भोजन के बाद अब पानी भी बंद…इच्छामृत्यु प्रक्रिया में हरीश राणा की हालत पर हर पल नजर, परिवार के लिए सबसे कठिन परीक्षा
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में भर्ती गाजियाबाद के 31 वर्षीय हरीश राणा की जिंदगी अब एक बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद उनके लिए ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ (Passive Euthanasia) की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इस प्रक्रिया के तहत अब उन्हें न केवल भोजन बल्कि पानी देना भी बंद किया जा रहा है।
13 साल पुराना हादसा, अब अंतिम पड़ाव
गाजियाबाद निवासी हरीश राणा 2013 में हुए एक गंभीर हादसे के बाद से अचेत अवस्था में थे। उनका शरीर जीवित था, लेकिन मस्तिष्क ने काम करना लगभग बंद कर दिया था। वर्षों तक परिवार ने उम्मीद नहीं छोड़ी, लेकिन हालात जस के तस बने रहे। अब सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद, उनके जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले सभी मेडिकल सपोर्ट सिस्टम धीरे-धीरे हटाए जा रहे हैं।
अस्पताल ने शुरू किया अंतिम मेडिकल प्रोटोकॉल
दिल्ली के AIIMS में डॉक्टरों की एक विशेष टीम इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी कर रही है। पहले हरीश को ट्यूब के माध्यम से भोजन दिया जा रहा था, जिसे कुछ दिन पहले बंद कर दिया गया। अब अगला कदम पानी की आपूर्ति रोकना है। डॉक्टरों के अनुसार, ट्यूब को हटाया नहीं जाएगा, बल्कि उसे कैप कर दिया जाएगा। साथ ही, मरीज को किसी प्रकार का ऑक्सीजन सपोर्ट भी नहीं दिया जा रहा है।
3 से 4 हफ्तों में पूरी होगी प्रक्रिया
विशेषज्ञों का कहना है कि ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ एक धीमी और नियंत्रित प्रक्रिया होती है, जिसमें 2 से 4 सप्ताह तक का समय लग सकता है। इस दौरान मरीज को दर्द या असहजता से बचाने के लिए पेलिएटिव केयर (palliative care) दी जाती है। इसमें दवाओं और बेहोशी के जरिए यह सुनिश्चित किया जाता है कि मरीज को किसी प्रकार की पीड़ा न हो।
क्या होती है निष्क्रिय इच्छामृत्यु?
‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ यानी Passive Euthanasia का मतलब होता है मरीज को जीवित रखने वाले कृत्रिम साधनों को हटाना। इसमें—
- कृत्रिम भोजन और पानी बंद किया जाता है
- ऑक्सीजन और दवाओं का सपोर्ट हटाया जाता है
- मरीज को दर्द से राहत देने के लिए सिडेशन दिया जाता है
इस प्रक्रिया का उद्देश्य मृत्यु को तेज करना नहीं, बल्कि प्राकृतिक रूप से होने देना होता है।
मेडिकल टीम की कड़ी निगरानी
एम्स में इस मामले के लिए एक मल्टी-डिसिप्लिनरी टीम बनाई गई है, जिसमें न्यूरोसर्जरी, एनेस्थीसिया, पैलिएटिव मेडिसिन और मनोचिकित्सा विभाग के विशेषज्ञ शामिल हैं। डॉक्टरों का कहना है कि हर कदम बेहद सावधानी और संवेदनशीलता के साथ उठाया जा रहा है, ताकि मरीज की गरिमा बनी रहे और उसे कोई कष्ट न हो।
परिवार के लिए सबसे मुश्किल फैसला
हरीश राणा के माता-पिता और परिवार के लिए यह समय बेहद भावुक और कठिन है। 13 साल तक बेटे के ठीक होने की उम्मीद में जीने के बाद अब उसे विदा करने का फैसला लेना आसान नहीं है। परिवार के एक सदस्य ने बताया कि उन्होंने हर संभव इलाज कराया, लेकिन जब डॉक्टरों ने साफ कह दिया कि सुधार की कोई संभावना नहीं है, तब यह कठिन निर्णय लेना पड़ा।
समाज और कानून के लिए मिसाल
यह मामला सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि भारत में इच्छामृत्यु को लेकर कानूनी और सामाजिक बहस का भी अहम हिस्सा बन गया है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही ‘लिविंग विल’ और निष्क्रिय इच्छामृत्यु को कुछ शर्तों के साथ अनुमति दे चुका है। हरीश राणा का मामला इस प्रक्रिया के वास्तविक क्रियान्वयन का एक प्रमुख उदाहरण बनकर सामने आया है।
हरीश राणा की जिंदगी अब अंतिम पड़ाव पर है, जहां चिकित्सा, कानून और भावनाओं का जटिल संगम दिखाई दे रहा है। भोजन के बाद अब पानी भी बंद किया जाना इस प्रक्रिया का सबसे संवेदनशील चरण माना जा रहा है। जहां एक ओर डॉक्टर यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि मरीज को कोई पीड़ा न हो, वहीं परिवार अपने सबसे कठिन निर्णय के साथ खड़ा है। यह घटना न केवल चिकित्सा विज्ञान बल्कि मानवीय संवेदनाओं की भी गहरी परीक्षा बन गई है।





