DNA जांच ने दिलाई इंसाफ की राह, तीन महीने जेल में बंद व्यक्ति की रिहाई

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डीएनए जांच ने दिलाई इंसाफ की राह, तीन महीने जेल में बंद व्यक्ति की रिहाई

गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। जहां डीएनए जांच ने तीन महीने से जेल में बंद एक 55 वर्षीय व्यक्ति को न्याय दिलाया। भतीजे द्वारा खुद को मृत बताए जाने और जमीन हड़पने के आरोप में जेल भेजे गए व्यक्ति को आखिरकार इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश और डीएनए टेस्ट रिपोर्ट के बाद रिहा कर दिया गया। जांच में यह साबित हो गया कि आरोपी व्यक्ति कोई फर्जी नहीं, बल्कि उसी परिवार का रक्त संबंधी सदस्य है।

यह मामला चितौना गांव का है। यहां रहने वाले राम केवळ नामक व्यक्ति को उसके ही भतीजे राम सरन ने impostor यानी फर्जी बताते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। भतीजे का आरोप था कि उसका चाचा वर्षों पहले मर चुका है और उसकी पहचान का गलत इस्तेमाल कर किसी व्यक्ति ने पैतृक जमीन का एक हिस्सा बेच दिया है। इसी शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की।

कैसे शुरू हुआ विवाद
राम सरन ने फरवरी 2024 में खोराबार थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। उसने आरोप लगाया था कि उसके चाचा राम केवळ की कई साल पहले मौत हो चुकी है, लेकिन कोई व्यक्ति खुद को राम केवळ बताकर चितौना गांव की पैतृक जमीन बेच रहा है। शिकायत मिलते ही पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की।
जांच के दौरान पुलिस को कुछ ऐसे तथ्य मिले, जिनके आधार पर राम केवळ को आरोपी मान लिया गया। पुलिस का दावा था कि 2023 में राम केवळ ने फर्जी दस्तावेज तैयार किए और खुद को विपत नामक व्यक्ति का पुत्र बताते हुए जमीन का सौदा किया। जांच में यह भी सामने आया कि विपत गांव का निवासी था और उसकी मृत्यु कई वर्ष पहले हो चुकी थी। विपत के दो बेटे बताए गए—एक घुरे और दूसरा राम केवळ। घुरे ही राम सरन के पिता थे। राम सरन का दावा था कि उसके चाचा राम केवळ की भी मृत्यु हो चुकी है।

दस्तावेजों में उलझी पहचान

पुलिस ने आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर आईडी और बैंक खाते जैसे आधिकारिक दस्तावेजों की जांच की। इन दस्तावेजों में राम केवळ का जन्म वर्ष 1957 दर्ज था और वह गजपुर गांव (गगहा थाना क्षेत्र) का निवासी बताया गया। हालांकि इन दस्तावेजों में उसके पिता का नाम रामकिशुन दर्ज था, जिससे पुलिस को शक हुआ कि यह व्यक्ति विपत का बेटा नहीं है।

पुलिस जांच में यह भी पाया गया कि जिस बैंक खाते का जिक्र जमीन बिक्री के दस्तावेज में था, वह खाता राम केवळ का ही था, लेकिन बिक्री की रकम उस खाते में कभी जमा नहीं हुई। इन तथ्यों के आधार पर पुलिस ने राम केवळ के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी और सितंबर महीने में गैर-जमानती वारंट जारी होने के बाद उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

तीन महीने जेल में रहा निर्दोष
राम केवळ को करीब तीन महीने जेल में रहना पड़ा। इस दौरान उसने खुद को निर्दोष बताते हुए लगातार न्याय की गुहार लगाई। आखिरकार उसकी बहन ने उसके behalf पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। याचिका में कहा गया कि राम केवळ की पहचान को लेकर गंभीर गलती हुई है।

याचिका में स्पष्ट किया गया कि आरोपी व्यक्ति रामकिशुन का पुत्र नहीं, बल्कि विपत का ही पुत्र राम केवळ है। यह भी बताया गया कि रामकिशुन, राम केवळ की मां का दूसरा पति था, इसलिए कुछ दस्तावेजों में पिता का नाम रामकिशुन दर्ज हो गया। याचिका में यह भी कहा गया कि जिस व्यक्ति ने शिकायत दर्ज कराई है, वह कोई बाहरी नहीं बल्कि राम केवळ का सगा भतीजा है, जिसने संपत्ति विवाद के चलते यह आरोप लगाया।

50 साल से ‘लापता’ मान लिया गया था मृत
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि राम केवळ पिछले करीब 50 वर्षों से अपने गांव से दूर था, जिस कारण परिवार के कुछ सदस्यों ने उसे मृत मान लिया था। इसी गलतफहमी का फायदा उठाकर उस पर फर्जी होने का आरोप लगाया गया। हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए डीएनए जांच कराने का आदेश दिया।

डीएनए टेस्ट से खुली सच्चाई
डीएनए जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद सच्चाई उजागर हो गई। रिपोर्ट में साफ तौर पर यह पुष्टि हुई कि राम केवळ उसी परिवार का रक्त संबंधी सदस्य है और वह विपत का ही पुत्र है। इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राम केवळ की तत्काल रिहाई के आदेश दिए।

न्याय की जीत
तीन महीने जेल में बिताने के बाद राम केवळ की रिहाई हुई। यह मामला न सिर्फ संपत्ति विवादों में बढ़ती कटुता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि पहचान की छोटी-सी गलती किसी निर्दोष व्यक्ति की जिंदगी को कैसे प्रभावित कर सकती है। डीएनए जांच ने इस मामले में निर्णायक भूमिका निभाई और एक निर्दोष व्यक्ति को न्याय दिलाया। यह घटना कानून व्यवस्था और जांच प्रक्रिया के लिए भी एक सीख है कि ऐसे मामलों में पारिवारिक विवाद, दस्तावेजों की त्रुटि और मानवीय पहलुओं को ध्यान में रखते हुए गहन जांच की जानी चाहिए, ताकि किसी निर्दोष को बेवजह जेल न जाना पड़े।

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