बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण पर घमासान: “विदेशी वोटर” मुद्दे पर सियासी बयानबाज़ी तेज

Election Commission is running a special intensive revision campaign of voters in Bihar

बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण पर घमासान: “विदेशी वोटर” मुद्दे पर सियासी बयानबाज़ी तेज

बिहार में इन दिनों चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान को लेकर सियासी पारा चढ़ा हुआ है। इस अभ्यास के जरिए मतदाता सूची में अवैध या अपात्र मतदाताओं की पहचान और उनका नाम हटाने का काम किया जा रहा है। हालांकि, इस प्रक्रिया ने राजनीतिक दलों के बीच तीखी बयानबाज़ी को जन्म दे दिया है। जहां केंद्र सरकार के मंत्री और बीजेपी सांसद आयोग के कदम को संवैधानिक ठहरा रहे हैं, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित और लोकतंत्र विरोधी बता रहा है।

जीतन राम मांझी का समर्थन: “चुनाव आयोग गलत नहीं”

केंद्रीय मंत्री और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के प्रमुख जीतन राम मांझी ने चुनाव आयोग की कार्रवाई का समर्थन करते हुए कहा कि “वोटर लिस्ट में नाम जुड़ते और हटते रहते हैं, यह एक नियमित प्रक्रिया है। समय-समय पर इसमें विसंगतियों को ठीक करना चुनाव आयोग का दायित्व है।”

मांझी ने कहा कि उनकी सरकार पहले भी इस बात को लेकर चिंता जता चुकी है कि “बिहार में बाहर से आकर कुछ लोग सरकारी जमीनों पर कब्जा कर घर बना रहे हैं और स्थानीय गरीबों को परेशान कर रहे हैं।” उन्होंने आयोग की कार्रवाई को संवैधानिक प्रक्रिया बताते हुए कहा कि इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

राजीव प्रताप रूडी का सवाल: “क्या विदेशी वोटर ही हैं विपक्ष का आधार?”

बीजेपी सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूडी ने इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “अगर कोई बांग्लादेशी या म्यांमार से आया हुआ व्यक्ति बिहार की मतदाता सूची में है, तो उसे निकालना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है। आयोग SIR के माध्यम से यही कर रहा है।”

रूडी ने विपक्षी दलों पर सवाल उठाते हुए कहा, “आजकल कुछ राजनीतिक पार्टियों को इस प्रक्रिया से बड़ी आपत्ति है। क्या इसका मतलब यह है कि इन दलों के वोटर केवल बांग्लादेश या म्यांमार से आए हैं?” उन्होंने कहा कि अगर ऐसा नहीं है, तो उन्हें इस प्रक्रिया से डर क्यों लग रहा है?

RJD का विरोध: “चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल”

आरजेडी सांसद मनोज कुमार झा ने चुनाव आयोग की मंशा और प्रक्रिया दोनों पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा, “22 साल बाद आयोग अचानक कैसे जाग गया? जब नए मुख्य चुनाव आयुक्त ने पदभार ग्रहण किया था, तब उन्होंने कहा था कि राजनीतिक दलों से सलाह के बिना कोई निर्णय नहीं लेंगे। लेकिन SIR प्रक्रिया को बिना किसी संवाद के लागू कर दिया गया।”

मनोज झा ने इसे “लोकतंत्र को कमजोर करने वाला कदम” बताते हुए यह भी जोड़ा कि “अगर बिहार में म्यांमार या बांग्लादेश का कोई नागरिक अवैध रूप से है, तो इसकी जिम्मेदारी देश के गृह मंत्री की है, चुनाव आयोग की नहीं।” उन्होंने साफ संकेत दिया कि उनकी पार्टी इस मुद्दे पर कोर्ट का दरवाजा खटखटाने को तैयार है।

मतदाता सूची की शुद्धता बनाम राजनीतिक रणनीति

SIR प्रक्रिया के तहत चुनाव आयोग द्वारा बिहार में घर-घर जाकर वोटर लिस्ट का सत्यापन किया जा रहा है। इस दौरान विदेशी मूल के लोगों के नामों की पहचान कर उन्हें हटाने की प्रक्रिया चल रही है। आयोग का दावा है कि बड़ी संख्या में नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार से आए लोग मतदाता सूची में दर्ज हैं।यह प्रक्रिया तकनीकी रूप से एक नियमित अभ्यास है, जो समय-समय पर चलाया जाता है, लेकिन इसमें देरी और अचानक सक्रियता ने संदेह पैदा कर दिया है। विपक्ष को आशंका है कि यह कदम 2025 विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता समीकरणों को प्रभावित करने के उद्देश्य से उठाया गया है।

NIA और गृह मंत्रालय की भूमिका पर भी चर्चा

RJD नेता मनोज झा के बयान के बाद अब इस बहस ने नया रुख ले लिया है। उन्होंने कहा कि यदि राज्य में विदेशी नागरिक मौजूद हैं और वर्षों से सरकारी सुविधाएं ले रहे हैं, तो इसकी पूरी ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय की बनती है। इस पूरे विवाद में NIA या IB जैसी एजेंसियों की भूमिका की भी मांग उठाई जा रही है कि वे विदेशी नागरिकों की घुसपैठ और उनकी वैधता की जांच करें। विपक्ष सवाल कर रहा है कि जब विदेशी नागरिक देश में बसते हैं, तो वे राशन कार्ड, आधार कार्ड और अन्य दस्तावेज कैसे प्राप्त कर लेते हैं?

लोकतंत्र और चुनाव की पवित्रता पर बहस

बिहार की मतदाता सूची को लेकर शुरू हुई SIR प्रक्रिया अब राजनीतिक तकरार का मुख्य बिंदु बन चुकी है। एक तरफ चुनाव आयोग और केंद्र सरकार इसके औचित्य और संवैधानिकता की बात कर रही है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई मान रहा है। आने वाले समय में यह मुद्दा चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक विवाद बन सकता है। खासकर जब इसे जनसंख्या, पहचान और लोकतंत्र जैसे संवेदनशील मुद्दों से जोड़ा जा रहा है। देखना होगा कि चुनाव आयोग इस प्रक्रिया को कितनी पारदर्शिता और निष्पक्षता से पूरा कर पाता है।

यह विवाद बिहार में 2025 विधानसभा चुनाव की पृष्ठभूमि में बेहद अहम माना जा रहा है। विपक्ष की मांग है कि आयोग प्रक्रिया को सार्वजनिक करे और सभी राजनीतिक दलों को विश्वास में ले। आम जनता को भी यह समझना जरूरी है कि चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता ही लोकतंत्र की असली पहचान है। …( प्रकाश कुमार पांडेय)

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