समस्तीपुर से बेगूसराय तक… बिहार में पीएम मोदी ने मिथिलांचल से क्यों शुरू किया कैंपेन? समझ लीजिए 36% वाला गणित
पटना। बिहार में विधानसभा चुनाव की गरमाहट माहौल में घुलने लगी है। सभी सियासी पार्टियों ने अपने-अपने समीकरण साधने शुरु कर दिए हैं। इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनडीए के चुनाव अभियान की शुरुआत पटना या मगध की बजाय मिथिलांचल के दिल—समस्तीपुर—से की, जो राजनीतिक रूप से एक बड़ा संकेत माना जा रहा है। मिथिलांचल से शुरुआत करना सिर्फ एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक गहरी रणनीति का हिस्सा है जिसमें जातीय समीकरण, सामाजिक प्रतीक और सांस्कृतिक पहचान—तीनों का समावेश है।
- मिथिलांचल से मोदी ने बिगुल फूंका
- कर्पूरी ठाकुर की विरासत पर दांव
- EBC वोट बैंक साधने की रणनीति
- समस्तीपुर से शुरू हुआ मिशन बिहार
- बेगूसराय में BJP की अग्निपरीक्षा
- 36 प्रतिशत वोटों पर नजर
- मिथिला की सांस्कृतिक पहचान पर फोकस
- महागठबंधन पर विकास का वार
- कर्पूरी का गढ़ बना मोदी मंच
- बिहार जीतने का नया फार्मूला
- कर्पूरी ठाकुर की विरासत को साधने की कोशिश
प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी पहली सभा में पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर को याद किया, जिन्हें अति पिछड़ी जातियों (EBC) का बड़ा नेता माना जाता है। उन्होंने कहा कि “कर्पूरी ठाकुर ने अपना जीवन गरीबों और पिछड़ों के उत्थान के लिए समर्पित किया। उनके आदर्श आज भी हमारा मार्गदर्शन करते हैं। समस्तीपुर कर्पूरी ठाकुर का जन्मस्थान है और वहां से प्रचार की शुरुआत कर मोदी ने सीधा संदेश दिया है कि एनडीए इस बार EBC वोट बैंक को अपने पक्ष में संगठित करने की तैयारी में है।
मिथिलांचल क्यों है खास?
बिहार का राजनीतिक नक्शा पांच हिस्सों में बंटा है—तिरहुत, मिथिलांचल, कोसी-सीमांचल, मगध और भोजपुर। इनमें मिथिलांचल का स्थान सबसे अहम माना जाता है। इस क्षेत्र में मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, सुपौल और सहरसा जैसे जिले आते हैं। यहां कुल 80 विधानसभा सीटें यहां हैं। इसतरह बिहार की कुल 243 सीटों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा मिथिलांचल में है। मिथिलांचल में जातीय समीकरण बेहद विविध हैं—यहां मैथिल ब्राह्मण, यादव, दलित और मुस्लिम समुदाय का प्रभाव है। 2020 के चुनाव में एनडीए को यहां से बड़ा लाभ मिला था और 2024 के लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी-जदयू गठबंधन ने सातों सीटें जीतकर इस क्षेत्र में अपनी पकड़ दिखाई थी।
समस्तीपुर से शुरुआत क्यों?
समस्तीपुर को पीएम मोदी के अभियान की शुरुआत के लिए चुनना कई मायनों में प्रतीकात्मक भी है और रणनीतिक भी। यह न सिर्फ कर्पूरी ठाकुर की कर्मभूमि है, बल्कि EBC समुदाय का गढ़ भी है। राज्य के जातीय सर्वेक्षण के अनुसार, EBC यानी आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग, बिहार की 36% आबादी का प्रतिनिधित्व करता है।
इनके भीतर करीब 112 उप-जातियां हैं, जो जातीय रूप से बिखरी हुई हैं, लेकिन कर्पूरी ठाकुर की पहचान इन्हें जोड़ने का आधार रही है। ऐसे में पीएम मोदी का संदेश साफ है—वे खुद को कर्पूरी ठाकुर की वैचारिक धारा का उत्तराधिकारी दिखाना चाहते हैं, ताकि EBC वोट बैंक को एनडीए के पाले में मजबूती से लाया जा सके।
बेगूसराय में रणनीतिक पड़ाव
समस्तीपुर के बाद पीएम मोदी ने दूसरा पड़ाव बेगूसराय में रखा—जिसे कभी ‘बिहार का लेनिनग्राद’ कहा जाता था। यह क्षेत्र लंबे समय तक वामपंथी राजनीति का केंद्र रहा, लेकिन हाल के वर्षों में यहां बीजेपी का प्रभाव बढ़ा है। बेगूसराय में मोदी ने विकास, औद्योगिक निवेश और रोजगार के मुद्दों को उठाकर यह संदेश देने की कोशिश की कि एनडीए अब जाति से आगे बढ़कर ‘विकास आधारित सामाजिक गठबंधन’ बनाना चाहता है।
सांस्कृतिक पहचान और विकास का नया नैरेटिव
बीजेपी ने मिथिलांचल की सांस्कृतिक विरासत को अपने राजनीतिक अभियान का अहम हिस्सा बनाया है। पार्टी जानती है कि मिथिला केवल वोट बैंक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। हाल के वर्षों में केंद्र सरकार ने इस क्षेत्र से जुड़ी कई परियोजनाओं पर जोर दिया है। सीतामढ़ी में माता जानकी मंदिर का विकास, दरभंगा में एम्स की स्थापना, दरभंगा हवाई अड्डे का सिविल एन्क्लेव और मखाना बोर्ड का गठन जैसी योजनाएं बीजेपी को विकास की राजनीति का चेहरा बनाने में मदद कर रही हैं। इन प्रोजेक्ट्स को अब चुनावी प्रचार में ‘विकास बनाम वादा’ की तुलना के रूप में पेश किया जा रहा है।
बीजेपी का 36% वाला फॉर्मूला
2023 के बिहार जातीय सर्वेक्षण के अनुसार
EBC समुदाय – 36%,
OBC समुदाय – 27%,
बिहार में कुल मिलाकर 63% आबादी पिछड़े वर्ग की है। एनडीए इसी आंकड़े को ‘36% फॉर्मूला’ कहकर अपना चुनावी गणित तैयार कर रही है। बीजेपी और एनडीए का मकसद है—EBC वर्ग के साथ अति पिछड़ों और गैर-यादव ओबीसी समुदायों को एकजुट करके सामाजिक गठबंधन बनाना। दूसरी ओर, महागठबंधन यादव-मुस्लिम (MY) वोट बैंक पर भरोसा कर रहा है।
महागठबंधन की चुनौती
महागठबंधन (राजद, कांग्रेस और वाम दलों) ने भी उत्तर बिहार को अपनी ‘वोटर अधिकार यात्रा’ का केंद्र बनाया है। तेजस्वी यादव बेरोजगारी, पलायन और किसान मुद्दों को उठाकर भाजपा और नीतीश सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। महागठबंधन का उद्देश्य है कि जातीय एकजुटता के साथ युवाओं में असंतोष को भी अपने पक्ष में किया जाए।
क्या टिकेगा बीजेपी का नया प्लान?
प्रधानमंत्री मोदी का मिथिलांचल से अभियान शुरू करना केवल एक राजनीतिक शुरुआत नहीं, बल्कि चुनावी दिशा तय करने का संकेत है। कर्पूरी ठाकुर की विरासत का सम्मान, विकास परियोजनाओं की उपलब्धियां और 36% EBC वोट बैंक को साधने की रणनीति—इन तीन स्तंभों पर एनडीए का पूरा चुनावी नैरेटिव खड़ा है। अब सवाल यह है कि क्या यह विकास और प्रतिनिधित्व का मॉडल महागठबंधन के पारंपरिक MY समीकरण (मुस्लिम-यादव) के सामने टिक पाएगा? फिलहाल इतना तय है कि बिहार की सत्ता की चाबी मिथिलांचल से होकर गुजरती है, और उस रास्ते का पहला पड़ाव—समस्तीपुर से बेगूसराय तक—अब नरेंद्र मोदी के एजेंडे में है। राजनीति के जानकारों की मानें तो मोदी का ‘मिथिलांचल अभियान’ यह संकेत दे रहा है कि बिहार जीतने की शुरुआत अब भावनाओं नहीं, बल्कि गणित से होगी—और वह गणित 36% EBC मतदाताओं से होकर गुजरता है। (प्रकाश कुमार पांडेय)





