नई दिल्ली। जनगणना 2027 को लेकर केंद्र सरकार ने जनसंख्या गणना चरण में पूछे जाने वाले 40 सवाल अधिसूचित कर दिए हैं। इन सवालों में सामान्य जनसांख्यिकीय जानकारी के साथ जाति, अनुसूचित जाति-जनजाति की स्थिति और कोविड-19 टीकाकरण से जुड़ी जानकारी भी शामिल की गई है। यही वजह है कि जनगणना 2027 इस बार महज लोगों की संख्या गिनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश की सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी तस्वीर तैयार करने वाली एक बड़ी कवायद के तौर पर देखी जा रही है।
जनगणना सिर्फ आबादी गिनने का आंकड़ा नहीं
सामाजिक और स्वास्थ्य प्रोफाइल तैयार करने की बड़ी कवायद
सबसे ज्यादा चर्चा उस सवाल को लेकर है जिसमें लोगों से कोविड-19 का टीका कहां लगवाया था, इसकी जानकारी मांगी जाएगी। सवाल उठना स्वाभाविक है कि महामारी के कई साल गुजरने के बाद अब जनगणना में वैक्सीनेशन की जानकारी क्यों दर्ज की जा रही है? इसका जवाब जनगणना के व्यापक डेटा-संग्रह के उद्देश्य और भविष्य की नीतिगत योजना से जुड़ा हुआ है।
कोविड वैक्सीनेशन की जानकारी क्यों महत्वपूर्ण?
कोविड-19 महामारी ने भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था, टीकाकरण अभियान और आपदा प्रबंधन की क्षमताओं की बड़ी परीक्षा ली थी। ऐसे में जनगणना के दौरान टीकाकरण से जुड़ी जानकारी दर्ज होने से देश में यह समझने में मदद मिल सकती है कि अलग-अलग आबादी समूहों तक कोविड टीकाकरण की पहुंच कैसी रही।
यह जानकारी भविष्य में स्वास्थ्य नीतियों और आपदा प्रबंधन की रणनीति तैयार करने के लिए उपयोगी हो सकती है। मसलन, अलग-अलग क्षेत्रों और सामाजिक समूहों में टीकाकरण की पहुंच को समझने से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि बड़े स्वास्थ्य अभियानों के दौरान किन इलाकों या समुदायों तक सरकारी सेवाएं अपेक्षाकृत आसानी से पहुंचीं और कहां अतिरिक्त प्रयास की जरूरत पड़ी।
हालांकि, सिर्फ जनगणना के सवाल में कोविड वैक्सीनेशन की जानकारी शामिल किए जाने से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि सरकार किसी व्यक्ति को लाभ से वंचित करने या उसकी व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर वर्गीकृत करने जा रही है। इसके वास्तविक उपयोग और डेटा प्रबंधन की स्पष्ट तस्वीर इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार इन आंकड़ों को किस तरह संकलित, सुरक्षित और नीतिगत रूप से इस्तेमाल करती है।
जातिगत आंकड़ों से बदल सकता है सामाजिक डेटा का आधार
जनगणना 2027 की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक व्यापक स्तर पर जातिगत आंकड़ों का संग्रह है। लोगों से पूछा जाएगा कि वे अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित हैं या नहीं और उनकी जाति क्या है।
जाति आधारित डेटा लंबे समय से देश की राजनीति और सामाजिक नीति में महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। अलग-अलग समुदायों की वास्तविक आबादी, सामाजिक स्थिति और सरकारी योजनाओं तक उनकी पहुंच से जुड़े आंकड़े उपलब्ध होने पर भविष्य की नीतियों को अधिक लक्षित बनाने में मदद मिल सकती है।
यही वजह है कि जनगणना 2027 के आंकड़े आने वाले वर्षों में आरक्षण, कल्याणकारी योजनाओं, सामाजिक प्रतिनिधित्व और संसाधनों के वितरण से जुड़े विमर्श को प्रभावित कर सकते हैं।
2021 की जनगणना नहीं हो सकी, इसलिए बढ़ी अहमियत
जनगणना 2027 इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2021 की जनगणना कोविड-19 महामारी के कारण नहीं हो सकी थी। ऐसे में देश के पास लंबे समय से नई व्यापक जनसंख्या संबंधी जानकारी का अभाव है।
2027 की जनगणना इस अंतर को भरने का काम करेगी। आबादी की संख्या, सामाजिक संरचना, आवास, परिवारों की स्थिति और अन्य जनसांख्यिकीय जानकारी के नए आंकड़े सरकार को वर्तमान भारत की तस्वीर समझने में मदद करेंगे।
यह आजादी के बाद आठवीं और देश की 16वीं जनगणना होगी। खास बात यह है कि इस बार प्रक्रिया डिजिटल तरीके से कराई जा रही है।
पहली बार डिजिटल जनगणना का बड़ा प्रयोग
जनगणना 2027 को देश की पहली डिजिटल जनगणना के रूप में भी देखा जा रहा है। मोबाइल के माध्यम से आंकड़े जुटाने और लोगों को स्वयं अपनी जानकारी दर्ज करने की सुविधा देने की व्यवस्था की गई है।
डिजिटल व्यवस्था से डेटा संग्रह और उसके प्रसंस्करण की प्रक्रिया पहले के मुकाबले अधिक तेज हो सकती है। लेकिन इसके साथ डेटा सुरक्षा और निजता का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है। जब जाति और स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी एक ही डेटा संग्रह प्रक्रिया में दर्ज होगी, तब नागरिकों के डेटा की सुरक्षा और उसके सीमित एवं उचित इस्तेमाल को लेकर पारदर्शिता बेहद जरूरी होगी।
पहाड़ी और बर्फीले इलाकों में पहले शुरू होगी गणना
जनगणना का कार्यक्रम भी अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बर्फीले एवं गैर-समान क्षेत्रों में 1 से 30 सितंबर तक जनसंख्या गणना होगी। इससे पहले 17 से 31 अगस्त तक लोगों को ऑनलाइन स्वयं जानकारी दर्ज करने की सुविधा दी जाएगी।
देश के बाकी हिस्सों में जनसंख्या गणना फरवरी 2027 में होगी। पूरी प्रक्रिया दो चरणों में होगी। पहले चरण में मकानों और आवास से संबंधित जानकारी जुटाई जाएगी, जबकि दूसरे चरण में प्रत्येक व्यक्ति की जनसांख्यिकीय और सामाजिक-आर्थिक जानकारी दर्ज की जाएगी।
40 सवालों के पीछे भविष्य की नीतियों का डेटा
जनगणना के 40 सवालों को केवल सरकारी फॉर्म की तरह देखना इस पूरी प्रक्रिया को सीमित नजरिए से देखना होगा। इन सवालों से तैयार होने वाला डेटा आने वाले वर्षों में स्कूल, अस्पताल, आवास, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और कल्याणकारी योजनाओं की योजना बनाने में इस्तेमाल हो सकता है।
जाति की जानकारी सामाजिक संरचना समझने में मदद करेगी, जबकि कोविड टीकाकरण का विवरण महामारी के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच का एक महत्वपूर्ण रिकॉर्ड बन सकता है।
यानी जनगणना 2027 का असली महत्व सिर्फ यह पता लगाना नहीं है कि देश में कितने लोग रहते हैं, बल्कि यह समझना भी है कि वे किस सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय स्थिति में रह रहे हैं और सरकारी नीतियां उन तक कितनी पहुंच पा रही हैं।
सबसे बड़ा सवाल—डेटा का इस्तेमाल कैसे होगा?
जनगणना के दौरान जुटाई जाने वाली विस्तृत जानकारी के साथ सबसे अहम मुद्दा डेटा की सुरक्षा और उपयोग का रहेगा। नागरिकों से जाति और टीकाकरण जैसी संवेदनशील जानकारी ली जा रही है, इसलिए सरकार के सामने भरोसा बनाए रखने की बड़ी जिम्मेदारी होगी।
कुल मिलाकर, जनगणना 2027 भारत की बदलती सामाजिक तस्वीर को दर्ज करने का बड़ा अवसर है। कोविड वैक्सीनेशन का सवाल बीती महामारी का हिसाब भर नहीं, बल्कि भविष्य की स्वास्थ्य नीतियों के लिए डेटा तैयार करने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। वहीं जातिगत आंकड़े देश की सामाजिक संरचना और नीतिगत बहस को नया आधार दे सकते हैं। अब असली परीक्षा इस बात की होगी कि इन आंकड़ों को कितनी पारदर्शिता, सुरक्षा और जिम्मेदारी के साथ भविष्य के भारत की नीतियां बनाने में इस्तेमाल किया जाता है।