सावधान! सार्वजनिक स्थानों पर कबूतरों को दाना डालना पड़ सकता है भारी, कर्नाटक में जेल तक की चेतावनी
नई दिल्ली/बेंगलुरु। कर्नाटक सरकार सार्वजनिक स्थानों पर कबूतरों को दाना डालने की परंपरा को लेकर सख्त कदम उठाने की तैयारी में है। राज्य के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग ने चेतावनी दी है कि यदि बिना नियंत्रण के कबूतरों को दाना डालने की प्रवृत्ति जारी रही, तो यह न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनेगी, बल्कि लोगों को कानूनी कार्रवाई और यहां तक कि जेल की सजा का भी सामना करना पड़ सकता है। सरकार का कहना है कि शहरी इलाकों में कबूतरों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हो रही है, जिसका सीधा संबंध श्वसन रोगों और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ रहा है। खास तौर पर कबूतरों की बीट और पंखों से फैलने वाले बैक्टीरिया और फंगल संक्रमण को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से चिंता जता रहे हैं।
स्वास्थ्य विभाग की चेतावनी
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग द्वारा जारी एक आधिकारिक नोट में कहा गया है कि अनियंत्रित कबूतर भोजन व्यवस्था के कारण शहरी क्षेत्रों में पक्षियों की आबादी असंतुलित हो गई है। इसके चलते दमा, एलर्जी, फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां और अन्य श्वसन संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं। बुजुर्गों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों के लिए यह खतरा और भी गंभीर बताया गया है। विभाग के अनुसार, कबूतरों की बीट में मौजूद सूक्ष्म कण हवा में घुलकर सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर जाते हैं, जिससे लंबी अवधि में गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार अब इस परंपरा को नियंत्रित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
सख्त नियम लागू करने के निर्देश
स्वास्थ्य विभाग ने शहरी विकास विभाग को निर्देश दिए हैं कि वह ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी (GBA) और राज्य की सभी नगर निगमों को सख्त कदम उठाने के आदेश जारी करे। प्रस्तावित उपायों में उन स्थानों पर कबूतरों को दाना डालने पर पूर्ण प्रतिबंध शामिल है, जहां इससे सार्वजनिक असुविधा या स्वास्थ्य जोखिम पैदा होता है।
इसके अलावा सरकार ने यह भी सुझाव दिया है कि कबूतरों को दाना डालने के लिए केवल सीमित और चिन्हित क्षेत्र तय किए जाएं। इन क्षेत्रों का संचालन केवल मान्यता प्राप्त गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) या पंजीकृत धार्मिक एवं चैरिटेबल संस्थाओं द्वारा किया जाएगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पक्षियों को भोजन देने की गतिविधि नियंत्रित और वैज्ञानिक ढंग से हो।
समय सीमा और निगरानी की व्यवस्था
सरकार कबूतरों को दाना डालने के लिए समय-सीमा तय करने पर भी विचार कर रही है। अधिकारियों का मानना है कि पूरे दिन या किसी भी समय दाना डालने से बड़ी संख्या में कबूतर एकत्र हो जाते हैं, जिससे गंदगी और बीमारियों का खतरा बढ़ता है। इसलिए तय समय में सीमित मात्रा में ही दाना डालने की अनुमति दी जा सकती है। नगर निगमों को यह जिम्मेदारी दी जाएगी कि वे इन नियमों का सख्ती से पालन कराएं और नियमित निगरानी रखें।
जुर्माना और कानूनी कार्रवाई
सरकार ने साफ कर दिया है कि नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। इसमें मौके पर चेतावनी देना, जुर्माना लगाना और गंभीर मामलों में भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत मुकदमा दर्ज करना भी शामिल है। अधिकारियों के अनुसार, यदि किसी की लापरवाही से संक्रामक रोग फैलने की आशंका या पुष्टि होती है, तो उसे कानूनी रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि BNS, 2023, ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी अधिनियम, 2025 और कर्नाटक नगर निगम अधिनियम, 1976 के तहत स्थानीय निकायों को सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए पर्याप्त अधिकार पहले से ही प्राप्त हैं।
मुंबई से मिली सीख
कर्नाटक सरकार ने इस फैसले के पीछे मुंबई का उदाहरण भी दिया है। अधिकारियों ने बताया कि बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के बाद मुंबई में कबूतरों को दाना डालने के लिए बनाए गए कबूतरखानों को सील कर दिया गया था। यह कदम सार्वजनिक असुविधा और स्वास्थ्य जोखिम को देखते हुए उठाया गया था। इसके बाद वहां हवा की गुणवत्ता और आसपास रहने वाले लोगों की स्वास्थ्य स्थिति में सुधार देखा गया। कर्नाटक सरकार का मानना है कि इसी तरह के कदम उठाकर बेंगलुरु और अन्य शहरी क्षेत्रों में भी स्वास्थ्य जोखिम को कम किया जा सकता है।
पशु प्रेमियों में बहस की आशंका
हालांकि सरकार ने स्वीकार किया है कि यह फैसला पशु प्रेमियों और नियमित रूप से पक्षियों को दाना डालने वाले लोगों के बीच विवाद और बहस का विषय बन सकता है। कई लोग इसे करुणा और धार्मिक आस्था से जोड़कर देखते हैं। पशु कल्याण संगठनों का तर्क है कि पक्षियों को भोजन देना मानवीय संवेदना का प्रतीक है। सरकार का कहना है कि उसका उद्देश्य पक्षियों के खिलाफ कार्रवाई करना नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता की रक्षा करना है। इसलिए संतुलन बनाते हुए नियंत्रित और सुरक्षित व्यवस्था लागू करने पर जोर दिया जा रहा है।
स्वास्थ्य बनाम परंपरा
कर्नाटक में प्रस्तावित यह कदम एक बड़े सवाल को जन्म देता है—क्या सार्वजनिक स्वास्थ्य के हित में परंपराओं और धार्मिक भावनाओं पर अंकुश लगाया जाना चाहिए? सरकार का मानना है कि बदलते शहरी हालात में स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना जरूरी है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी बहस का रूप ले सकता है। फिलहाल इतना तय है कि यदि प्रस्तावित नियम लागू होते हैं, तो सार्वजनिक स्थानों पर कबूतरों को दाना डालने से पहले लोगों को सावधान रहना होगा, क्योंकि यह शौक अब जेल तक पहुंचा सकता है।





