राजनीति पुंश्चली है, तो समय क्रूर, तटस्थ और ठंडे छुरे की धार सा निर्मम: वाजपेयी जी लेकिन तमाम झंझावातों में रहे अटल

उनके जन्मदिवस पर नमन

वह 1998 की गर्मियां थीं। उस दिन संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण भी पहली बार टीआरपी के सारे रिकॉर्ड तोड़ रहा था। अटलजी जवाब दे रहे थे, अपनी 13 महीनों की सरकार बचाने के लिए।
आखिरी वाक्य निकला…’अध्यक्ष महोदय, मैं अपना इस्तीफा राष्ट्रपति महोदय को सौंपने जा रहा हूं।’
वह अदा, वह त्वरा, वह झटका, वह ‘हीरोपना’ और वह अंदाज़…और किसी नेता का नहीं दिखा। उसी दिन इस लेखक जैसे तमाम युवा ‘अटलजी’ के फैन हो गए। उसी दिन पहली बार ‘अटलजी’ को ध्यान से सुना था, उसके पहले तो केवल उनकी वक्तृता और राजनीति के किस्से सुने थे।
अटल की वह संवाद अदायगी
1999 के चुनाव में अटलजी आए, दरभंगा। बोले, अटल को कीर्तिवान बनाइए। उसी वक्त यह लेखक घर आया था और अपने छोटे भाई को बोला कि जाओ अटलजी को आमने-सामने सुनो। वह थोड़ा टालमटोल करने लगा तो इस लेखक ने कहा कि जितनी देर पढ़ने का नाटक करोगे, उतनी देर अगर इनका भाषण सुन लोगे तो कई चीजें जान लोगे। हिंदी भाषा का चमत्कार तो देखोगे ही। आज तक छोटा भाई कुढ़कर कहता है- अजीब घर है मेरा। नेता के लिए डांट-मार होती है।
अटल जी कमल-पत्र की तरह रहे, निर्विवाद
1996 में अजीब कुंठा, निराशा और खीझ में आकर जनता ने अटलजी को कुंजी सौंपी थी, सत्ता की। 99 से 04 तक अटलजी का ही शासन था। शानदार काम हुए, सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर, टेलीकॉम के क्षेत्र में लेकिन दाग भी लगे। ताबूत कांड से लेकर कंधार कांड तक अटलजी के बेदाग दामन को दागदार बना गए, पर मज़ा देखिए कि आज भी कवि-हृदय प्रधानमंत्री को कोई गाली नहीं देता, बुरा नहीं कहता। शाइनिंग इंडिया का फील गुड भी अटलजी को संसद न पहुंचा सका।
….आज अटलजी हमारे बीच नहीं हैं। वह भाजपा को इस विराट जीत के साथ न देख सके। वह राम-मंदिर को भी पूर्ण न देख सके, लेकिन जहाँ भी होंगे, मुस्कुराते होंगे कि आखिर चर्चा के लिए धरती को समतल करने का आह्वान तो उन्होंने ही किया था।
अटल जी को जन्मदिवस पर लाइव इंडिया परिवार की ओर से नमन।
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