बिना नोटिफिकेशन क्यों लगता है फोन वाइब्रेट? जानिए ‘फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम’ का पूरा सच

बिना नोटिफिकेशन क्यों लगता है फोन वाइब्रेट? जानिए ‘फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम’ का पूरा सच

आज की डिजिटल जिंदगी में स्मार्टफोन इंसान की जरूरत ही नहीं बल्कि उसकी दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुका है। सुबह आंख खुलने से लेकर रात को सोने तक ज्यादातर लोग फोन से जुड़े रहते हैं। ऐसे में कई लोगों के साथ एक अजीब अनुभव बार-बार होता है। अचानक ऐसा महसूस होता है कि जेब में रखा फोन वाइब्रेट हुआ है या कोई नोटिफिकेशन आया है, लेकिन जब फोन निकालकर देखा जाता है तो न कोई कॉल होती है, न मैसेज और न ही कोई अलर्ट। इस स्थिति को विशेषज्ञ ‘फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम’ कहते हैं।

दिमाग का भ्रम या डिजिटल लत का असर

हर समय फोन साथ रखने से बढ़ रही समस्या

नोटिफिकेशन की आदत बना रही मानसिक दबाव

डॉक्टरों ने बताया डिजिटल ओवरलोड का संकेत

स्क्रीन टाइम कम कर बच सकते हैं लोग

विशेषज्ञों के अनुसार यह कोई गंभीर बीमारी नहीं है, लेकिन आधुनिक डिजिटल जीवनशैली का एक बड़ा मनोवैज्ञानिक संकेत जरूर माना जा रहा है। तेजी से बदलती तकनीकी दुनिया में लोग इतने ज्यादा मोबाइल नोटिफिकेशन के आदी हो चुके हैं कि उनका दिमाग हर समय अलर्ट मोड में रहने लगता है। यही कारण है कि कई बार शरीर में होने वाली सामान्य हलचल को भी दिमाग फोन के वाइब्रेशन के रूप में महसूस करने लगता है।

 

फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम को लेकर न्यूरोलॉजिस्ट और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह समस्या खासतौर पर उन लोगों में अधिक देखी जा रही है जो लगातार फोन का इस्तेमाल करते हैं या हर समय मोबाइल को अपने शरीर के पास रखते हैं। ऑफिस का काम, सोशल मीडिया, बैंकिंग, ऑनलाइन मीटिंग, गेमिंग और मनोरंजन जैसी गतिविधियों ने स्मार्टफोन को जीवन का स्थायी हिस्सा बना दिया है। ऐसे में व्यक्ति का दिमाग लगातार नोटिफिकेशन आने की उम्मीद में सक्रिय बना रहता है।

 

विशेषज्ञ बताते हैं कि जब किसी व्यक्ति को बार-बार फोन कॉल, मैसेज या सोशल मीडिया अलर्ट मिलने की आदत पड़ जाती है, तब उसका मस्तिष्क एक विशेष प्रतिक्रिया प्रणाली विकसित कर लेता है। इस दौरान कपड़ों की हल्की रगड़, त्वचा पर सामान्य कंपन, मांसपेशियों की हलचल या जेब में किसी वस्तु का दबाव भी दिमाग को मोबाइल वाइब्रेशन जैसा महसूस करा सकता है। कई बार लोगों को फोन की रिंगटोन सुनाई देने का भ्रम भी होता है, जिसे ‘फैंटम रिंगिंग’ कहा जाता है।

डॉक्टरों के अनुसार यह स्थिति आमतौर पर खतरनाक नहीं होती, लेकिन अगर किसी व्यक्ति को बार-बार ऐसा महसूस हो रहा है और वह हर कुछ मिनट में फोन चेक करने लगा है, तो यह डिजिटल निर्भरता का संकेत हो सकता है। लंबे समय तक ऐसी आदत तनाव, बेचैनी, नींद की समस्या और मानसिक थकान को बढ़ा सकती है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि लगातार ऑनलाइन रहने का दबाव आज के दौर की बड़ी समस्या बनता जा रहा है।

गुरुग्राम स्थित न्यूरो और स्पाइन विशेषज्ञ डॉ. प्रवीण गुप्ता के मुताबिक फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम आधुनिक डिजिटल जीवनशैली की देन है। उनका कहना है कि जब व्यक्ति लगातार नोटिफिकेशन पर निर्भर रहने लगता है, तब मस्तिष्क अपेक्षा और प्रतिक्रिया का एक पैटर्न बना लेता है। यही कारण है कि असली वाइब्रेशन न होने पर भी उसका भ्रम पैदा हो जाता है। उन्होंने कहा कि यह समस्या गंभीर नहीं है, लेकिन यदि कोई व्यक्ति फोन से दूरी नहीं बना पा रहा या बार-बार मोबाइल चेक करने को मजबूर महसूस करता है तो उसे अपनी डिजिटल आदतों पर ध्यान देने की जरूरत है।

विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल ओवरलोड से बचने के लिए लोगों को कुछ जरूरी बदलाव अपनाने चाहिए। सबसे पहले गैर-जरूरी ऐप्स के नोटिफिकेशन बंद करने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा हर समय फोन को जेब या हाथ में रखने की आदत कम करनी चाहिए। दिन में कुछ समय मोबाइल और सोशल मीडिया से पूरी तरह दूर रहना मानसिक स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद माना जाता है। इसे डिजिटल डिटॉक्स कहा जाता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि सोने से पहले स्क्रीन टाइम कम करना चाहिए, क्योंकि देर रात तक मोबाइल इस्तेमाल करने से मस्तिष्क लगातार सक्रिय बना रहता है। पर्याप्त नींद, योग, ध्यान और तनाव कम करने वाली गतिविधियां भी इस समस्या को कम करने में मदद कर सकती हैं।

तकनीक ने जीवन को आसान जरूर बनाया है, लेकिन इसके बढ़ते इस्तेमाल ने नई मानसिक चुनौतियां भी पैदा कर दी हैं। फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम उसी बदलती जीवनशैली का संकेत माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते डिजिटल संतुलन नहीं बनाया गया, तो भविष्य में ऐसी समस्याएं और बढ़ सकती हैं। इसलिए जरूरी है कि लोग तकनीक का उपयोग करें, लेकिन उसके पूरी तरह गुलाम न बनें।

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