हिमाचल और कर्नाटक में जब आमने-सामने की लड़ाई में कांग्रेस ने बीजेपी को शिकस्त दी थी तब भी उसने अपने इरादे स्पष्ट कर दिए थे कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में उसे कम करके नहीं आकां जा सकता। खासकर हिन्दी भाषी राज्य मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में अब चर्चा है कि आखिर यह कर्नाटक का फार्मूला किसे सत्ता के सिंहासन तक पहुंचायेगा। पीएम नरेंद्र मोदी पिछड़े वर्ग का कार्ड खेलते रहे हैं लेकिन कांग्रेस ने टिकट बांटे तो उसे ओबीसी के सबसे अधिक प्रत्याशी उतारे। इतना ही नहीं अपनी सरकार बनने पर 27 प्रतिशत ओबीसी को आरक्षण देने और जाति की जनगणना करने का भी दांव चला है। जो कम महत्वपूर्ण नहीं है। यही वजह है कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी के साथ सोनिया गांधी से लेकर सभी बड़े नेता इन दिनों जातिगत जनगणना और पिछड़ा वर्ग को उसका अधिकार दिलाने की जोरशोर से बात कर रहे हैं। कांग्रेस का यह मुद्दा बीजेपी की राह में कितने कांटे बिछायेगा यह तो आने वाली तीन दिसम्बर की शाम को ही साफ हो सकेगा।
- कमलनाथ और अखिलेश के बीच बढ़ता सियासी विवाद
- 2024 के चुनाव तक कहीं छोटा न हो जाए इंडिया गठबंधन का आकार
- नाराजगी बढ़ी तो इंडिया गठबंधन को झटका लगना तय
- यूपी की 80 सीटों के बंटवारे पर मचेगा घमासान
- कांग्रेस सपा के बीच समझौता अब नहीं आसान
- एमपी में कांग्रेस और सपा नेताओं के बीच खिंची तलवारें
पांच राज्यों के ये विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन की पहली परीक्षा के तौर पर देखे जा रहे हैं। लेकिन गठबंधन पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि लोकसभा चुनाव के लिए बनाया गया है। ऐसे में मध्यप्रदेश में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं के बीच तलवारें खिंच गईं। अब चर्चा यह भी होने लगी है कि 2024 के चुनाव तक कहीं इंडिया गठबंधन का आकार ही छोटा न हो जाए। क्योंकि सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव कमलनाथ की टिप्पणी के बाद अधिक उत्तेजित नजर आ रहे हैं। लोकसभा चुनाव तक यह तल्खी और नाराजगी बढ़ गयी तो फिर इंडिया गठबंधन को झटका लग सकता है। क्योंकि चुनावी राज्यों में गठबंधन के कई घटक दल आपस में भी एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और सपा के बीच आपसी सहमति न बन पाने के चलते यह अटकलबाजी हो रही है कि आगे जाकर कहीं इसका असर लोकसभा चुनाव में यूपी की 80 सीटों के बंटवारे पर तो नहीं पड़ेगा। क्योंकि अखिलेश इसका इशारा कर चुके हैं। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के रुख से यह स्पष्ट है कि वे 2024 के लिए कांग्रेस के साथ समझौते की मेज पर बैठेंगे तो उसी जनाधार को फार्मूला बनाया जायेगा जिसके आधार पर मध्यप्रदेश में उनके दल को कांग्रेस की ओर से तवज्जो नहीं दी गई।
नमो के भरोसे भाजपा,कांग्रेस ने खेला ट्रम्प कार्ड
कांग्रेस अपने क्षेत्रीय नेताओं के चेहरे को आगे बढ़ाते हुए चुनावी रणभूमि में उतरी है। इसमें उसे सफलता भी मिली है। जबकि बीजेपी का फार्मूला हर जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे और कमल निशान को आगे बढ़ाने का रहा। चुनावी बिसात बिछाते हुए बीजेपी का फार्मूला राज्यों में कुछ अपवाद को छोड़कर सफल नहीं हो रहा है। जबकि राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी को अच्छी-खासी मान्यता मिली हुई है। कहा जाता है कि जिन राज्यों में मुख्यमंत्री होते हैं वह चुनावी समर में पार्टी का चेहरा बन जाते हैं लेकिन एमपी में अब ऐसा नहीं हो रहा है। शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री होते हुए भी बीजेपी अभी यह नहीं कह रही है कि शिवराज ही उसका चेहरा होंगे। वहीं बीजेपी दूसरी ओर शिवराज सरकार की उपलब्धियों और कमलनाथ सरकार की असफलताओं के नाम पर वोट मांगती नजर आ रही है। इतना ही नहीं उसने सनातन के मुद्दे को चुनावी समर में उछाल दिया है। जिससे अधिक से अधिक बहुसख्यक वर्ग के मतदाताओं को अपनी ओर किया जा सके उनका समर्थन हासिल कर सके। बीजेपी की ओर से इस बार विधानसभा चुनाव में 5 सांसद और 3 केंद्रीय मंत्रियों नरेंद्र सिंह तोमर, प्रहलाद पटेल, फग्गन सिंह कुलस्ते और राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय जैसे दिग्गजों को चुनावी मैदान में उतार दिया है।
दिग्गजों के मैदान में उतरने से बढ़ी सत्ता की लड़ाई
बीजेपी यदि सत्ता में आती है तो यह विकल्प खुला रखा गया है कि मुख्यमंत्री इनमें से भी कोई हो सकता है। क्योंकि जो बड़े दिग्गज चुनावी समर में उतरे हैं वे केवल विधायक या मंत्री बनने के लिए चुनाव में नहीं उतारे हैं बल्कि हर इलाके में यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि उस इलाके में यदि पार्टी को अपेक्षा से अधिक सफलता मिलती है तो फिर सत्ताशीर्ष यानी सीएम की कुर्सी पर उनके इलाके का नेता भी बैठ सकता है। कांग्रेस की बात करें तो प्रदेश में नेतृत्व के सवाल पर कोई दो-राय नहीं है। सभी नेता कमलनाथ के नाम को स्वीकार कर चुके हैं। सरकार बनने पर कमलनाथ ही मुख्यमंत्री होंगे। हालांकि अबतक जो खींचतान दिखाई दी वह अपने-अपने समर्थकों को ज्यादा से ज्यादा टिकट दिलाने के लिए थी। टिकट वितरण के बाद कांग्रेस में भी असंतोष और विद्रोह के स्वर 20 से अधिक क्षेत्रों में सुनाई दे रहे हैं। जो दावेदार अधिक आवेश में थे उन्होंने पार्टी भी छोड़ दी। इतना ही नहीं चुनाव में दूसरे दलों के बैनर तले अपनी किस्मत आजमाने का मन बना लिया।। बसपा, आम आदमी पार्टी और सपा में वो नेता गए जिन्होंने भाजपा और कांग्रेस से विद्रोह किया। अभी भी इन दलों की निगाहें ऐसे में नेताओं पर है। ताकि उन्हें अपना उम्मीदवार बनाकर सत्ता की चाबी अपनी मुट्ठी में कैद कर सकें।





