतीय नृत्य की लय- और इनके
बीच संस्कृति की वह साझा रोशनी थी, जो सीमाओं से परे लोगों को एक-दूसरे के करीब
लाती है।

(दिव्या पाण्डेय – चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

 

 

 

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