ममता बनर्जी से मायावती तक आइये जानते किस महिला नेता ने किस राजनीतिक शख्सियत को अपना भाई बनाकर राखी बांधीकर रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया है। दरअसल यह त्यौहार केवल एक पारंपरिक त्योहार नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति में रिश्तों की मिठास और सामाजिक एकजुटता का भी प्रतीक है। राजनीति जैसी औपचारिक दुनिया में भी जब इस त्योहार की मिठास घुलती है, तो दृश्य कुछ और ही खास हो जाता है। भारत में कई प्रमुख महिला नेत्रियों ने अपने सहयोगी नेताओं को राखी बांधकर इस पर्व को विशेष बना दिया है। आइए जानते हैं कि देश की जानी-मानी महिला नेताओं के ‘राजनीतिक भाई’ कौन हैं और इस रिश्ते के पीछे की कहानी क्या है।
रक्षाबंधन 2025… राजनीति में भी दिखा भाई-बहन का पवित्र रिश्ता
आनंदीबेन पटेल और नरेंद्र मोदी: गुजरात की परंपरा में बंधा राखी का बंधन
गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लंबे समय से राखी बांधती आ रही हैं। यह रिश्ता तब से चला आ रहा है जब नरेंद्र मोदी भाजपा के संगठन में सक्रिय कार्यकर्ता थे और आनंदीबेन गुजरात में शिक्षिका थीं। समय के साथ दोनों की राजनीतिक यात्रा बढ़ी लेकिन उनके भाई-बहन के रिश्ते में कभी बदलाव नहीं आया। हर साल रक्षाबंधन पर आनंदीबेन मोदी को राखी भेजती हैं या व्यक्तिगत रूप से मिलकर बांधती हैं। यह रिश्ता राजनीतिक से अधिक भावनात्मक और पारिवारिक नजर आता है।
मायावती और लालजी टंडन..मतभेदों के बावजूद बना भाई-बहन का रिश्ता
बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती और बीजेपी के वरिष्ठ नेता रहे लालजी टंडन के बीच भी एक भावनात्मक रिश्ता था। मायावती उन्हें लंबे समय तक राखी बांधती रहीं। हालांकि राजनीतिक मंच पर कई बार उनके मतभेद सामने आए, लेकिन व्यक्तिगत रिश्ते में उन्होंने इस पर कभी असर नहीं पड़ने दिया। लालजी टंडन के निधन के बाद मायावती ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए इस रिश्ते को सार्वजनिक रूप से याद किया। इसके अलावा, 2018 में मायावती ने हरियाणा के नेता अभय चौटाला को भी राखी बांधी और उन्हें ‘राजनीतिक भाई’ का दर्जा दिया।
ममता बनर्जी और अमिताभ बच्चन… सिनेमा और राजनीति का संगम
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 2023 में रक्षाबंधन के अवसर पर बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन को राखी बांधकर सबको चौंका दिया था। ममता बनर्जी, जो आमतौर पर सादगी और राजनीतिक सख्ती के लिए जानी जाती हैं, उन्होंने मुंबई जाकर अमिताभ बच्चन को राखी बांधी थी। इस मुलाकात ने सिर्फ एक पारिवारिक रिश्ता ही नहीं बल्कि राजनीतिक-सांस्कृतिक मेलजोल की भी एक नई मिसाल पेश की।
सुषमा स्वराज और वेंकैया नायडू… राजनीतिक आदर्शवाद का संबंध
स्वर्गीय सुषमा स्वराज भारतीय राजनीति में महिला नेतृत्व का एक मजबूत चेहरा थीं। उनके जीवन में वेंकैया नायडू का स्थान एक बड़े भाई जैसा था। वह उन्हें हर साल राखी बांधती थीं और दोनों के बीच बेहद आत्मीय रिश्ता था। उनके राजनीतिक करियर में एक-दूसरे के प्रति समर्थन और भरोसा अक्सर देखा गया। यह रिश्ता राजनीति से ऊपर उठकर एक पारिवारिक भावना में तब्दील हो गया था।
साध्वी निरंजन ज्योति और मुख्तार अब्बास नकवी: पार्टी लाइन से परे मानवीय रिश्ता
बीजेपी की फायरब्रांड नेता साध्वी निरंजन ज्योति हर साल अपने सहयोगी मुख्तार अब्बास नकवी को राखी बांधती हैं। यह रिश्ता दोनों नेताओं के बीच आपसी विश्वास और पारस्परिक सम्मान का प्रतीक है। दोनों ही नेता अक्सर सामाजिक मुद्दों पर मिलकर काम करते हैं और रक्षाबंधन के समय उनके बीच यह रिश्ता और मजबूत होता है।
राजनीतिक राखी….सामाजिक सौहार्द्र का प्रतीक
राजनीतिक गलियारों में रक्षाबंधन का यह त्योहार एक सकारात्मक संदेश भी देता है। यह दर्शाता है कि जब रिश्तों की बात आती है, तो राजनीतिक मतभेद भी पीछे रह जाते हैं। भाई-बहन के इस पर्व ने महिला नेताओं को एक ऐसा मंच दिया है जहां वे अपने सहयोगियों के साथ निजी और भावनात्मक संबंध स्थापित कर सकें।
सिर्फ भाई-बहन का रिश्ता ही नहीं, बल्कि यह त्योहार भारतीय राजनीति में सौहार्द्र, सहयोग और पारिवारिक मूल्यों की झलक भी प्रस्तुत करता है।
क्या है इस चलन का राजनीतिक असर
हालांकि इन राखियों को व्यक्तिगत भावना के रूप में देखा जाना चाहिए, लेकिन कई बार इसे राजनीतिक समीकरणों के संदर्भ में भी समझा जाता है। किसी खास नेता को राखी बांधने से यह संकेत भी मिलते हैं कि दोनों नेताओं के बीच विश्वास और समर्थन है, जो किसी भविष्य की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है। लेकिन अधिकतर मामलों में यह रिश्ता व्यक्तिगत और पारिवारिक ही रहा है।
रिश्तों की राजनीति नहीं, राजनीति में रिश्तों की मिसाल
रक्षाबंधन जैसे त्योहारों का महत्व भारतीय राजनीति में भी नजर आता है, और यह साबित करता है कि राजनीति केवल सत्ता की लड़ाई नहीं है, बल्कि इसमें मानवीय रिश्तों की भी खास भूमिका है। चाहे वो ममता बनर्जी हों मायावती हों या आनंदीबेन पटेल जैसी महिला नेत्रियों ने इस बात को साबित कर दिया है कि राजनीति में भी रिश्तों को उतनी ही महत्वता दी जाती है, जितनी सामाजिक क्षेत्र में। रिश्ते उतने ही सच्चे और स्थायी हो सकते हैं… जितने आम जिंदगी में।..( प्रकाश कुमार पांडेय)