सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज…बिहार में SIR कराने के चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती

Hearing in the Supreme Court today on the challenge to the Election Commission's decision to conduct SIR in Bihar

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज…बिहार में SIR कराने के चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती

बिहार में मतदाता सूची से जुड़े बड़े मामले पर सोमवार, 8 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होने जा रही है। चुनाव आयोग द्वारा कराए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर कई याचिकाकर्ताओं ने आपत्ति जताई है। इस मामले में जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस ज्योमल्या बागची की बेंच सुनवाई करेगी।

बिहार में SIR की पृष्ठभूमि

बिहार में इस बार 2003 के बाद पहली बार स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) कराया जा रहा है। इसकी प्रक्रिया 24 जून से शुरू हुई थी और अंतिम मतदाता सूची 30 सितंबर तक जारी की जानी है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना, मृतक, स्थानांतरित और अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाना तथा नए पात्र मतदाताओं को शामिल करना है। चुनाव आयोग का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी ढंग से हो रही है। हालांकि, कई संगठनों और राजनीतिक दलों ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

मनोज झा, महुआ मोइत्रा योगेन्द्र यादव ने दी चुनौती?

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), राज्यसभा सांसद मनोज झा, महुआ मोइत्रा और योगेंद्र यादव ने SIR के खिलाफ याचिकाएं दायर की हैं। इन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इतनी बड़ी प्रक्रिया को चुनाव से पहले कराना संदेह पैदा करता है।उनका आरोप है कि आयोग द्वारा मतदाता सूची की समीक्षा जल्दबाजी में की जा रही है और इससे मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

पिछली सुनवाइयों में क्या हुआ?

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले इस मामले की कई बार सुनवाई की है।14 अगस्त की सुनवाई में अदालत ने कहा था कि चुनाव आयोग 65 लाख गायब नामों की सूची वेबसाइट पर प्रकाशित करे। साथ ही कोर्ट ने सुझाव दिया कि आधार, वोटर आईडी और राशन कार्ड जैसे दस्तावेजों को पहचान प्रमाण के तौर पर स्वीकार किया जाए। 22 अगस्त की सुनवाई में अदालत ने राजनीतिक दलों को निर्देश दिया कि वे बूथ-लेवल एजेंट्स के माध्यम से मतदाताओं की मदद करें। इसी दौरान अगली सुनवाई 8 सितंबर तय की गई थी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने कभी SIR को अवैध नहीं ठहराया, लेकिन इसकी टाइमिंग और प्रक्रिया पर सवाल जरूर उठाए हैं।

मतदाता सूची में भारी बदलाव

बिहार में SIR के प्रारंभ होने से पहले यानी 24 जून 2025 तक मतदाताओं की संख्या करीब 7.89 करोड़ थी, जो रिवीजन के बाद घट गई। अब मतदाताओं की संख्या 7.24 करोड़ ही रह गई है। यानी करीब 65 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं। चुनाव आयोग के मुताबिक, इनमें मृतक, विस्थापित और विदेश में रहने वाले मतदाता शामिल हैं। आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के अनुसार की गई है और इसमें किसी प्रकार की धांधली नहीं हुई है।

राजनीतिक दलों की चिंता

राजनीतिक दलों का आरोप है कि इस प्रक्रिया में कई वास्तविक मतदाताओं के नाम भी सूची से हटाए गए हैं। विपक्षी दलों ने कहा है कि यह मताधिकार पर चोट है और इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित होगी। याचिकाकर्ताओं ने यह भी दलील दी कि बिहार जैसे बड़े राज्य में इतनी भारी संख्या में नाम हटाना आम जनता के लिए असुविधा पैदा करेगा।

चुनाव आयोग का रुख

चुनाव आयोग का कहना है कि SIR कराना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। आयोग के मुताबिक, मतदाता सूची को समय-समय पर साफ-सुथरा करना आवश्यक है ताकि चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी हो सकें। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी भरोसा दिलाया है कि 1 सितंबर के बाद भी दावे और आपत्तियां स्वीकार की जाएंगी, जिससे कोई भी पात्र मतदाता सूची से बाहर न रह जाए।

क्या है SIR?

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) एक विशेष अभियान है जिसमें मतदाता सूची की गहन समीक्षा की जाती है। इसमें मृत मतदाताओं के नाम हटाना, स्थानांतरित लोगों का रिकॉर्ड अपडेट करना, अयोग्य मतदाताओं को हटाना, और नए पात्र मतदाताओं को शामिल करना होता है। आम तौर पर यह प्रक्रिया हर कुछ सालों में होती है, लेकिन बिहार में 2003 के बाद पहली बार यह विशेष अभियान चलाया जा रहा है।

सुनवाई से उम्मीदें

अब 8 सितंबर को होने वाली सुनवाई बेहद अहम होगी। अदालत यह तय कर सकती है कि क्या चुनाव आयोग की मौजूदा प्रक्रिया सही दिशा में है या इसमें बदलाव की जरूरत है। सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं क्योंकि इसके फैसले से बिहार की आगामी चुनावी प्रक्रिया और लाखों मतदाताओं का भविष्य सीधे प्रभावित होगा। बिहार में मतदाता सूची से जुड़े इस मामले ने न केवल राजनीतिक हलकों में बल्कि आम जनता के बीच भी हलचल पैदा कर दी है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद यह साफ हो जाएगा कि मतदाता सूची का यह रिवीजन कानूनी कसौटी पर कितना खरा उतरता है और मतदाताओं की चिंताओं का समाधान कैसे किया जाएगा। प्रकाश कुमार पांडेय

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