धार की भोजशाला का इतिहास
क्यों हर साल बसंत पंचमी पर बढ़ जाता है विवाद
एक ऐतिहासिक स्थल, दो धार्मिक दावे
मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला एक ऐसा ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल है, जो हर साल बसंत पंचमी के मौके पर चर्चा और विवाद का केंद्र बन जाता है। कभी परमार राजा भोज द्वारा स्थापित सरस्वती मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र मानी जाने वाली भोजशाला को मुस्लिम पक्ष ‘कमाल मौलाना मस्जिद’ के रूप में देखता है। इसी दोहरे दावे के कारण हर साल बसंत पंचमी के आसपास यहां धार्मिक, प्रशासनिक और कानूनी हलचल तेज हो जाती है।
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भोजशाला का प्राचीन इतिहास
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राजा भोज से जुड़ा भोजशाला का इतिहास
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सरस्वती मंदिर या मस्जिद..?
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खिलजी काल में परिवर्तन
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ASI के अधीन भोजशाला
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मंगलवार पूजा, शुक्रवार नमाज़
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बसंत पंचमी पर टकराव
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सुप्रीम कोर्ट में याचिका
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पुरातत्व बनाम धार्मिक दावा
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हर साल बढ़ता विवाद
परमार राजा भोज से जुड़ा इतिहास
इतिहासकारों के अनुसार, 11वीं सदी में परमार वंश के प्रतापी शासक राजा भोज (1000–1055 ई.) ने धार को शिक्षा और संस्कृति का बड़ा केंद्र बनाया था। उन्होंने यहां एक विशाल संस्कृत महाविद्यालय और मां सरस्वती का मंदिर स्थापित कराया, जिसे भोजशाला कहा गया। यह स्थल उस दौर में विद्या, दर्शन और साहित्य का प्रमुख केंद्र था, जहां दूर-दूर से विद्यार्थी अध्ययन के लिए आते थे।
खिलजी काल में बदली संरचना
14वीं सदी में मालवा पर अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के बाद भोजशाला की संरचना में बड़ा परिवर्तन हुआ। हिंदू पक्ष का दावा है कि इसी काल में सरस्वती मंदिर को आंशिक रूप से ध्वस्त कर उसे ‘कमाल मौलाना मस्जिद’ में बदल दिया गया। परिसर में आज भी कई स्तंभ, शिलालेख और वास्तुशिल्प के अवशेष मौजूद हैं, जिन्हें मंदिर काल से जोड़ा जाता है।
इतिहासकार यह भी मानते हैं कि भोजशाला में स्थापित मां सरस्वती की मूर्ति को उस समय हटा लिया गया था, जो अब लंदन के एक संग्रहालय में होने का दावा किया जाता है।
ASI के संरक्षण में भोजशाला
1909 में ब्रिटिश काल के दौरान भोजशाला को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया। इसके बाद से यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीन है। ASI यहां के अवशेषों, शिलालेखों और ढांचे की देखरेख करता है। हालांकि, धार्मिक गतिविधियों को लेकर समय-समय पर प्रशासन को विशेष व्यवस्था करनी पड़ती है।
पूजा और नमाज़ की मौजूदा व्यवस्था
2003 में ASI और प्रशासन की ओर से एक आदेश जारी किया गया, जिसके तहत भोजशाला परिसर में मंगलवार को हिंदू पक्ष को पूजा की अनुमति दी गई, जबकि शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष को नमाज़ पढ़ने की इजाजत दी गई। बाकी दिनों में यह स्थल आम पर्यटकों के लिए खुला रहता है। यह व्यवस्था पिछले दो दशकों से लागू है, लेकिन दोनों ही पक्ष इसे अस्थायी और अपने-अपने अधिकारों के खिलाफ मानते हैं।
बसंत पंचमी पर क्यों बढ़ता है विवाद
बसंत पंचमी को मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है। हिंदू पक्ष का कहना है कि भोजशाला मूल रूप से सरस्वती मंदिर है, इसलिए इस दिन यहां पूर्ण और निर्बाध पूजा होनी चाहिए। उनका तर्क है कि मंगलवार की सीमित पूजा पर्याप्त नहीं है और बसंत पंचमी जैसे विशेष पर्व पर पूरे दिन पूजा का अधिकार मिलना चाहिए। दूसरी ओर, मुस्लिम पक्ष इसे ऐतिहासिक रूप से कमाल मौलाना मस्जिद मानता है और कहता है कि यहां नमाज़ पढ़ने का उनका अधिकार छीना नहीं जाना चाहिए। इसी टकराव के चलते हर साल बसंत पंचमी से पहले तनाव की स्थिति बन जाती है।
2026 में फिर सुप्रीम कोर्ट तक मामला
बसंत पंचमी 23 जनवरी 2026 को पड़ रही है। इसे लेकर हिंदू पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है, जिसमें उस दिन नमाज़ पर रोक लगाने और केवल सरस्वती पूजा की अनुमति देने की मांग की गई है। साथ ही, भोजशाला परिसर की वास्तविक प्रकृति स्पष्ट करने के लिए ASI सर्वेक्षण की रिपोर्ट को आधार बनाने की मांग भी की गई है। प्रशासन की ओर से कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए जाने की तैयारी है।
पुरातात्विक साक्ष्य बनाम धार्मिक आस्था
भोजशाला विवाद सिर्फ आस्था का नहीं, बल्कि इतिहास और पुरातत्व से भी जुड़ा है। हिंदू पक्ष शिलालेखों, स्तंभों और वास्तुकला को मंदिर के प्रमाण के रूप में पेश करता है, जबकि मुस्लिम पक्ष ऐतिहासिक दस्तावेजों और लंबे समय से नमाज़ अदा किए जाने की परंपरा को आधार मानता है।
हर साल उभरता, फिर थमता विवाद
भोजशाला विवाद की खास बात यह है कि यह पूरे साल शांत रहता है, लेकिन बसंत पंचमी के आते ही फिर सुर्खियों में आ जाता है। अदालतों में सुनवाई, प्रशासनिक बैठकें और सुरक्षा इंतजाम इसी समय तेज हो जाते हैं। संक्षेप में, भोजशाला एक ऐसा ऐतिहासिक स्थल है, जहां धर्म, इतिहास और कानून आपस में टकराते हैं। जब तक इसकी प्रकृति पर अंतिम न्यायिक फैसला नहीं आता, तब तक हर बसंत पंचमी पर यह विवाद यूं ही उभरता रहेगा।