बिहार विधानसभा चुनाव 2025 जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, राज्य की सियासत में हलचल बढ़ती जा रही है। मगर इस बार बहस सिर्फ महागठबंधन बनाम एनडीए तक सीमित नहीं है बल्कि राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के परिवार के भीतर भी गहरा घमासान छिड़ा हुआ है। इस पारिवारिक संघर्ष ने चुनाव से पहले आरजेडी की रणनीति और छवि दोनों को सवालों के घेरे में ला दिया है।
तेजप्रताप एपिसोड से शुरू हुआ विवाद
तेजप्रताप यादव और तेजस्वी यादव के बीच मतभेद लंबे समय से किसी न किसी रूप में सामने आते रहे हैं। लेकिन हाल ही में घटित घटनाओं ने इन मतभेदों को खुलकर सबके सामने ला दिया। तेजप्रताप यादव ने छोटे भाई से मुलाकात की कोशिश की, मगर उन्हें मिलने तक नहीं दिया गया। इसके बाद उनके सोशल मीडिया पोस्ट ने आग में घी का काम किया और उन्हें पार्टी और परिवार दोनों से अलग-थलग कर दिया गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ भाई-भाई का झगड़ा नहीं है, बल्कि चुनावी रणनीति और वर्चस्व की लड़ाई है।
एक टिकट नीति पर अड़े तेजस्वी
अंदरखाने से आ रही खबरों के मुताबिक, आरजेडी के मुख्यमंत्री चेहरे तेजस्वी यादव ने यह तय कर लिया है कि इस बार परिवार से केवल एक ही सदस्य को टिकट मिलेगा। यानी लालू परिवार से विधानसभा चुनाव लड़ने वाला चेहरा सिर्फ तेजस्वी होंगे। इस निर्णय के पीछे सलाहकार संजय यादव का बड़ा योगदान बताया जा रहा है। संजय का मानना है कि अगर परिवार से कई लोगों को टिकट दिया गया तो विपक्षी दल परिवारवाद का मुद्दा उठाकर महागठबंधन को घेर सकते हैं। इसी आशंका के चलते तेजस्वी ने सख्त फैसला लिया है।
अब मीसा भारती नाराज
तेजस्वी की यह नीति न सिर्फ तेजप्रताप को हाशिए पर ले आई, बल्कि बड़ी बहन मीसा भारती भी इससे नाराज हो गई हैं। पार्टी सूत्रों की मानें तो मीसा ने पार्टी के आधिकारिक ट्विटर हैंडल को अनफॉलो कर दिया है। इसे उनकी नाराजगी का संकेत माना जा रहा है। मीसा भारती लंबे समय से राजनीति में सक्रिय हैं और राज्यसभा की सदस्य भी रही हैं। लेकिन इस बार उन्हें भी विधानसभा चुनावी मैदान से दूर रखा जा सकता है। यही कारण है कि परिवार के भीतर असंतोष गहराता जा रहा है।
लालू प्रसाद यादव की भूमिका
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस पूरे विवाद में आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की भूमिका क्या है। कभी पार्टी और परिवार दोनों में अंतिम फैसले लेने वाले लालू आज कमजोर नज़र आ रहे हैं। अंदरखाने की खबरें बताती हैं कि अब लालू प्रसाद यादव भी तेजस्वी के सामने खुद को निर्णायक स्थिति में नहीं देख पा रहे। कहा जा रहा है कि स्वास्थ्य और कानूनी चुनौतियों के बीच लालू ने परिवार की बागडोर तेजस्वी के हाथों में छोड़ दी है। लेकिन परिवार के अन्य सदस्य इस नए समीकरण को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं।
विपक्ष के लिए मुद्दा बना परिवारवाद
बिहार की राजनीति में परिवारवाद हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है। जदयू और भाजपा पहले भी इस पर आरजेडी को घेरते रहे हैं। अब जबकि लालू परिवार में ही घमासान मचा है, विपक्ष के लिए यह सुनहरा मौका है कि वे जनता के बीच परिवारवाद बनाम जनता का एजेंडा उठाएं। तेजस्वी का एक टिकट फार्मूला हालांकि रणनीतिक रूप से परिवारवाद के आरोप को कमजोर कर सकता है, लेकिन इसके कारण परिवार में जो बगावत खड़ी हो रही है, वह पार्टी के भीतर अस्थिरता को उजागर कर रही है।
चुनावी असर क्या होगा?
बिहार की राजनीति में लालू परिवार का प्रभाव लंबे समय से रहा है। यादव और मुस्लिम वोट बैंक आरजेडी की ताकत रहे हैं। लेकिन परिवारिक कलह से कार्यकर्ताओं और समर्थकों में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। अगर तेजप्रताप और मीसा जैसे नेता नाराज होकर खुलकर मोर्चा खोलते हैं, तो महागठबंधन की चुनावी रणनीति को बड़ा झटका लग सकता है। वहीं, अगर वे चुपचाप हाशिए पर चले जाते हैं, तब भी यह संदेश जाएगा कि आरजेडी परिवार में सबकुछ ठीक नहीं है। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले आरजेडी को बाहरी विरोधियों से ज्यादा चुनौती भीतर से मिल रही है। तेजस्वी यादव की पकड़ पार्टी पर मजबूत होती जा रही है, लेकिन इस पकड़ की कीमत उन्हें परिवारिक समर्थन खोकर चुकानी पड़ सकती है।
लालू परिवार का यह घमासान आने वाले दिनों में और गहराएगा या चुनाव से पहले कोई समझौता होगा—यह देखना दिलचस्प होगा। लेकिन इतना तय है कि इस विवाद ने चुनावी राजनीति में नया मोड़ जोड़ दिया है, जो विपक्ष और जनता दोनों के लिए चर्चा का बड़ा विषय बन चुका है।