गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि की कुर्सी कितनी अहम?
भारत में गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि की भूमिका केवल औपचारिक नहीं होती, बल्कि यह देश की विदेश नीति और रणनीतिक प्राथमिकताओं का स्पष्ट संकेत भी मानी जाती है। हर साल 26 जनवरी की परेड में शामिल होने वाला मुख्य अतिथि वह राष्ट्र या संगठन होता है, जिससे भारत अपने रिश्तों को नई ऊंचाई देना चाहता है। बीते वर्षों में यह देखा गया है कि गणतंत्र दिवस के मंच से कई बड़े रणनीतिक और आर्थिक समझौतों की नींव पड़ी है।
जब मुख्य अतिथि बने बड़े समझौतों की वजह
भारत के इतिहास में कई ऐसे उदाहरण हैं जब गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि की यात्रा के दौरान अहम करार हुए। जिस वर्ष मुंबई–अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना पर सहमति बनी, उसी साल जापान भारत के साथ इस महत्वाकांक्षी परियोजना में आगे आया। 2015 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा मुख्य अतिथि थे, उसी दौरान अमेरिका ने भारत को “मेजर डिफेंस पार्टनर” का दर्जा दिया। यह रक्षा सहयोग की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया।
राफेल डील और फ्रांस की भूमिका
2016 में फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि बने। उनकी यात्रा के दौरान भारत और फ्रांस के बीच 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद का समझौता हुआ। यह सौदा न केवल भारतीय वायुसेना की ताकत बढ़ाने वाला था, बल्कि भारत-फ्रांस रणनीतिक साझेदारी को भी नई मजबूती देने वाला साबित हुआ। इससे साफ है कि गणतंत्र दिवस का मंच कूटनीतिक रूप से कितना महत्वपूर्ण होता है।
77वें गणतंत्र दिवस में यूरोपीय संघ को विशेष महत्व
77वें गणतंत्र दिवस पर भारत ने एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए यूरोपीय संघ (EU) के शीर्ष दो नेताओं को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा इस परेड में शामिल होंगे। यह पहली बार है जब भारत ने किसी एक देश के बजाय पूरे यूरोपीय संघ के नेतृत्व को इस सम्मान के लिए चुना है।
यूरोपीय संघ को आमंत्रण क्यों अहम है?
यूरोपीय संघ कोई एक देश नहीं, बल्कि 27 देशों का समूह है। इसके शीर्ष नेतृत्व को आमंत्रित कर भारत एक साथ पूरे यूरोप से संवाद स्थापित करना चाहता है। उर्सुला वॉन डेर लेयेन यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष हैं, जो व्यापार समझौतों और नियमों को लागू करता है। वहीं एंटोनियो कोस्टा यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष हैं, जो सभी 27 सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों का प्रतिनिधित्व करते हैं और संघ की रणनीतिक दिशा तय करते हैं।
‘मदर ऑफ ऑल डील्स’: भारत–EU फ्री ट्रेड एग्रीमेंट
भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) इस आमंत्रण की सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है। करीब 18 साल की बातचीत के बाद यह समझौता अब अंतिम चरण में है। इसके 24 में से 20 अध्यायों पर सहमति बन चुकी है और 27 जनवरी 2026 को होने वाले भारत–EU शिखर सम्मेलन में इसकी घोषणा की उम्मीद है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इसे “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहा है। इससे दो अरब उपभोक्ताओं का बाजार बनेगा, जो वैश्विक GDP का लगभग एक चौथाई होगा।
चीन और अमेरिका के बीच संतुलन की रणनीति
भारत और यूरोपीय संघ दोनों ही चीन पर अत्यधिक निर्भरता को जोखिम भरा मानते हैं। सप्लाई चेन में चीन की भूमिका कम करने की साझा सोच ने दोनों को करीब लाया है। दक्षिण चीन सागर में चीन के आक्रामक रुख और अमेरिका–चीन प्रतिस्पर्धा के बीच भारत और EU रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करना चाहते हैं। डोनाल्ड ट्रंप के संभावित टैरिफ फैसलों के बीच भारत यूरोप के साथ व्यापार संबंध मजबूत कर अपने लिए एक सुरक्षित विकल्प तैयार कर रहा है।
IMEC कॉरिडोर और यूरोप की भूमिका
यूरोपीय संघ का समर्थन भारत–मिडिल ईस्ट–यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) के लिए भी बेहद अहम है। सितंबर 2023 में G20 शिखर सम्मेलन के दौरान घोषित यह परियोजना चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का विकल्प मानी जाती है। इस कॉरिडोर के जरिए भारत से खाड़ी देशों और वहां से रेल व सड़क मार्ग से यूरोप तक सीधा संपर्क बनेगा। इससे परिवहन समय 40% और लागत 30% तक कम होने की संभावना है।
गणतंत्र दिवस मंच से भारत का वैश्विक संदेश
कुल मिलाकर, गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि के रूप में यूरोपीय संघ के शीर्ष नेताओं का चयन भारत की दीर्घकालिक कूटनीतिक सोच को दर्शाता है। यह केवल एक औपचारिक आमंत्रण नहीं, बल्कि व्यापार, रणनीति और वैश्विक राजनीति में भारत की बढ़ती भूमिका का संकेत है। ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ और IMEC जैसे प्रोजेक्ट्स के साथ यह यात्रा भारत–यूरोप संबंधों में एक नए युग की शुरुआत मानी जा रही है।