त्योहारी खरीदारी और शादी-विवाह के मौसम से पहले सोने की कीमतों को लेकर बाजार में नई चर्चा शुरू हो गई है। साल 2026 की शुरुआत में सोने ने जबरदस्त तेजी दिखाई थी और कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई थीं। इसके बाद जनवरी के आखिरी दिनों में आई भारी गिरावट ने निवेशकों को चौंका दिया। अब जिन लोगों ने ऊंचे भाव पर सोने में पैसा लगाया था, वे दोबारा तेजी आने की उम्मीद कर रहे हैं। हालांकि, फिलहाल कीमतों में वैसी उछाल नजर नहीं आ रही है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक आर्थिक हालात, सरकारी कर्ज और केंद्रीय बैंकों की खरीदारी जैसे कारक आने वाले समय में सोने की कीमतों को फिर ऊपर ले जा सकते हैं। कुछ जानकार अगले 12 से 24 महीनों में सोने के नए रिकॉर्ड बनाने की संभावना भी जता रहे हैं, लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं है।
केंद्रीय बैंकों की लगातार खरीदारी से सोने को मिल रहा है लंबी अवधि का सहारा
दुनिया के कई केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। चीन और भारत जैसे देशों की खरीदारी को भी इस रुझान के संदर्भ में देखा जा रहा है। सोने को लंबे समय तक मूल्य बनाए रखने वाली संपत्ति माना जाता है, इसलिए आर्थिक अनिश्चितता के दौरान इसकी मांग बढ़ सकती है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि सितंबर में केंद्रीय बैंकों की खरीदारी पिछले कई महीनों के ऊंचे स्तर पर रही। अगर यह मांग आगे भी मजबूत बनी रहती है, तो कीमतों को समर्थन मिल सकता है। हालांकि, खरीदारी में बदलाव आने पर बाजार की दिशा भी बदल सकती है।
अमेरिका पर बढ़ते कर्ज और डॉलर को लेकर चिंताएं सोने की मांग बढ़ा सकती हैं
अमेरिका के बढ़ते सरकारी कर्ज और वैश्विक मुद्रास्फीति को लेकर चिंताएं निवेशकों के फैसलों को प्रभावित कर रही हैं। कुछ देश अंतरराष्ट्रीय लेन-देन में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के विकल्प भी तलाश रहे हैं। ऐसे माहौल में सोना निवेश के विविध विकल्पों में अहम माना जाता है। युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक अनिश्चितता बढ़ने पर निवेशक अक्सर सुरक्षित माने जाने वाले साधनों की ओर रुख करते हैं। इससे सोने की मांग बढ़ सकती है, लेकिन केवल इन कारणों से कीमतों में तेजी तय नहीं होती। वैश्विक मांग, डॉलर की मजबूती और बाजार में निवेशकों की गतिविधियां भी सोने के भाव को प्रभावित करती हैं।
ब्याज दरों में कटौती की संभावना और शेयर बाजार की अस्थिरता पर रहेगी नजर
अमेरिकी फेडरल रिजर्व सहित प्रमुख केंद्रीय बैंकों की भविष्य की ब्याज दर नीति भी सोने के लिए महत्वपूर्ण है। यदि ब्याज दरें घटती हैं, तो ब्याज देने वाले निवेश विकल्पों का आकर्षण कम हो सकता है और सोने की मांग को मदद मिल सकती है। दूसरी ओर, टेक कंपनियों के शेयरों और वैश्विक बाजारों में उतार-चढ़ाव के समय कुछ निवेशक गोल्ड ETF या भौतिक सोने की ओर पैसा लगाते हैं। हालांकि, ब्याज दरें ऊंची रहने या डॉलर मजबूत होने की स्थिति में सोने पर दबाव भी बन सकता है। इसलिए निवेशकों के लिए इन संकेतों पर नजर रखना जरूरी है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना 4,000 डॉलर के आसपास, भारत में भाव ₹1.48 लाख बताए गए
दी गई जानकारी के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना अपने बताए गए रिकॉर्ड स्तर 5,500 से 5,600 डॉलर प्रति औंस से गिरकर करीब 4,000 से 4,185 डॉलर प्रति औंस के दायरे में आ गया है। भारतीय बाजार में जनवरी 2026 के दौरान सोने का भाव करीब ₹1.90 लाख प्रति 10 ग्राम तक पहुंचने का दावा किया गया है, जबकि मौजूदा कीमत लगभग ₹1.48 लाख बताई गई है। ये आंकड़े बाजार और समय के अनुसार बदल सकते हैं, इसलिए खरीदारी से पहले ताजा भाव की पुष्टि करना जरूरी है।
क्या अगले दो साल में सोना फिर ₹1.90 लाख का स्तर पार कर सकता है?
लंबी अवधि में सोने की कीमतों को लेकर कुछ फंड मैनेजर और उद्योग विशेषज्ञ सकारात्मक नजरिया रखते हैं। उनके अनुमान के मुताबिक, अगले 12 से 24 महीनों में सोना दोबारा रिकॉर्ड स्तर की ओर बढ़ सकता है। केंद्रीय बैंकों की खरीदारी, अमेरिका का कर्ज, डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिशें और वैश्विक तनाव इसके संभावित कारण हैं। फिर भी, सोने का ₹1.90 लाख प्रति 10 ग्राम से ऊपर जाना निश्चित नहीं है। निवेश करने से पहले ताजा बाजार भाव, खरीदारी का उद्देश्य और जोखिम सहने की क्षमता को ध्यान में रखना चाहिए।





