विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे और मध्यम शहरों में शहरीकरण तेजी से हुआ है, लेकिन नियोजन उतना मजबूत नहीं रहा। कंक्रीट का बढ़ता दायरा, घटते हरित क्षेत्र और अनियोजित निर्माण ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव को बढ़ाते हैं। इसका मतलब है कि शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से कई डिग्री ज्यादा हो जाता है। बड़े महानगरों में कुछ हद तक हरित नीति, मेट्रो नेटवर्क और नियोजित ढांचा मौजूद है, लेकिन उभरते शहरों में यह संतुलन नहीं दिखता। यही कारण है कि वे तापमान वृद्धि के प्रति अधिक संवेदनशील हैं।
जोखिम में 76% आबादी
अध्ययन के मुताबिक भारत की लगभग 76 प्रतिशत आबादी अत्यधिक गर्मी के उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में रह रही है। गर्मी की लहरें अब केवल मई-जून तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि फरवरी-मार्च में ही संकेत देने लगी हैं। इससे कृषि, श्रम उत्पादकता, जल संसाधन और स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। बुजुर्ग, बच्चे और बाहर काम करने वाले मजदूर सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और हृदय संबंधी समस्याओं के मामले बढ़ने की आशंका रहती है।
जलवायु परिवर्तन का साफ संकेत
वैश्विक तापमान में लगातार हो रही वृद्धि के कारण मौसम चक्र असंतुलित हो रहा है। सर्दियों की अवधि घट रही है और गर्मी का मौसम लंबा होता जा रहा है। 2 डिग्री की वैश्विक वृद्धि का अर्थ केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि चरम मौसमी घटनाओं में तेजी है—अधिक हीटवेव, कम वर्षा और सूखे की आशंका।
विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाए जाएं, जल संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए और ‘कूल रूफ’ जैसी तकनीकों को अपनाया जाए। स्थानीय निकायों को हीट एक्शन प्लान तैयार कर समय रहते चेतावनी प्रणाली मजबूत करनी होगी। फरवरी की यह असामान्य गर्मी एक संकेत है—समय रहते कदम उठाने का। यदि अभी से शहरी नियोजन और पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले वर्षों में छोटे शहर भी भीषण गर्मी के स्थायी केंद्र बन सकते हैं। तपिश का यह ट्रेंड केवल मौसम का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन की दस्तक है—जिसे नजरअंदाज करना अब संभव नहीं।