शादी-ब्याह का मौसम हो, दिवाली-धनतेरस जैसे त्योहार हों या फिर भविष्य के लिए निवेश की योजना, भारतीय परिवारों के लिए सोना हमेशा से पहली पसंद रहा है। सोने को सिर्फ एक धातु नहीं बल्कि सुरक्षा, समृद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। लेकिन हाल के वर्षों में सोने की कीमतों में जिस तेजी से उछाल आया है, उसने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। स्थिति यह है कि भारत में मिलने वाला सोना दुबई, सिंगापुर और अमेरिका जैसे देशों की तुलना में काफी महंगा बिक रहा है।
- पांच महीने में सोने ने बनाया नया रिकॉर्ड
- टैक्स और ड्यूटी बढ़ा रहे कीमतों का बोझ
- रुपये की कमजोरी ने बढ़ाई चमक की कीमत
- आम खरीदार की जेब पर बढ़ा दबाव
- निवेशकों के लिए अब भी सुनहरा मौका
विशेषज्ञों के अनुसार भारतीय बाजार में सोना अंतरराष्ट्रीय कीमतों की तुलना में करीब 18 प्रतिशत अधिक कीमत पर उपलब्ध है। इसका मतलब यह है कि यदि कोई व्यक्ति एक लाख रुपये मूल्य का सोना खरीदता है, तो उसे लगभग 18 हजार रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़ सकते हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर भारत में सोना इतना महंगा क्यों है और इसके पीछे कौन से आर्थिक कारण काम कर रहे हैं।
पांच महीने में सोने ने बनाया नया रिकॉर्ड
साल 2026 की शुरुआत से ही सोने की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है। जनवरी के शुरुआती दिनों में 24 कैरेट सोना लगभग 1.32 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर था। इसके बाद कुछ ही महीनों में इसकी कीमतों में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई और मई तक यह 1.56 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया।
दिलचस्प बात यह है कि इसी अवधि में अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आया। वैश्विक स्तर पर सोना केवल मामूली प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ कारोबार करता रहा, लेकिन भारत में इसकी कीमतों में लगभग 18 प्रतिशत तक का उछाल दर्ज किया गया। इससे साफ है कि केवल अंतरराष्ट्रीय कीमतें ही भारतीय बाजार में सोने के महंगे होने की वजह नहीं हैं।
टैक्स और ड्यूटी बढ़ा रहे कीमतों का बोझ
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश सोना विदेशों से आयात करता है। अनुमान है कि देश में खपत होने वाले 80 से 90 प्रतिशत सोने की आपूर्ति आयात के जरिए होती है। यही कारण है कि सरकार द्वारा लगाए जाने वाले कर और शुल्क सीधे सोने की कीमतों को प्रभावित करते हैं।
जब सोना विदेश से भारत आता है, तो उस पर आयात शुल्क लगाया जाता है। इसके अलावा एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट सेस भी वसूला जाता है। इसके बाद 3 प्रतिशत जीएसटी लगाया जाता है। जब सोना ज्वेलर्स तक पहुंचता है, तब उसमें मेकिंग चार्ज और अन्य लागतें भी जुड़ जाती हैं।
इन सभी करों और शुल्कों का असर अंतिम कीमत पर पड़ता है और ग्राहक को सोना काफी महंगा मिलता है। दूसरी ओर दुबई और सिंगापुर जैसे देशों में सोने पर टैक्स का बोझ बहुत कम है या कई मामलों में नहीं के बराबर है। इसी वजह से वहां सोना भारतीय बाजार की तुलना में सस्ता दिखाई देता है।
रुपये की कमजोरी ने बढ़ाई चमक की कीमत
सोने की बढ़ती कीमतों के पीछे दूसरा बड़ा कारण भारतीय मुद्रा का कमजोर होना है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का कारोबार अमेरिकी डॉलर में होता है। इसलिए जब भी डॉलर मजबूत होता है और रुपया कमजोर पड़ता है, तब भारत को सोना खरीदने के लिए अधिक रुपये खर्च करने पड़ते हैं।
मान लीजिए कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत स्थिर बनी हुई है, तब भी यदि डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हो जाए तो आयातकों की लागत बढ़ जाती है। यही अतिरिक्त लागत भारतीय बाजार में उपभोक्ताओं तक पहुंचती है और सोना महंगा हो जाता है। पिछले कुछ वर्षों में रुपये पर लगातार दबाव बना हुआ है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में मामूली बदलाव होने के बावजूद भारत में सोना लगातार महंगा होता गया।
आम खरीदार की जेब पर बढ़ा दबाव
सोने की बढ़ती कीमतों का सबसे ज्यादा असर मध्यम वर्ग और उन परिवारों पर पड़ रहा है जो शादी या पारिवारिक जरूरतों के लिए आभूषण खरीदते हैं। पहले जहां एक निश्चित बजट में अधिक मात्रा में सोना खरीदा जा सकता था, वहीं अब उसी रकम में कम वजन का आभूषण मिल रहा है। इसके अलावा ज्वेलर्स द्वारा लिए जाने वाले मेकिंग चार्ज भी कुल लागत को काफी बढ़ा देते हैं। कई मामलों में यह चार्ज 10 से 25 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। ऐसे में विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि जरूरत के अनुसार ही खरीदारी की जाए। हल्के डिजाइन, कम वजन वाले आभूषण या कम कैरेट की ज्वेलरी चुनकर खर्च कम किया जा सकता है। पुराने सोने को एक्सचेंज कर नया आभूषण खरीदना भी एक व्यावहारिक विकल्प माना जाता है।
निवेशकों के लिए अब भी सुनहरा मौका
जहां आम खरीदार बढ़ती कीमतों से परेशान हैं, वहीं निवेशकों के लिए सोना अब भी आकर्षक विकल्प बना हुआ है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनाव और वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव के दौर में सोने को सुरक्षित निवेश माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि लंबी अवधि में सोना निवेशकों को अच्छा रिटर्न देने की क्षमता रखता है। हालांकि निवेश के लिए भौतिक सोना खरीदने की बजाय आधुनिक विकल्पों पर विचार करना अधिक लाभदायक हो सकता है। गोल्ड ईटीएफ, डिजिटल गोल्ड और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड जैसे विकल्प निवेशकों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। इनमें मेकिंग चार्ज की समस्या नहीं होती और सुरक्षा का जोखिम भी कम रहता है। खासकर सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड में निवेशकों को सोने की कीमत बढ़ने का लाभ मिलने के साथ-साथ ब्याज का अतिरिक्त फायदा भी मिलता है।
भारत में सोने की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में अधिक होने के पीछे दो प्रमुख कारण हैं—उच्च आयात शुल्क और डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी। इन दोनों कारकों के चलते भारतीय उपभोक्ताओं को सोना खरीदने के लिए अतिरिक्त कीमत चुकानी पड़ती है। हालांकि बढ़ती कीमतों के बावजूद सोना भारतीय परिवारों की पहली पसंद बना हुआ है। ऐसे में समझदारी इसी में है कि खरीदारी और निवेश दोनों ही सोच-समझकर किए जाएं, ताकि सोने की चमक आपकी बचत और भविष्य दोनों को मजबूत बना सके।





