खाड़ी देशों में जंग: तेल बाज़ार में उछाल… तेल की कीमतों में 8–10% तक बढ़ोतरी
रविवार से दिखा असर
रविवार को जैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाजार खुले, तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज हुआ। ईरान पर अमेरिका और इज़राइल के हमलों तथा जवाबी कार्रवाई में खाड़ी क्षेत्र के आसपास सैन्य ठिकानों को निशाना बनाए जाने से ग्लोबल सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ा। ट्रेडर्स ने संभावित आपूर्ति बाधा को पहले ही कीमतों में शामिल करना शुरू कर दिया। ऊर्जा विश्लेषकों का कहना है कि यदि क्षेत्र में संघर्ष और फैलता है तो बीमा प्रीमियम, शिपिंग लागत और जोखिम भत्ता (रिस्क प्रीमियम) और बढ़ेंगे, जिससे खुदरा ईंधन कीमतों पर सीधा असर पड़ेगा।
होर्मुज़: दुनिया का सबसे अहम चोकपॉइंट
दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। रिसर्च फर्म Rystad Energy के अनुसार, हर दिन करीब 15 मिलियन बैरल कच्चा तेल इस संकरे समुद्री मार्ग से भेजा जाता है। यह मार्ग उत्तर में ईरान और दक्षिण में ओमान-यूएई से घिरा है, और यहीं से सऊदी अरब, कुवैत, इराक, कतर, बहरीन और यूएई का बड़ा निर्यात दुनिया तक पहुंचता है।
हाल में फारस की खाड़ी के मुहाने के पास दो जहाजों पर हमलों की खबरों ने जोखिम को और बढ़ा दिया है। यदि टैंकर आवाजाही बाधित होती है तो निर्यात क्षमता पर गंभीर असर पड़ सकता है। अमेरिका में बेंचमार्क माने जाने वाले West Texas Intermediate WTI की कीमत रविवार रात लगभग 72 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई, जो शुक्रवार के लगभग 67 डॉलर के स्तर से करीब 8 प्रतिशत अधिक है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि सप्लाई पर वास्तविक असर पड़ा तो कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। कीमतों में यह उछाल केवल भू-राजनीतिक तनाव का नतीजा नहीं है, बल्कि बाजार की मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया भी है—जहां अनिश्चितता खुद एक कीमत बन जाती है।
OPEC+ की बढ़ोतरी योजना
संघर्ष शुरू होने से पहले ही OPEC और उसके सहयोगी देशों (अक्सर OPEC+ कहा जाता है) ने उत्पादन बढ़ाने की योजना की घोषणा की थी। आठ देशों—सऊदी अरब, रूस, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कज़ाकिस्तान, अल्जीरिया और ओमान—ने अप्रैल से रोज़ाना 2,06,000 बैरल अतिरिक्त उत्पादन का संकेत दिया। यह वृद्धि बाजार की उम्मीद से अधिक मानी गई।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यदि होर्मुज़ मार्ग बाधित होता है तो अतिरिक्त उत्पादन से केवल सीमित और अस्थायी राहत मिल सकती है, क्योंकि समस्या उत्पादन की नहीं, परिवहन की होगी।
ईरान और चीन फैक्टर
ईरान प्रतिदिन लगभग 1.6 मिलियन बैरल तेल निर्यात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा चीन को जाता है। यदि प्रतिबंधों, हमलों या समुद्री मार्ग की रुकावट के कारण ईरानी निर्यात घटता है, तो चीन को वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता तलाशने पड़ेंगे। इससे एशियाई बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और स्पॉट कार्गो की कीमतें चढ़ सकती हैं। चीन की अतिरिक्त मांग वैश्विक कीमतों को और ऊपर धकेल सकती है, खासकर तब जब अन्य उत्पादक देशों की अतिरिक्त क्षमता सीमित हो।
शेयर बाजार पर असर
ऊर्जा कीमतों में उछाल का असर शेयर बाजारों में भी दिखने लगा है। एयरलाइंस, शिपिंग और केमिकल कंपनियों के शेयर दबाव में आ सकते हैं, जबकि तेल-गैस उत्पादक कंपनियों को अल्पकालिक लाभ मिल सकता है। निवेशक अब इस बात पर नजर रखे हुए हैं कि क्या संघर्ष सीमित रहेगा या क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले लेगा। यदि हालात बिगड़ते हैं तो महंगाई का दबाव बढ़ सकता है, जिससे केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक नीति पर भी असर पड़ेगा।
फिलहाल बाजार “वेट एंड वॉच” मोड में है। यदि होर्मुज़ जलडमरूमध्य खुला रहता है और टैंकर आवाजाही सामान्य रहती है, तो कीमतें स्थिर हो सकती हैं। लेकिन किसी बड़े हमले, बंदरगाहों की नाकेबंदी या व्यापक प्रतिबंधों की स्थिति में तेल 80 डॉलर प्रति बैरल या उससे ऊपर भी जा सकता है। ऊर्जा विशेषज्ञों का निष्कर्ष स्पष्ट है—खाड़ी क्षेत्र में शांति वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य है। दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की नब्ज इसी क्षेत्र से गुजरती है, और यहां की हर हलचल सीधे पेट्रोल-डीजल की कीमतों से लेकर वैश्विक महंगाई तक असर डालती है। ऐसे में आने वाले दिनों में कूटनीतिक प्रयासों, सैन्य गतिविधियों और शिपिंग ट्रैफिक के आंकड़ों पर बाजार की पैनी नजर रहेगी। जब तक तनाव कम नहीं होता, तेल बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना बनी रहेगी।