CEC ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग नोटिस खारिज, विपक्ष को झटका, सियासत गरमाई
नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाया गया महाभियोग प्रस्ताव बड़ा झटका खा गया है। राज्यसभा के सभापति ने इस नोटिस को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है, जिससे यह मामला फिलहाल आगे नहीं बढ़ सकेगा। इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं और सियासत गरमा गई है।
यह प्रस्ताव देश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा था, क्योंकि आजादी के बाद पहली बार किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए इस तरह का प्रयास किया गया था। विपक्ष के 193 सांसदों—जिनमें लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सदस्य शामिल थे—ने इस महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। यह नोटिस 12 मार्च 2026 को राज्यसभा सभापति को सौंपा गया था।
महाभियोग प्रस्ताव संविधान के अनुच्छेद 324(5) और अनुच्छेद 124(4) के साथ-साथ “Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023” और “Judges (Inquiry) Act, 1968” के तहत पेश किया गया था। हालांकि, सभापति ने सभी पहलुओं की समीक्षा के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद नहीं है। इसी के साथ यह प्रक्रिया शुरुआती चरण में ही रुक गई।
विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कई गंभीर आरोप लगाए थे। इनमें पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण, कथित कदाचार, चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप और मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया में अनियमितताओं के आरोप शामिल थे। खासतौर पर बिहार में मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए और दावा किया कि इस प्रक्रिया के चलते कई मतदाता अपने अधिकार से वंचित रह गए। इन आरोपों के समर्थन में विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों का भी हवाला दिया था और मामले को गंभीर बताते हुए जांच की मांग की थी। लेकिन सभापति के फैसले ने इन सभी दावों को फिलहाल खारिज कर दिया है।
इस फैसले के बाद विपक्षी नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। डेरेक ओ’ब्रायन ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मजाक है और सरकार पर अप्रत्यक्ष रूप से निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह के फैसले से निष्पक्ष संस्थाओं की साख पर असर पड़ता है। वहीं सत्तारूढ़ पक्ष का कहना है कि सभापति ने पूरी प्रक्रिया का पालन करते हुए निष्पक्ष निर्णय लिया है और इसमें किसी तरह की राजनीति नहीं है। बीजेपी नेताओं का दावा है कि विपक्ष बेवजह मुद्दा बनाकर संस्थाओं को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला सिर्फ एक संवैधानिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे बड़े राजनीतिक संदेश भी छिपे हैं। एक तरफ विपक्ष चुनावी निष्पक्षता को मुद्दा बनाकर सरकार को घेरना चाहता है, वहीं दूसरी ओर सत्ता पक्ष इसे निराधार आरोप बताते हुए खारिज कर रहा है। इस घटनाक्रम ने आने वाले चुनावों से पहले राजनीतिक माहौल को और ज्यादा संवेदनशील बना दिया है। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की भूमिका और निष्पक्षता पर बहस तेज हो गई है, जो आने वाले समय में और गहराने की संभावना है।
फिलहाल, महाभियोग नोटिस खारिज होने के बाद मामला थम गया है, लेकिन इससे उपजी सियासी बहस अभी थमने के आसार नहीं हैं। विपक्ष इस मुद्दे को आगे भी उठाने की रणनीति बना सकता है, जबकि सरकार इसे कानूनी और प्रक्रियात्मक आधार पर सही ठहराने में जुटी रहेगी। कुल मिलाकर, मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ लाया गया यह महाभियोग प्रस्ताव भले ही आगे न बढ़ सका हो, लेकिन इसने देश की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है—जहां संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका, पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल लगातार उठते रहेंगे।