होली के रंग अगर प्रकृति से मिलें, तो त्योहार की खुशी दोगुनी हो जाती है। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने देशभर के इको-क्लब्स में एक खास पर्यावरण–अनुकूल होली अभियान शुरू किया है। यह पहल पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रम (EEP) के तहत चलाई जा रही है और इसका मकसद होली को सुरक्षित, स्वास्थ्यवर्धक और प्रकृति के अनुकूल बनाना है, जो सीधे तौर पर Mission LiFE के उद्देश्यों से जुड़ी है।
इको-क्लब्स में शुरू हुई हरित होली की सीख, छात्रों को मिल रहा प्रैक्टिकल अनुभव
इस अभियान के तहत स्कूलों और कॉलेजों के इको-क्लब्स में विशेष कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है। इन वर्कशॉप्स में छात्र केवल सुन नहीं रहे, बल्कि खुद अपने हाथों से प्राकृतिक होली रंग तैयार करना सीख रहे हैं। इसका उद्देश्य बच्चों को बचपन से ही पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार बनाना और त्योहारों में टिकाऊ विकल्प अपनाने की आदत डालना है।
सब्ज़ियों और फूलों से बने रंग, सेहत और प्रकृति दोनों के लिए सुरक्षित
कार्यशालाओं में छात्रों को सिखाया जा रहा है कि हरा रंग ताज़ी हरी पत्तेदार सब्ज़ियों से, लाल रंग चुकंदर से, पीला रंग हल्दी से और नारंगी रंग पलाश (गोगुपुव्वु) के फूलों से कैसे तैयार किया जा सकता है। मंत्रालय के अनुसार, ये सभी रंग पूरी तरह रसायन-मुक्त हैं और इनमें किसी भी तरह के हानिकारक तत्व नहीं होते, जिससे त्वचा, आंखों और पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचता।
सिंथेटिक रंगों की जगह बायोडिग्रेडेबल विकल्पों पर जोर
इस मुहिम के जरिए बच्चों को यह समझाया जा रहा है कि बाजार में मिलने वाले केमिकल युक्त रंग किस तरह पानी, मिट्टी और इंसानी सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं। प्राकृतिक और बायोडिग्रेडेबल रंगों को अपनाकर न सिर्फ प्रदूषण कम किया जा सकता है, बल्कि जल स्रोतों की रक्षा भी की जा सकती है। छात्र अब अपने परिवार और आसपास के लोगों को भी इस बदलाव के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
मिशन LiFE की सोच को ज़मीन पर उतारने की कोशिश
पर्यावरण मंत्रालय का कहना है कि यह पहल दिखाती है कि छोटे-छोटे कदम भी बड़े बदलाव ला सकते हैं। प्रकृति आधारित सरल उपायों से त्योहारों को रंगीन और सुरक्षित बनाया जा सकता है। यह अभियान केवल होली तक सीमित नहीं है, बल्कि एक ऐसी सोच विकसित करने की कोशिश है, जिसमें जीवनशैली और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चलें।