Divya Mittal: IAS की कुर्सी छोड़ राजनीति में उतरीं दिव्या मित्तल, मिर्जापुर से लड़ेंगी चुनाव; क्या नई पार्टी के दम पर जीत पाएंगी जनता का भरोसा?

उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक कामकाज के कारण चर्चा में रहीं पूर्व IAS अधिकारी दिव्या मित्तल अब चुनावी राजनीति में अपनी किस्मत आजमाने जा रही हैं। उन्होंने ‘जननीति भारत’ नाम से नई राजनीतिक पार्टी बनाने और 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उतरने का ऐलान किया है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उनकी नजर मिर्जापुर सदर विधानसभा सीट पर है। करीब आठ मिनट के वीडियो संदेश में उन्होंने अपनी राजनीतिक सोच और आगे की योजना रखी। लेकिन प्रशासन चलाने और चुनाव जीतने में बड़ा अंतर होता है। सरकारी व्यवस्था में फैसले लेने का अनुभव उनके काम आ सकता है, मगर जनता का समर्थन जुटाना, कार्यकर्ताओं की टीम खड़ी करना और बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करना उनके सामने बड़ी परीक्षा होगी।

प्रशासनिक अनुभव के बाद दिव्या मित्तल ने राजनीति में नई शुरुआत क्यों की?
दिव्या मित्तल 2013 बैच की IAS अधिकारी रही हैं। मिर्जापुर में जिलाधिकारी रहते हुए दूरस्थ लहुरियादह गांव तक पाइप से पानी पहुंचाने के प्रयास के कारण उन्हें पहचान मिली। अगस्त 2026 में उन्होंने सेवा छोड़ने की घोषणा की और सितंबर में उनका इस्तीफा स्वीकार होने की खबर आई। अब उनका कहना है कि जनता को नीतियां बनाने की प्रक्रिया में अधिक भागीदारी मिलनी चाहिए और सरकार को पूरे कार्यकाल में जवाबदेह रहना चाहिए। उनकी पार्टी की घोषणा इसी सोच के साथ सामने आई है। हालांकि, प्रशासनिक उपलब्धियां अपने आप चुनावी जीत में नहीं बदलतीं; मतदाताओं को उनके विचारों, स्थानीय मुद्दों और संगठन पर भी भरोसा करना होगा।

अजीत जोगी से अरविंद केजरीवाल तक, कई पूर्व अधिकारियों ने राजनीति में बनाई मजबूत पहचान
भारत में कई अधिकारियों ने सरकारी सेवा छोड़कर राजनीति में सफलता हासिल की। पूर्व IAS अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री बने। पूर्व राजस्व अधिकारी अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी बनाई और दिल्ली के मुख्यमंत्री बने। पूर्व IAS यशवंत सिन्हा केंद्रीय मंत्री रहे, जबकि पूर्व IPS अधिकारी राजेश्वर सिंह और असीम अरुण उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हैं। इन उदाहरणों से पता चलता है कि प्रशासनिक अनुभव राजनीति में मदद कर सकता है, लेकिन सफलता के लिए जनता से जुड़ाव और राजनीतिक संगठन भी जरूरी हैं।

किरण बेदी और के. अन्नामलाई जैसे उदाहरण बताते हैं कि चुनावी जीत आसान नहीं
हर चर्चित अधिकारी चुनाव में सफल नहीं हुआ। पूर्व IPS अधिकारी किरण बेदी 2015 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार थीं, लेकिन कृष्णा नगर सीट से हार गईं। तमिलनाडु भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई 2024 के लोकसभा चुनाव में कोयंबटूर से हार गए। इन उदाहरणों से साफ है कि प्रतिष्ठित करियर और लोकप्रियता के बावजूद चुनाव जीतने के लिए स्थानीय समीकरण, पार्टी संगठन, उम्मीदवार की स्वीकार्यता और मतदाताओं से लगातार संपर्क अहम होते हैं।

मिर्जापुर में दिव्या मित्तल के सामने संगठन, स्थानीय समीकरण और जनता के भरोसे की चुनौती
दिव्या मित्तल के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी नई पार्टी को केवल सोशल मीडिया की चर्चा से आगे ले जाने की होगी। मिर्जापुर सदर में उन्हें स्थानीय समस्याओं, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास पर स्पष्ट योजनाएं जनता के सामने रखनी होंगी। साथ ही कार्यकर्ताओं को जोड़ना, बूथ स्तर पर नेटवर्क बनाना और चुनावी संसाधनों का प्रबंधन करना होगा। स्थापित राजनीतिक दलों के पास पहले से संगठन और समर्थक मौजूद हैं, जबकि नई पार्टी को यह आधार तैयार करना पड़ेगा। उनकी प्रशासनिक छवि शुरुआती पहचान दे सकती है, लेकिन लंबे समय तक जनता से संवाद बनाए रखना जरूरी होगा।

क्या जनता पूर्व अधिकारियों को राजनीति में मौका देगी या पुराने दलों पर ही भरोसा करेगी?
दिव्या मित्तल की राजनीतिक सफलता का फैसला अभी नहीं किया जा सकता। मतदाता किसी अधिकारी के पिछले काम से प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन वे उसके राजनीतिक विचारों, वादों और समस्याओं के समाधान की क्षमता को भी परखेंगे। नई पार्टी के लिए यह साबित करना जरूरी होगा कि वह चुनाव के बाद भी जनता के बीच सक्रिय रहेगी। 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उनकी वास्तविक ताकत संगठन, स्थानीय समर्थन और प्रचार अभियान से स्पष्ट होगी। फिलहाल उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रशासनिक पहचान को वे कितने मजबूत जनसमर्थन में बदल पाती हैं।

 

Exit mobile version