68वीं रैंक से बनीं IAS, देवरिया-संतकबीरनगर-मिर्जापुर की DM रहीं
पहाड़ी गांव में नल से पानी पहुंचाने के लिए जानी गईं
इस्तीफे के बाद भी देश और समाज के लिए काम जारी रखने का संकेत
लखनऊ/नई दिल्ली। एक ऐसा करियर, जिसमें देश के प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़ाई, विदेश में लाखों रुपये का पैकेज, फिर UPSC जैसी कठिन परीक्षा में सफलता और करीब 13 साल तक प्रशासनिक सेवा में काम करने का अनुभव शामिल हो—ऐसे करियर को अचानक छोड़ने का फैसला अपने आप में बड़ी खबर बन जाता है। उत्तर प्रदेश कैडर की 2013 बैच की IAS अधिकारी दिव्या मित्तल के इस्तीफे ने भी कुछ ऐसा ही सवाल खड़ा किया है—आखिर जिस प्रशासनिक सेवा को पाने के लिए लाखों युवा सपना देखते हैं, उसे 13 साल बाद छोड़ने की जरूरत क्यों पड़ी?
दिव्या मित्तल का नाम उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था में उन अधिकारियों के तौर पर सामने आया, जिन्होंने कई जिलों में काम करते हुए अपनी अलग पहचान बनाई। लेकिन उनकी कहानी सिर्फ IAS बनने तक सीमित नहीं है। इसमें IIT दिल्ली की पढ़ाई, IIM बेंगलुरु से प्रबंधन शिक्षा, लंदन में नौकरी और फिर देश लौटकर प्रशासनिक सेवा में आने का फैसला शामिल है।
IIT से IIM और फिर लंदन
दिव्या मित्तल की शुरुआती जिंदगी एक सामान्य परिवार से निकलकर बड़े लक्ष्य हासिल करने की कहानी है। पढ़ाई में शानदार प्रदर्शन करते हुए उन्होंने IIT दिल्ली से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने IIM बेंगलुरु से मैनेजमेंट की शिक्षा हासिल की। प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़ाई के बाद उनके सामने कॉरपोरेट दुनिया में शानदार करियर का रास्ता खुला। उन्होंने लंदन में एक विदेशी कंपनी में ट्रेडर के तौर पर काम किया। लंदन की नौकरी, अच्छा पैकेज और बेहतर जीवनशैली के बावजूद दिव्या के मन में प्रशासनिक सेवा में जाने का विचार मजबूत होता गया। उन्होंने विदेश की नौकरी छोड़कर भारत लौटने और UPSC की तैयारी करने का फैसला किया। यहीं से उनकी जिंदगी का दूसरा अध्याय शुरू हुआ।
UPSC में 68वीं रैंक
2012 की UPSC परीक्षा में दिव्या मित्तल ने 68वीं रैंक हासिल की। इसके बाद वह 2013 बैच की IAS अधिकारी बनीं और उत्तर प्रदेश कैडर मिला। UPSC में सफलता हासिल करना उनके लिए केवल करियर बदलने का फैसला नहीं था। विदेश की नौकरी से सरकारी प्रशासन की ओर जाना उनके जीवन के उद्देश्य में आए बदलाव का संकेत भी था। एक तरफ कॉरपोरेट क्षेत्र में आर्थिक अवसर थे, दूसरी तरफ प्रशासनिक सेवा में सीधे जनता के बीच काम करने का अवसर। दिव्या ने दूसरा रास्ता चुना।
तीन जिलों की DM, अलग अंदाज में काम
उत्तर प्रदेश में अपने प्रशासनिक सफर के दौरान दिव्या मित्तल ने अलग-अलग महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। वह देवरिया, संतकबीरनगर और मिर्जापुर की जिलाधिकारी भी रहीं। जिलाधिकारी के तौर पर किसी जिले की जिम्मेदारी संभालना केवल सरकारी फाइलों और बैठकों तक सीमित काम नहीं है। कानून-व्यवस्था से लेकर विकास योजनाओं, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और आम लोगों की शिकायतों तक प्रशासन की बड़ी जिम्मेदारी जिलाधिकारी के कंधों पर होती है। दिव्या मित्तल ने अपने कार्यकाल में इसी प्रत्यक्ष जनसंपर्क को अपनी कार्यशैली का हिस्सा बनाया।उनकी पहचान ऐसे अधिकारी के रूप में बनी जो सरकारी योजनाओं के पीछे मौजूद वास्तविक लाभार्थी तक पहुंचने की कोशिश करती थीं।
लहुरिया दह की कहानी क्यों बनी पहचान?
दिव्या मित्तल के प्रशासनिक करियर से जुड़ी सबसे चर्चित कहानियों में मिर्जापुर के लहुरिया दह गांव का मामला शामिल है। पहाड़ी इलाके में स्थित इस गांव में लंबे समय से पेयजल की समस्या थी। ग्रामीणों के लिए पानी लाना रोजमर्रा की जिंदगी का बड़ा संघर्ष था। दिव्या मित्तल के कार्यकाल में प्रशासनिक प्रयासों के जरिए गांव तक पाइपलाइन से पानी पहुंचाने की कोशिश हुई और ग्रामीणों को नल से पानी मिलने लगा। यही वह घटना थी, जिसने उनके प्रशासनिक दृष्टिकोण की एक अलग तस्वीर पेश की—एक ऐसी अधिकारी जो किसी परियोजना को केवल सरकारी लक्ष्य की तरह नहीं, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़कर देखती थीं।
एक बुजुर्ग महिला का आशीर्वाद
अपने इस्तीफे से जुड़े संदेश में दिव्या मित्तल ने इसी घटना को याद किया। उन्होंने बताया कि जब पहाड़ी गांव में पहली बार पानी पहुंचा तो एक बुजुर्ग महिला ने बिना कुछ कहे उनके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। दिव्या के लिए वह पल किसी प्रशासनिक उपलब्धि से बड़ा था। उनके संदेश का भाव यही था कि पद और जिम्मेदारी एक दिन खत्म हो सकती है, लेकिन जनता से मिला विश्वास और आशीर्वाद जीवनभर साथ रहता है। यही बात उनके 13 साल के प्रशासनिक सफर को समझने की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी भी बनती है।
फिर आखिर इस्तीफा क्यों?
यहीं सबसे बड़ा सवाल है। दिव्या मित्तल ने करीब 13 साल की प्रशासनिक सेवा के बाद स्वेच्छा से इस्तीफा देने का फैसला किया है। लेकिन उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि उन्होंने किसी एक विवाद, दबाव या घटना के कारण इस्तीफा दिया। उनकी ओर से ऐसा कोई स्पष्ट सार्वजनिक बयान सामने नहीं है जिसमें किसी खास व्यक्ति, सरकार, विभाग या प्रशासनिक विवाद को इस्तीफे की वजह बताया गया हो। उन्होंने अपने संदेश में अपने साथी अधिकारियों, कर्मचारियों और आम लोगों के प्रति आभार जताया और संकेत दिया कि पद छोड़ने के बावजूद देश और समाज के लिए काम करने की उनकी इच्छा खत्म नहीं हुई है। इसलिए फिलहाल उनके इस्तीफे को उनके व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में एक नए अध्याय की शुरुआत के रूप में देखना ज्यादा उचित है।
IAS के बाद क्या?
यही सवाल अब सबसे ज्यादा चर्चा में है। दिव्या मित्तल का शैक्षणिक और पेशेवर अनुभव काफी विविध रहा है। IIT की तकनीकी शिक्षा, IIM की मैनेजमेंट ट्रेनिंग, लंदन का कॉरपोरेट अनुभव और 13 साल का प्रशासनिक अनुभव—इन सबका मेल उन्हें कई क्षेत्रों में काम करने की क्षमता देता है। वह आगे सामाजिक क्षेत्र, नीति निर्माण, शिक्षा, टेक्नोलॉजी, प्रशासनिक सलाह या किसी अन्य सार्वजनिक पहल से जुड़ेंगी या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन उन्होंने जिस तरह अपने संदेश में देश और समाज के लिए काम करते रहने की बात कही है, उससे इतना जरूर संकेत मिलता है कि सरकारी पद छोड़ना उनके सार्वजनिक जीवन का अंत नहीं है।
पद गया, मकसद नहीं
दिव्या मित्तल की कहानी इसलिए अलग है क्योंकि यह केवल एक IAS अधिकारी के इस्तीफे की खबर नहीं है। यह उस व्यक्ति की कहानी है जिसने विदेश में आकर्षक करियर छोड़कर भारत लौटने का फैसला किया। UPSC पास किया। प्रशासनिक सेवा में करीब 13 साल बिताए। कई जिलों में काम किया और ऐसे अनुभव अपने साथ लेकर अब सेवा से बाहर निकल रही हैं, जिनमें जनता के साथ सीधा संवाद सबसे अहम रहा। उनकी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू शायद यही है कि करियर बदला है, लेकिन सार्वजनिक सेवा का विचार खत्म नहीं हुआ।
IIT से लंदन…
लंदन से UPSC…
UPSC से IAS…
और अब IAS से बाहर।
दिव्या मित्तल के करियर का अगला अध्याय क्या होगा, यह आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन उनके 13 साल के सफर की एक तस्वीर जरूर याद रह जाएगी— एक पहाड़ी गांव में पहली बार नल से गिरता पानी… और उसे देखकर किसी बुजुर्ग महिला का अधिकारी के सिर पर रखा आशीर्वाद भरा हाथ। क्योंकि आखिरकार, किसी अधिकारी की सबसे बड़ी पहचान उसके पद से नहीं, लोगों की जिंदगी में छोड़े गए असर से होती है।