स्वतंत्रता दिवस 2025 : भारत के वो ध्वज जो भुला दिये गये…1947 से पहले जानें भारतीय झंडों के पीछे की कहानी
भारत का तिरंगा हर भारतीय के दिल में गर्व का भाव जगाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस आधुनिक ध्वज के रूप में आने से पहले कई ऐसे झंडे थे, जिन्हें इतिहास में भूलाया गया? इन झंडों में देश के अलग-अलग धर्मों और प्रांतों का प्रतिनिधित्व झलकता था।
1904 का प्रस्तावित झंडा
भारत के भुला दिए गए झंडों की कहानी
स्वतंत्रता दिवस 2025: भारत के वे भूल चुके तिरंगे, जिनसे बना आधुनिक राष्ट्रीय ध्वज
1947 से पहले के कई झंडों के पीछे की कहानी
1904 में एक एंग्लो-इंडियन साप्ताहिक पत्र ने भारत के लिए प्रस्तावित झंडे की रूपरेखा प्रकाशित की। इसमें तीन क्षैतिज पट्टियां थीं: हिंदू और बौद्धों के लिए गहरा नीला, मुसलमानों के लिए हरा और ईसाइयों के लिए हल्का नीला। बाईं ओर पर्पल पट्टी पर ओरियन तारामंडल के तारे अंकित थे, जो भारत के प्रांतों का प्रतीक थे। लाल किनारा ब्रिटिश शासन का संकेत था।
1905 का कलकत्ता ध्वज
बंगाल विभाजन के बाद 1905 में कलकत्ता ध्वज सामने आया। इसमें तीन क्षैतिज पट्टियां थीं। ऊपरी हरी पट्टी पर आठ सफेद कमल ब्रिटिश भारत के आठ प्रांतों का प्रतिनिधित्व करते थे। जिसमें बीच की पीली पट्टी पर ‘वंदे मातरम’ लिखा गया था। जबकि निचली लाल पट्टी पर सूर्य के साथ अर्धचंद्र अंकित थे। इस ध्वज को 22 अगस्त 1907 को जर्मनी के स्टटगार्ट में अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन के दौरान भीकाजी कामा ने पेश किया था।
1916 का होमरूल झंडा
साल 1916 में एनी बेसेंट के साथ बाल गंगाधर तिलक ने मिलकर होमरूल आंदोलन चलाया था। इसके लिए उन्होंने एक नया झंडा बनाया था। इस झंडे में लाल और हरे कलर की धारियां थीं। ब्रिटिश यूनियन जैक के साथ अर्धचंद्र और सात तारे भी इसमें शामिल थे। हालांकि तब इस झंडे को अंग्रेज सरकार के विरोध का सामना करना पड़ा और कोयंबटूर के मजिस्ट्रेट ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया था।
गांधीजी और चरखे वाला झंडा
अप्रैल 1921 में महात्मा गांधी ने अपनी पत्रिका यंग इंडिया में लिखा कि भारत को अपना झंडा चाहिए। उन्होंने लाला हंसराज के विचार से चरखे वाला डिजाइन अपनाया, जिसमें लाल और हरे रंग की पट्टियां थीं। लाल हिंदुओं और हरा मुसलमानों के प्रतिनिधित्व के लिए था।
1931 का स्वराज ध्वज
स्वराज ध्वज का 1931 में कांग्रेस द्वारा आधिकारिक रूप से चुनाव हुआ। गांधीजी ने लाल और हरे रंग के बीच सफेद पट्टी जोड़ी, जिससे सभी धर्मों का प्रतिनिधित्व हो सके। साल 1929 में गांधी जी ने रंगों का धर्मनिरपेक्ष अर्थ तय किया था। जिसमें लाल रंग बलिदान के लिए था तो सफेद पवित्रता के लिए था। इस झंडे में हरा रंग आशा के लिए था।
स्वतंत्र भारत का तिरंगा
अगस्त 1947 में स्वतंत्रता के पहले संविधान सभा ने नए राष्ट्र के लिए झंडे का निर्णय लिया। 23 जून 1947 को राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, सरोजिनी नायडू और बी. आर. अंबेडकर की अध्यक्षता में समिति गठित की गई। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के झंडे को ही तब आधार मानते हुए इसमें कुछ बदलाव किए गए थे। जैसे चरखा के स्थान पर अशोक चक्र रखा गया था। इसे 22 जुलाई 1947 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने केसरिया, सफेद और गहरे हरे रंग की धारियों वाला तिरंगा पेश किया, जिसमें नीला अशोक चक्र था। इसे सर्वसम्मति से राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार किया गया। …(प्रकाश कुमार पांडेय)





