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Home कृषि

MSP खरीद में बना ये रिकॉर्ड… जानें कितने किसानों को मिल रहा है असली लाभ?… फिर भी आंदोलन क्यों?

DigitalDesk by DigitalDesk
February 17, 2026
in कृषि, दिल्ली, मुख्य समाचार, शहर और राज्य, संपादक की पसंद, स्पेशल
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Minimum Support Price MSP system is expanding rapidly in India
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MSP खरीद: कितने किसानों को मिल रहा है असली लाभ?

भारत में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) व्यवस्था तेजी से विस्तार कर रही है। सरकारी खर्च बढ़ा है, फसलों की खरीद का दायरा बड़ा हुआ है और लाभ पाने वाले किसानों की संख्या भी पहले से अधिक हो गई है। कागज़ों पर तस्वीर मजबूत दिखती है। फिर भी MSP की कानूनी गारंटी को लेकर आंदोलन और विरोध जारी हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यही है—जब खरीद और खर्च दोनों रिकॉर्ड स्तर पर हैं, तो ज़मीन पर असल स्थिति क्या है?

वित्त वर्ष 2024–25 में केंद्र सरकार ने MSP के तहत फसलों की खरीद पर 3.47 लाख करोड़ रुपये खर्च किए। यह अब तक का सबसे ऊंचा आंकड़ा है। तुलना करें तो 2023–24 में यह खर्च 2.63 लाख करोड़ रुपये था, जबकि इससे पहले 2020–21 में 2.80 लाख करोड़ रुपये का रिकॉर्ड बना था। यह बढ़ोतरी केवल MSP दरों में वृद्धि की वजह से नहीं है, बल्कि इसलिए भी है क्योंकि अधिक मात्रा में फसल खरीदी गई और अधिक किसान इस व्यवस्था से जुड़े। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024–25 में MSP के तहत 122.3 मिलियन मीट्रिक टन फसलों की खरीद हुई, जो पिछले वर्ष 108.9 मिलियन मीट्रिक टन थी। वहीं लाभ पाने वाले किसानों की संख्या 15.2 मिलियन से बढ़कर करीब 19.6 मिलियन हो गई। यानी लगभग 44 लाख नए किसान इस प्रणाली से जुड़े।

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क्या अब ज्यादा किसान कवर हो रहे हैं?

लंबे समय तक आलोचना होती रही कि MSP का लाभ केवल सीमित किसानों को मिलता है। 2015 में शांता कुमार समिति ने अनुमान लगाया था कि केवल 6% किसान ही सीधे MSP से लाभान्वित होते हैं। यह आंकड़ा आज भी बहसों में उद्धृत किया जाता है। लेकिन ताज़ा आंकड़े संकेत देते हैं कि स्थिति बदली है। गेहूं और धान के अलावा दालों और तिलहनों की खरीद बढ़ने से अब लगभग 14% कृषि परिवार MSP से जुड़े हैं। देश में करीब 14 करोड़ कृषि परिवार हैं, जिनमें से लगभग 1.96 करोड़ को 2024–25 में MSP का लाभ मिला। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि पुराने अनुमानों को अब अद्यतन करने की आवश्यकता है क्योंकि खरीद का दायरा पहले से कहीं ज्यादा विस्तृत हो चुका है।

फिर भी क्यों जारी हैं आंदोलन?

जब खर्च और लाभार्थियों की संख्या दोनों बढ़ रहे हैं, तो फिर विरोध क्यों? किसान संगठनों का कहना है कि असली समस्या कानूनी गारंटी की कमी है। MSP केवल सरकारी खरीद तक सीमित है। निजी व्यापारियों के लिए MSP पर खरीद करना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है। परिणामस्वरूप कई मंडियों में फसलें MSP से कम दाम पर बिकती हैं। जहां सरकारी खरीद केंद्र कम हैं या खरीद प्रक्रिया धीमी है, वहां किसानों को मजबूरी में कम कीमत पर फसल बेचनी पड़ती है। किसान संगठन मांग कर रहे हैं कि ऐसा कानूनी प्रावधान बने जिससे कोई भी निजी खरीदार MSP से नीचे फसल न खरीद सके।

MSP गणना का विवाद

एक और बड़ा विवाद MSP की गणना को लेकर है। सरकार वर्तमान में A2+FL फार्मूला अपनाती है, जिसमें किसानों की नकद लागत (बीज, खाद, मजदूरी आदि) और परिवार के श्रम का अनुमानित मूल्य जोड़ा जाता है। किसान संगठन C2 फार्मूले की मांग करते हैं, जिसमें जमीन का किराया और पूंजी लागत जैसे व्यापक खर्च भी शामिल होते हैं। यह पद्धति स्वामीनाथन आयोग द्वारा सुझाई गई थी। दोनों फार्मूलों के बीच अंतर काफी बड़ा है। उदाहरण के लिए 2025–26 खरीफ सीजन के लिए धान का MSP 2,369 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है। लेकिन C2 पद्धति के अनुसार यह करीब 3,135 रुपये होना चाहिए। यही अंतर किसानों की आय पर सीधा प्रभाव डालता है।

MSP खरीद की व्यवस्था कैसे करती है काम

सरकार मुख्य रूप से भारतीय खाद्य निगम (FCI) और राज्य एजेंसियों के माध्यम से अनाज खरीदती है। जब दाल, तिलहन या कॉपरा जैसी फसलों के दाम MSP से नीचे जाते हैं, तब खरीद प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (PM-AASHA) के तहत की जाती है। इन अभियानों में NAFED और NCCF जैसी संस्थाएं सक्रिय भूमिका निभाती हैं। कपास और जूट जैसी विशेष फसलों के लिए अलग एजेंसियां जिम्मेदार होती हैं। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) की सिफारिशों के आधार पर सरकार खरीफ, रबी और व्यावसायिक श्रेणियों में 22 फसलों के लिए MSP तय करती है। इसका उद्देश्य किसानों को गिरती बाजार कीमतों से सुरक्षा प्रदान करना है। स्पष्ट है कि MSP प्रणाली का दायरा बढ़ा है। खर्च रिकॉर्ड स्तर पर है, खरीद की मात्रा बढ़ी है और लाभार्थी किसानों की संख्या में भी वृद्धि हुई है। लेकिन किसानों की मांग केवल संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि भरोसे और सुरक्षा की है। वे चाहते हैं कि MSP सिर्फ सरकारी मंडियों तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे बाजार में लागू हो। जब तक MSP को लेकर कानूनी आश्वासन नहीं मिलता और बाजार में वास्तविक कीमतें घोषित MSP के अनुरूप नहीं होतीं, तब तक केवल रिकॉर्ड आंकड़े किसान असंतोष को पूरी तरह शांत नहीं कर पाएंगे। भारत की MSP व्यवस्था विस्तार के दौर में है। पहले की तुलना में अधिक किसान इससे लाभान्वित हो रहे हैं। लेकिन बहस अब इस बात पर है कि क्या यह लाभ सभी किसानों तक स्थायी और समान रूप से पहुंच रहा है? आंकड़े विकास की कहानी बताते हैं, पर जमीन पर भरोसे की कमी अब भी बनी हुई है। यही कारण है कि रिकॉर्ड खरीद के बावजूद MSP की कानूनी गारंटी की मांग और आंदोलन जारी हैं।

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Tags: # MSP in India#Farmers MSP#Minimum Support Price#MSP system
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