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Home धर्म

होली—होलिका और भक्त प्रह्लाद की कहानी…आस्था की विजय की कथा

DigitalDesk by DigitalDesk
March 1, 2026
in धर्म, भोपाल, मध्य प्रदेश, मुख्य समाचार
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Holi The story of Holika and devotee Prahlad the story of the triumph of faith
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होली की अग्नि और राख

एक पवित्र परंपरा

भक्ति में शक्ति की जीत

सकारात्मक ऊर्जा का संचार

रंगों का पर्व होली केवल उल्लास और उमंग का प्रतीक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना और पवित्रता का भी संदेश देता है। ज्योतिष मठ संस्थान  के अनुसार होली की अग्नि और उससे प्राप्त भस्म राख का धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से अत्यंत गहरा महत्व है। यह पर्व हमें भक्ति, आस्था और सत्य की विजय का स्मरण कराता है।

होलिका दहन: भक्ति की विजय का प्रतीक

होलिका दहन की परंपरा भक्त प्रह्लाद और उनके पिता हिरण्यकश्यप की कथा से जुड़ी है। जब दुष्ट प्रवृत्ति ने भक्ति को समाप्त करने का प्रयास किया, तब ईश्वर की कृपा से भक्त की रक्षा हुई और अधर्म का अंत हुआ। होलिका दहन की अग्नि इसी विजय का प्रतीक है। इस अग्नि को ‘होलिका पंचाग्नि’ भी कहा जाता है। यह अग्नि केवल लकड़ियों को नहीं जलाती, बल्कि जीवन की नकारात्मकता, भय, क्रोध और ईर्ष्या को भी भस्म करने का संदेश देती है। भक्त प्रह्लाद द्वारा किए गए “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः” मंत्र जाप की सकारात्मक ऊर्जा अग्नि में सुरक्षित रही, जबकि दुष्टता की प्रतीक होलिका जलकर नष्ट हो गई। यह घटना बताती है कि सच्ची आस्था कभी नष्ट नहीं होती।

होली की भस्म: शुद्धिकरण और ऊर्जा का स्रोत

होलिका दहन के बाद प्राप्त राख को भस्म कहा जाता है। शास्त्रों में इसे पवित्र और शुभ माना गया है। परंपरा है कि पहले इस भस्म को देवताओं को अर्पित किया जाता है, फिर माता-पिता और परिवार के सदस्यों को तिलक के रूप में लगाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार यह भस्म शरीर और मन दोनों के लिए लाभकारी मानी जाती है। मान्यता है कि इसे लगाने से त्वचा संबंधी समस्याएं कम होती हैं, मानसिक शांति बढ़ती है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। घर के चारों ओर इस भस्म को लगाने से वातावरण शुद्ध होता है और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है।

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पवित्र अग्नि का आध्यात्मिक महत्व

होलिका की अग्नि को नव ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। इसे ‘पहली अग्नि’ भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस पवित्र अग्नि को घर लाकर पूजन करने से घर में सुख-समृद्धि आती है। इसी अग्नि से रसोई की अग्नि प्रज्वलित करने और भोग-प्रसाद बनाने की परंपरा भी है। इस अग्नि से बना भोजन प्रसाद कुलदेवता, ग्राम देवता और स्थान देवता को अर्पित किया जाता है। यह अग्नि केवल बाहरी प्रकाश ही नहीं देती, बल्कि हमारे भीतर की जठराग्नि को भी संतुलित करने का प्रतीक है। आध्यात्मिक रूप से यह ऊर्जा का शुद्ध स्रोत मानी जाती है, जो जीवन में सकारात्मकता भरती है।

इस वर्ष कब चढ़ाएं होली की राख और गुलाल?

ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस वर्ष 3 मार्च को प्रातः 9 बजे से ग्रहण और सूतक काल प्रारंभ रहेगा। शास्त्रों  के अनुसार ग्रहण काल में देवताओं को कष्ट माना जाता है, इसलिए इस समय धुरेली, रंग-अभिषेक या चल समारोह करना शुभ नहीं माना गया है। इसी कारण 3 मार्च को धुरेली और रंगोत्सव स्थगित रखने की सलाह दी गई है। शास्त्रसम्मत परंपरा के अनुसार 4 मार्च को होलिका उत्सव, चल समारोह और भस्म-गुलाल अर्पण का कार्यक्रम करना अधिक शुभ रहेगा। होली की भस्म, गुलाल और रंग पहले कुलदेवता, मंदिर के देवता, ग्राम देवता और वास्तु देवता को अर्पित किए जाते हैं। सूतक और ग्रहण काल में अर्पण करना वर्जित माना गया है, इसलिए अगले दिन से उत्सव आरंभ करना ही धर्मसम्मत माना गया है।

धुरेली की शुरुआत कैसे करें?

परंपरा के अनुसार होली खेलने की शुरुआत होलिका की भस्म से की जाती है। सबसे पहले भस्म का तिलक लगाकर आशीर्वाद लिया जाता है। इसके बाद गुलाल और विभिन्न रंगों से होली खेली जाती है। यह क्रम जीवन में संयम, सम्मान और मर्यादा का प्रतीक है।

आध्यात्मिक संदेश

होली की अग्नि हमें सिखाती है कि जीवन की बुराइयों को त्यागकर सत्य और भक्ति का मार्ग अपनाएं। राख हमें याद दिलाती है कि अहंकार और नकारात्मकता का अंत निश्चित है। यह पर्व केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और नवचेतना का पर्व है।

Tags: #Holi tradition#triumph power #devotion transmission positive energyHoli Holika and devotee Prahlad
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