बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को लेकर जैसे-जैसे सियासी तापमान बढ़ रहा है, वैसे-वैसे देश के चर्चित राजस्थान के फलोदी सट्टा बाजार में भी हलचल तेज हो गई है। चुनावी नतीजों से पहले हर बार की तरह इस बार भी सटोरियों ने अपने अनुमान जारी किए हैं। दिलचस्प बात यह है कि फलोदी सट्टा बाजार का ताजा आंकलन कई टीवी चैनलों और सर्वे एजेंसियों के अनुमानों से बिल्कुल अलग नजर आ रहा है बाजार के मुताबिक, एनडीए (NDA) गठबंधन इस बार भी सत्ता पर काबिज रहेगा। अनुमान है कि एनडीए को 135 से 138 सीटें मिल सकती हैं, जबकि महागठबंधन (RJD-कांग्रेस गठबंधन) को केवल 93 से 96 सीटें मिलेंगी। वहीं, प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी को सटोरियों ने इस बार के चुनाव में “स्पॉइलर” या किंगमेकर की भूमिका में बताया है।
सटोरियों के मुताबिक, इस बार बिहार का चुनाव पूरी तरह त्रिकोणीय मुकाबला बन गया है। जनता के बीच असमंजस की स्थिति है कि तेजस्वी यादव की ‘हर घर नौकरी योजना’ का असर ज्यादा होगा या नीतीश कुमार के विकास मॉडल का।
एनडीए को बढ़त, सटोरियों का दावा
फलोदी सट्टा बाजार का रुझान बताता है कि एनडीए के पक्ष में इस बार माहौल थोड़ा बेहतर दिख रहा है। बीजेपी और जेडीयू गठबंधन को करीब 135 से 138 सीटों के बीच अनुमानित बढ़त दी गई है। सटोरियों का मानना है कि पीएम मोदी की लोकप्रियता और नीतीश कुमार का प्रशासनिक अनुभव एनडीए के लिए ‘ट्रम्प कार्ड’ साबित हो सकता है।
महागठबंधन के लिए झटका
वहीं, महागठबंधन को सटोरियों ने 93 से 96 सीटों के बीच सीमित बताया है। चुनावी सर्वे जहां तेजस्वी यादव को फायदा दिखा रहे हैं, वहीं सटोरियों को लगता है कि जन सुराज की एंट्री ने महागठबंधन का समीकरण बिगाड़ दिया है। तेजस्वी की ‘हर घर सरकारी नौकरी’ की घोषणा ने जनता का ध्यान जरूर खींचा है, लेकिन वोटों का बिखराव अभी भी चुनौती बना हुआ है।
जन सुराज बना ‘तीसरा फैक्टर’
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी को सटोरियों ने इस बार के चुनाव में निर्णायक करार दिया है। उनका कहना है कि जन सुराज सीधे तौर पर सत्ता में नहीं आएगा, लेकिन 20–25 सीटों पर वह अन्य दलों के वोट बैंक में सेंध लगा सकता है। यही वजह है कि बिहार में इस बार का मुकाबला दो नहीं, बल्कि तीन मोर्चों में बंट चुका है।
जनता में असमंजस और सियासी अनिश्चितता
‘वोट वाइब’ सर्वे के मुताबिक, जब जनता से पूछा गया कि इस बार कौन जीतेगा, तो 34.7% ने महागठबंधन, 34.4% ने एनडीए, जबकि 12.3% ने जन सुराज का नाम लिया। इससे साफ है कि जनता का मूड इस बार बंटा हुआ है। वोट वाइब के फाउंडर अमिताभ तिवारी के अनुसार, बिहार में मतदाता पहली बार तीन विकल्पों के बीच फंसा हुआ है।




